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‘डियर सोफी… तुम धोखा मत देना’:लाहौर में ISI एजेंट को 9 गोलियां मारीं; इंदिरा की हत्या के बाद RAW का खतरनाक मिशन, पार्ट-1




बात है जून 1987 की। उस दिन लाहौर में चमड़ी झुलसा देने वाली तेज धूप थी। घड़ी में दोपहर के 12 बज रहे थे। शहर के बीचों-बीच मेन रोड पर एक टैक्सी आकर रुकी। ओवरकोट पहने 40-45 साल का एक शख्स बाहर निकला। हाथ में चमड़े का बैग। वह रुमाल से पसीना पोछ रहा था। चेहरे पर थकान थी, लेकिन आंखें पूरी तरह सतर्क। वह बार-बार मुड़कर चारों तरफ देख रहा था। वह तेजी से एक संकरी गली में मुड़ गया। कुछ ही मिनटों में एक हवेलीनुमा घर के सामने खड़ा था। दरवाजे पर ताला लटका था। उसने जेब से चाबी निकाली और बुदबुदाया- ‘गुल साहब से मिलने से पहले थोड़ा आराम कर लेता हूं।’ तभी एक मोटरसाइकिल गली में दाखिल हुई। उस पर दो लोग सवार थे। चेहरे काले कपड़ों से ढके हुए। बाइक हवेली के सामने आकर रुकी। पीछे बैठे शख्स ने पिस्टल निकाली और ट्रिगर दबा दिया। गोली दरवाजा खोल रहे शख्स की खोपड़ी को पार कर गई। वह गिर पड़ा। दरवाजा मांस के छोटे-छोटे टुकड़े और खून से लाल हो गया। तभी दूसरे हमलावर ने भी पिस्टल निकालकर गिरे हुए शख्स को एक के बाद एक 8 गोलियां मारीं। खबर फैलते ही लाहौर में हड़कंप मच गया। मरने वाला कौन था और उसकी हत्या करने वालों का भारत से क्या रिश्ता था… पूरी कहानी स्पाई फाइल्स सीरीज के ‘ऑपरेशन हॉरनेट’ में… 31 अक्टूबर 1984 की सुबह। दिल्ली में सर्दियां पड़ने लगी थीं, लेकिन सियासी गलियारों का पारा चढ़ा हुआ था। एक महीने के भीतर लोकसभा चुनाव होने थे। हर दिन की तरह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सुबह 6 बजे उठ गईं। नाश्ते की मेज पर दो टोस्ट, संतरे का जूस और अंडे थे। नाश्ता खत्म कर वे अखबार पढ़ने लगीं। सुबह साढ़े 8 बजे बीबीसी की एक टीम उनका इंटरव्यू लेने आने वाली थी। प्रधानमंत्री को तैयार करने के लिए सुबह ही मेकअप आर्टिस्ट पहुंच चुका था। 8 बजे उनके निजी सचिव आरके धवन 1, सफदरजंग रोड पहुंचे। उन्होंने इंदिरा को खबर दी- ‘मैडम, इंटरव्यू का वक्त 9.20 कर दिया गया है। सुबह 9 बजकर 10 मिनट पर हाथ से बुनी हल्के नारंगी रंग की साड़ी पहने इंदिरा आवास से बाहर निकलीं। उन्हें 1, अकबर रोड पर अपने दफ्तर जाना था, जहां बीबीसी की टीम उनका इंतजार कर रही थी। आवास से दफ्तर का फासला महज 50 मीटर का था। कैंपस के भीतर से ही पैदल रास्ता बना था। इंदिरा धीरे-धीरे चल रही थीं। उन्हें धूप से बचाने के लिए सिपाही नारायण सिंह छाता ताने बगल में चल रहा था और आरके धवन ठीक पीछे-पीछे। अकबर रोड गेट पर पहुंचते ही सुरक्षा गार्ड बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने हाथ जोड़कर कहा- ‘नमस्ते।’ इंदिरा जैसे ही झुकीं, बेअंत ने अपनी .38 बोर की रिवॉल्वर इंदिरा पर तान दी। इंदिरा के मुंह से निकला- ‘तुम ये क्या कर रहे हो बेअंत?’ बेअंत ने फायर कर दिया। गोली इंदिरा के पेट में लगी। बेअंत रुका नहीं, उसने एक के बाद एक चार और गोलियां दागीं। बेअंत का साथी सतवंत वहीं खड़ा रहा। इंदिरा को गोली लगते ही वह घबरा गया। बेअंत चिल्लाया- ‘गोली मारो!’ सतवंत ने अपनी स्टेनगन से धड़ाधड़ 25 गोलियां इंदिरा के शरीर में उतार दीं। दोनों ने अपने हथियार वहीं फेंक दिए। बेअंत ने पंजाबी में कहा- ‘हमें जो करना था, कर दिया। अब तुम करो, जो तुम्हें करना है।’ इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस के सिपाही दौड़ते हुए पहुंचे। गोलीबारी में बेअंत मारा गया और सतवंत गंभीर रूप से जख्मी हो गया। पीएम आवास पर तैनात डॉक्टर की चीख गूंजी- ‘एम्बुलेंस लाओ तुरंत!’ आमतौर पर वहीं रहने वाली एम्बुलेंस का ड्राइवर शायद उस वक्त चाय पीने चला गया था। डॉक्टर फिर चिल्लाए- ‘तो एक कार लाओ। तुरंत लाओ।’ एक सफेद रंग की एंबेसडर कार बुलाई गई। पुलिसकर्मियों की मदद से धवन ने इंदिरा को कार की पिछली सीट पर लिटाया और खुद आगे की सीट पर बैठ गए। उस वक्त सोनिया गांधी बाथरूम में थीं। नौकर की चीख सुनकर वे बदहवास हालत में बाहर भागीं। सफेद गाउन, बिखरे हुए गीले बाल। वे दौड़कर सीधे कार में जा बैठीं। इंदिरा को थपथपाते हुए बोलीं- ‘ओह मम्मी, ओह गॉड, मम्मी…’ वे लगातार बात करके उन्हें होश में रखना चाहती थीं। कार तेजी से एम्स की तरफ दौड़ रही थी। सोनिया अपने गाउन की आस्तीन से इंदिरा के चेहरे से बहता खून पोंछती जा रही थीं। कुछ किलोमीटर का रास्ता उन्हें जिंदगी का सबसे लंबा सफर लग रहा था। वे मन ही मन बुदबुदा रही थीं- ओह गॉड, और तेज चलो…’ सोनिया के दिमाग में एक साथ कई सवाल कौंध रहे थे- राजीव कहां हैं, उन्हें कैसे बताऊं? बच्चे कहां हैं, उन्हें तो बुलाना पड़ेगा… फिर वे इंदिरा की तरफ देखकर फुसफुसाईं- ‘ओह मम्मी प्लीज जिंदा रहना।’ सुबह 9.32 बजे कार एम्स के दरवाजे पर रुकी। जूनियर डॉक्टरों ने जब मरीज को देखा, तो वहां अफरातफरी मच गई। कुछ ही मिनटों में सीनियर डॉक्टरों की टीम पहुंच गई। इंदिरा के फेफड़ों को ऑक्सीजन दी गई। शरीर में खून पहुंचाने के लिए नलियां डाली गईं। फिर डॉक्टर उन्हें आठवीं मंजिल पर ऑपरेशन थिएटर में ले गए। जांच करने पर पता चला कि दिल में हल्की-हल्की धड़कन अब भी है। सोनिया की आंसुओं से भरी आंखों में उम्मीद की एक पतली सी किरण चमकी। इधर, दिल्ली के लोधी रोड पर RAW के दफ्तर में फोन एक के बाद एक बजने लगे। खबर आ चुकी थी कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को गोली मार दी गई है। दफ्तर में मौजूद जॉइंट सेक्रेटरी जीबीएस सिद्धू खबर सुनते ही सन्न रह गए। उनका दिमाग तुरंत 10 दिन पुरानी एक घटना पर चला गया। वह 21 अक्टूबर का दिन था, संडे। दोपहर के करीब 1 बज रहे थे। सिद्धू पत्नी और दो बच्चों के साथ कार से जिमखाना क्लब से गुजर रहे थे। सफदरजंग चौराहे के पास अचानक उनकी नजर प्रधानमंत्री आवास के बाहरी गेट पर गई। वहां दो युवा पुलिसवाले खड़े थे। दोनों के हाथों में स्टेन गन थी। उनमें से एक 25 साल का गठीला सिख था, जिसकी लंबाई करीब 5 फुट 8 इंच थी और दाढ़ी करीने से सेट की हुई। सिद्धू ने पत्नी की तरफ देखते हुए कहा- ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद तो सिख सुरक्षाकर्मियों को ड्यूटी से हटा दिया गया था। इन्हें वापस किसने लगा दिया? यह तो मैडम की हत्या का सबसे आसान तरीका है।’ अगली सुबह सिद्धू RAW दफ्तर पहुंचे। उन्होंने एक पर्चा उठाया और उस पर लिखा- ‘पीएम आवास पर तैनात सिख सुरक्षाकर्मियों को तुरंत हटाया जाए। साथ ही यह जांच हो कि इनकी वापसी की सिफारिश किसने की थी।’ उन्होंने अपने सहायक को बुलाकर कहा- ‘एक लिफाफा लाओ। उस पर साफ-साफ लिख दो कि इसे सिर्फ वही खोले जिसके नाम यह भेजा जा रहा है।’ सहायक लिफाफा तैयार करने बाहर चला गया। सिद्धू अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे सोचने लगे- ‘पीएम आवास पर तैनात ये सिपाही गांवों से आते हैं। इनकी सोच आज भी पुरानी है। स्वर्ण मंदिर पर हुए हमले का बदला ये जरूर लेंगे। अगर ऐसा हुआ, तो जिस अफसर ने इन्हें वापस ड्यूटी पर भेजा है, वह मुझ पर साजिश में शामिल होने का आरोप लगा देगा। आजकल माहौल ऐसा है कि किसी भी सिख पर इल्जाम आसानी से लग जाएगा।’ तभी सहायक लिफाफा लेकर कमरे में आया। लिफाफे पर RAW प्रमुख गैरी सक्सेना का नाम लिखा था। सिद्धू ने लिफाफा अपने हाथ में लिया और टेबल पर रख दिया। जैसे ही सहायक कमरे से बाहर निकला, सिद्धू ने वह नोट और लिफाफा उठाया, और फाड़कर कूड़ेदान में फेंक दिया। इधर, बीबीसी रेडियो पर इंदिरा की मौत का ऐलान हो चुका था। सिद्धू अपने कमरे में अकेले बैठे खुद को कोस रहे थे- ‘काश! मैंने उस दिन वह नोट फाड़ा न होता और RAW चीफ को भेज दिया होता, तो आज यह दिन देखना न पड़ता।’ तभी उनके मन में एक और ख्याल आया। वे धीरे से बुदबुदाए- ‘लेकिन काव साहब ने भी तो मैडम को साफ-साफ चेताया था कि अपने सुरक्षा घेरे से सिख गार्डों को हटा लें।’ काव साहब यानी आरएन काव। देश की खुफिया एजेंसी RAW के पूर्व प्रमुख, जो उस वक्त प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सुरक्षा सलाहकार के रूप में काम कर रहे थे। दरअसल, 1980 का दशक भारत के लिए बेहद नाजुक दौर था। पंजाब में खालिस्तानी चरमपंथ अपनी जड़ें जमा चुका था। भारतीय खुफिया एजेंसियों को इनपुट मिले थे कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI इन चरमपंथियों को ट्रेनिंग, भारी पैसा और आधुनिक हथियार मुहैया करा रही थी। RAW ने तय कर लिया था कि पाकिस्तान और चरमपंथियों के इस गठजोड़ को हर कीमत पर तबाह करना है। RAW के सीधे टारगेट पर दो नाम थे- ISI के दो मोहरे, अब्दुल खान और संधू। आदेश साफ था- इन दोनों को खत्म करना है। 