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छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की राजनीति लंबे समय से आदिवासी सीटों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। इन्हें पार्टी का परंपरागत वोटबैंक माना जाता है। यही वजह है कि सत्ता से बाहर रहते हुए 2008, 2013 और 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने आदिवासी सीटों पर लगातार बढ़त बनाई। 2018 में 29 आदिवासी सीटों में से 25 जीतकर पार्टी ने सरकार बनाई। लेकिन सत्ता में आने के बाद आदिवासी वोटबैंक खिसकता गया। 2023 में कांग्रेस इन 25 सीटों से घटकर सिर्फ 11 पर रह गई। भाजपा-कांग्रेस की जीत-हार के 19 सीटों के अंतर में 14 आदिवासी सीटों की भूमिका रही। अब कांग्रेस फिर अपने इस परंपरागत वोटबैंक को साधने में जुट गई है। विधानसभा चुनाव में करीब दो साल बाकी हैं, लेकिन संगठन ने जमीन पर तैयारी शुरू कर दी है। बुधवार को प्रदेश कांग्रेस भवन में आदिवासी कांग्रेस कार्यकारिणी और आदिवासी सलाहकार परिषद की बैठक इसी रणनीति का हिस्सा रही।
बैठक में पिछले चुनाव के प्रदर्शन की समीक्षा के साथ संगठन मजबूत करने और आदिवासी सीटों पर कमजोर प्रदर्शन के कारणों पर चर्चा हुई। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरगुजा और बस्तर में खोया आधार वापस पाने की है।
पिछले चार चुनाव में आदिवासी सीटों का गणित बस्तर के ‘लाल गलियारे’ का बदलता मिजाज पिछले चुनावों में बस्तर की नक्सल प्रभावित और संवेदनशील रही सीटों पर भी आदिवासी मतदाताओं का रुख बदला है। 2023 में भाजपा ने संभाग की 11 में से 7 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 4 मिलीं। 2018 में तस्वीर बिल्कुल उलट थी। कांग्रेस ने 10 सीटें जीती थीं और भाजपा के खाते में सिर्फ एक सीट आई थी। अब केंद्र और राज्य सरकार के बस्तर को नक्सलमुक्त करने के दावे के बीच भाजपा अपनी पकड़ और मजबूत करने की कोशिश में है। कांग्रेस के लिए यहां पुराना जनाधार वापस पाना होगा। सरगुजा का उलटफेर 9-0 से 0-9
महज पांच साल में सरगुजा की सभी 9 एसटी सीटें कांग्रेस से भाजपा के पाले में चली गईं। 2018 में कांग्रेस ने सभी 9 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, लेकिन 2023 में भाजपा ने क्लीन स्वीप किया। कांग्रेस यहां खाता भी नहीं खोल सकी। अब पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार में रहते हुए उसका पूरा आदिवासी आधार कैसे खिसक गया। सरगुजा में वापसी कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। आदिवासी क्षेत्रों में आंदोलन करेगी कांग्रेस, सर्वसम्मति से निंदा प्रस्ताव पास
राजीव भवन में बुधवार को आदिवासी कांग्रेस कार्यकारिणी समिति और आदिवासी सलाहकार परिषद की बैठक हुई। इसमें आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया शामिल हुए। बैठक में वन अधिकार अधिनियम, पेसा कानून के अनुपालन, वनाधिकार पट्टों और जल-जंगल-जमीन पर आदिवासी अधिकारों की उपेक्षा के मुद्दों पर आंदोलन की रूपरेखा भी तैयार हुई। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने विश्व आदिवासी दिवस नहीं मनाने को लेकर भाजपा सरकार के खिलाफ निंदा प्रस्ताव रखा। इसे सर्वसम्मति से पारित किया गया। प्रस्ताव में आरोप लगाया गया कि 9 अगस्त को सरकार ने कोई आयोजन नहीं किया और मुख्यमंत्री, मंत्रियों व भाजपा नेताओं ने आदिवासी समाज को बधाई तक नहीं दी। बैठक में नेता प्रतिपक्ष डा. चरणदास महंत, पूर्व सीएम भूपेश बघेल, पूर्व मंत्री ताम्रध्वज साहू, आदिवासी कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जनक ध्रुव, अमरजीत भगत सहित विधायक आदि मौजूद रहे।
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