3 नवंबर 1984… दिल्ली में इंदिरा के अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थीं। विदेशी मेहमान आ चुके थे। उनके बेटे राजीव गांधी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले चुके थे। दूसरी तरफ, दिल्ली और आसपास के इलाकों में हिंसा भड़की हुई थी। सिखों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा था। सैकड़ों सिख मारे जा चुके थे। इसी दौरान, फ्रांस की राजधानी पेरिस के ‘कैफे द फ्लोर’ में एक शख्स अकेला बैठा कॉफी पी रहा था। उम्र करीब 40 साल। नाम- संजीव जिंदल। भारत की खुफिया एजेंसी RAW का खास अफसर। संजीव कॉफी की चुस्की लेते हुए सोच में डूबे थे। तभी कैफे में फोन बजा और कहा गया कि कॉफी पी रहे संजीव को बुला दीजिए। वेटर ने संजीव तक ये बात पहुंचाई। संजीव ने जैसे ही रिसीवर उठाया, दूसरी तरफ से एक घबराई हुई आवाज आई, ‘संजीव, कुछ महीने पहले तुम जिस रिपोर्ट की बात कर रहे थे, मुझे उसका पूरा ब्योरा चाहिए। फौरन दिल्ली आ जाओ।’ यह फोन अनुज भारद्वाज का था। RAW का वह अफसर, जिसे जासूसी की दुनिया में ‘पॉप स्टार’ कहा जाता था। संजीव अगले दिन दिल्ली के RAW दफ्तर में अनुज भारद्वाज के सामने बैठे थे। भारद्वाज ने पूछा, ‘क्या तुम वह रिपोर्ट लाए हो? डिटेल में बताओ कि उसमें क्या है।’ संजीव ने मेज पर फाइल रखते हुए कहा, ‘सर, मैं बार-बार वही बात नहीं दोहराना चाहता। लंदन में हमारे सूत्र ने खबर दी थी कि ISI साजिश रच रही है। हो सकता है इसका पीएम की हत्या से सीधा संबंध न हो, लेकिन आप रिपोर्ट देखेंगे तो समझ जाएंगे कि उसकी चेतावनियों में दम है।’ भारद्वाज ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘मैं पुरानी रिपोर्टें नहीं पढ़ने वाला। तुम मुझे सीधा एक्शन प्लान बताओ।’ संजीव बोले, ‘हमें तुरंत एक ऑपरेशन शुरू करना चाहिए। हम अब्दुल खान और संधू, दोनों को मार गिराएंगे। तभी ISI और खालिस्तानी गठजोड़ की कमर टूटेगी।’ भारद्वाज ने सख्त लहजे में कहा, ‘लेकिन मुझे तुम्हारे उस एजेंट पर भरोसा नहीं है। मैं ऑपरेशन की इजाजत नहीं दे सकता।’ संजीव ने कुछ पल सोचा और बोले, ‘मुझे थोड़ा वक्त दीजिए। मैं आपके हर सवाल का जवाब दूंगा और वादा करता हूं कि आपको निराश नहीं करूंगा।’ भारद्वाज ने कहा, ‘मेरी विदेश मंत्रालय के एक अफसर से बात हुई है। अगले साल राजीव गांधी फ्रांस के दौरे पर जाने वाले हैं। मैं चाहता हूं कि इस ऑपरेशन का मुख्य केंद्र भले लंदन रहे, लेकिन इसकी पूरी देखरेख पेरिस के सेफ हाउस से हो।’ संजीव मुस्कुराए और बोले, ‘बिल्कुल ऐसा ही होगा।’ संजीव वापस पेरिस लौट गए। वहां पहुंचते ही उन्होंने अपने अंडरकवर एजेंट्स को काम पर लगा दिया। इस गुप्त मिशन का नाम रखा गया- ‘ऑपरेशन हॉरनेट’। मकसद साफ था- दुश्मन को अपने जाल में फंसाकर वहीं खत्म करना। पुराना भारत भी घर में घुसकर मारता था… ये वही ऑपरेशन था… दिसंबर 1984… RAW दफ्तर में अनुज भारद्वाज को कोड वर्ड में मैसेज मिला। रिपोर्ट पढ़ते ही भारद्वाज को अहसास हुआ कि संधू, जो अचानक गायब हो गया था, शायद इस वक्त इस्लामाबाद में है। भारद्वाज ने सोचा- ‘संधू जरूर कोई बड़ी साजिश रच रहा है। हमें जल्द से जल्द इसके ठिकाने का पता लगाना होगा।’ कुछ दिनों बाद संजीव फिर भारत पहुंचे और सीधे भारद्वाज के कमरे में उनसे मिले। भारद्वाज ने कहा, ‘अब मुझे समझ आ रहा है कि तुम्हारा इशारा किस तरफ था। बताओ, तुम्हारी योजना क्या है?’ संजीव ने तुरंत जवाब दिया, ‘सर, हमें किसी भी हाल में संधू तक पहुंचना होगा। हम ISI को संधू का इस्तेमाल करके भारत में बांग्लादेश जैसी स्थिति नहीं बनने दे सकते।’ भारद्वाज ने आंखें सिकोड़कर पूछा, ‘क्या तुम्हारा मतलब है कि ISI सीधे संधू को चला रही है?’ संजीव ने कहा, ‘ISI प्रमुख जनरल अख्तर अब्दुर रहमान खुद इस पूरे ऑपरेशन की देखरेख कर रहा है। उसने संधू को पूरी तरह अपने जाल में सेट कर रखा है और वह अब उसी के इशारों पर नाच रहा है।’ ‘तो इस ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए तुमने क्या सोचा है?’ भारद्वाज ने पूछा। संजीव ने अपना प्लान सामने रखा, ‘मुझे लंदन दूतावास में एक अंडरकवर अफसर की जरूरत है, जो क्लार्क के साथ तालमेल बिठा सके। वह सिर्फ एक बिचौलिए का काम करेगा।’ क्लार्क, संजीव का बेहद भरोसेमंद एजेंट था, जो लंदन में रहकर RAW के गुप्त मिशनों को अंजाम देता था। भारद्वाज अपनी कुर्सी से खड़े हुए और मुस्कुराते हुए बोले, ‘बड़ी कामयाबी लेकर आना, तबाही नहीं।’ संजीव भी मुस्कुराए, कुर्सी से उठे और ‘बाय’ कहकर बाहर निकल गए।संजीव ने जल्द ही लंदन दूतावास के लिए एक जासूस चुन लिया, जिसका कोड नेम रखा गया-मोहन नारायणन। नारायणन को आतंकवाद की गहरी समझ थी। वह यूरोपीय माहौल से अच्छी तरह वाकिफ था। उसकी पर्सनालिटी शानदार थी और वह बिना कोई गोपनीय जानकारी उजागर किए कहानियां गढ़ने में माहिर था। पंजाबी के अलावा उसे जर्मन और फ्रेंच भी आती थीं। ‘ऑपरेशन हॉरनेट’ को दो हिस्सों में बांट दिया गया। खुफिया जानकारी जुटाना और उसका विश्लेषण करना नारायण और क्लार्क की जिम्मेदारी थी, जबकि पूरे ऑपरेशन की कमान संजीव के कंधों पर थी। अब जनवरी 1985 का महीना आ चुका था। उस रोज संजीव वियना के एक कैफे में बैठे अपनी महिला साथी का इंतजार कर रहे थे। उसका नाम था- सोफी। हिस्ट्री से ग्रेजुएट सोफी वियना के एक NGO में काम करती थी। संजीव से उसकी पहली मुलाकात मानवाधिकार आयोग की एक कॉन्फ्रेंस में हुई थी। वहां सोफी ने पाकिस्तान की नीतियों की आलोचना की थी। उसकी बातें सुनकर संजीव काफी प्रभावित हुए थे। दूसरी तरफ, सोफी भी संजीव की राजनीतिक समझ की मुरीद हो गई थी। देखते ही देखते दोनों के बीच दोस्ती हो गई, जो धीरे-धीरे संजीव के सीक्रेट मिशन तक जा पहुंची। सोफी पाकिस्तान के खिलाफ संजीव के लिए काम करने लगी। वह अंडरकवर एजेंट्स तक पैसे पहुंचाती, नए एजेंटों को ट्रेनिंग देती और जरूरत पड़ने पर खुद हैंडलर का काम भी संभाल लेती। दिलचस्प बात यह थी कि सोफी को ये भनक तक नहीं थी कि RAW के लिए एजेंट की तरह काम कर रही है। उसे बस पाकिस्तान से नफरत थी और संजीव से लगाव। संजीव अभी सोफी के बारे में सोच ही रहे थे कि वह कैफे में दाखिल हुई। वह सीधे संजीव की टेबल पर आई और सामने रखी कुर्सी खींचकर बैठ गई। नीली आंखें, गोल फ्रेम वाला बड़ा चश्मा, कंधे तक लंबे बाल, मैट ब्लैक लेदर जैकेट, कार्गो पैंट और लेदर बूट्स। आगे चलकर ये सोफी पाकिस्तान को बहुत खटकने वाली थी… संजीव ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘आखिरकार तुम्हारे समाजवादी नेता को जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार मिल ही गया?’ सोफी ने चिढ़कर जवाब दिया, ‘तुम ऑस्ट्रिया में ब्रूनो के योगदान को नजरअंदाज नहीं कर सकते।’ वह डॉ. ब्रूनो क्रिंस्की की बात कर रही थी, जो 13 साल तक ऑस्ट्रिया के चांसलर रहे थे। ‘मुझे अच्छी तरह पता है कि उन्होंने अवॉर्ड सेरेमनी में नेहरू की तारीफ की थी,’ संजीव ने हल्का सा तंज कसा। सोफी ने सिगरेट जलाई और सीधे संजीव की आंखों में देखते हुए पूछा, ‘क्या तुमने मुझे यहां ब्रूनो और नेहरू की दोस्ती पर बात करने के लिए बुलाया है?’ ‘तुम्हें इतना चिढ़ने की जरूरत नहीं है,’ संजीव ने हंसते हुए कहा। ‘हम पूरे दो साल बाद मिल रहे हैं। मुझे तो यह भी नहीं पता कि तुम अब मेरे दोस्त बचे भी हो या नहीं,’ सोफी ने कहा। संजीव खामोश रहे। सोफी ने फिर टोका, ‘मुझसे सच-सच कहो। तुम्हारा इस तरह अचानक वापस आना मुझे डरा रहा है।’ संजीव सीधे मुद्दे पर आए, ‘क्या तुम जानती हो कि हरप्रीत आहूजा इस वक्त कहां है?’ ‘अच्छा, वह इंडियन जो हमारे NGO में काम करता था?’ सोफी ने पूछा। संजीव ने हां में सिर हिलाया। सोफी मुस्कुराई और बोली, ‘वह तो एक साल पहले ही NGO छोड़कर जा चुका है। तुम उसे क्यों ढूंढ रहे हो?’ ‘मैं चाहता हूं कि तुम उसे मेरे लिए ढूंढ निकालो,’ संजीव ने टेबल पर एक मोटा लिफाफा रख दिया। सोफी ने लिफाफे को देखते हुए पूछा, ‘इसमें क्या है?’ संजीव ने लिफाफा उठाया और वापस टेबल पर रखते हुए कहा, ’10 हजार डॉलर हैं। चाहो तो गिन सकती हो।’ ‘फिक्र मत करो, हरप्रीत मेरा पुराना दोस्त रहा है,’ सोफी ने आंख मारते हुए कहा, लिफाफा उठाया और कैफे से बाहर निकल गई। जाते-जाते उसने टेबल पर एक कागज छोड़ दिया था। संजीव ने वह कागज उठाया और चुपचाप जेब में रख लिया। दो दिन बाद संजीव पेरिस लौट आए। उन्होंने एक पब्लिक टेलीफोन बूथ से लंदन में इंडियन एंबेसी के एक सेफ नंबर पर फोन किया। दूसरी तरफ से RAW एजेंट नारायणन ने फोन उठाया। संजीव ने पूछा, ‘काम हुआ?’ नारायणन ने कोड वर्ड में जवाब दिया, ‘अब्दुल खान का एक माली है- तारिक सिद्दीकी। बंदा गद्दारी करने को तैयार है, लेकिन मोटा माल मांग रहा है।’ फोन काटते हुए संजीव के मुंह से धीरे से निकला, ‘डियर सोफी, बस तुम धोखा मत देना…’ कहानी की शुरुआत में लाहौर में जिसे गोली मारी गई, वह ISI का एजेंट अब्दुल था। यह उन दो लोगों में शामिल था, जिसकी तलाश RAW को थी। मारने वाला कौन था और उसे कैसे मारा… पूरी कहानी कल यानी रविवार को पढ़िए पार्ट-2 में… ***** रेफरेंस :



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