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दुनिया में 30 मरीज; दवा ट्रायल की मरीज बनीं नीना:दवा कंपनियों की बेरुखी से आहत मां ने छेड़ी जंग. दुर्लभ बीमारी का ट्रायल शुरू




‘लोग कहते हैं कि जब बीमारी लाइलाज हो, तो कुछ नहीं कर सकते। पर मेरा मानना है कि जब तक लड़ने की जिद है, तब तक कोई भी जंग हारी नहीं जाती।’ नीना निसार व उनके दोनों बेटे जान्सेन डिजीज से ग्रस्त हैं। यह आनुवंशिक समस्या हड्डियां मोड़ देती है। दुनिया में इसके 30 मरीज हैं। उपेक्षा के बावजूद नीना ने हार नहीं मानी व बीमारी पर शोध के लिए फंड जुटाया। अब दवा के क्लिनिकल ट्रायल की पहली मरीज बन गई हैं, पढ़िए उनकी कहानी… ‘दुबई में 1978 में जन्म के बाद बचपन से रहस्यमयी बीमारी से जूझ रही थी। कद 3 फीट 9 इंच रह गया, पसलियां मुड़ गईं, रीढ़ झुक गई और असहनीय दर्द मेरा साथी बन गया। मुझे व्हीलचेयर पर बैठे देख लगता था मानो किस्मत ने सब कुछ छीन लिया हो। लेकिन इसी नाजुक शरीर में अद्भुत हौसला बसता था। इंजीनियर पिता करीम ने इलाज के लिए जमा-पूंजी खर्च कर दी। वे मुझे लेकर लंदन से अमेरिका तक भटके, अनेक सर्जरियां कराईं, पर डॉक्टर बीमारी पहचान नहीं सके। वर्षों बाद मेरी शादी हुई। डॉक्टरों ने कह दिया था कि मैं कभी मां नहीं बन पाऊंगी, पर मैंने बेटे अरशान को जन्म दिया। यह खुशी ज्यादा समय तक नहीं टिकी। दो साल बाद अरशान की हड्डियां भी टेढ़ी होने लगीं और जल्द ही दूसरे बेटे जहान में भी वही लक्षण दिखाई दिए। अपने बच्चों को उसी असहनीय दर्द से गुजरते देख मैं टूटने लगीं। आखिर केरल की बाल आनुवंशिकी विशेषज्ञ डॉ. शीला नंबूथिरी ने रहस्य सुलझाया। एक्स-रे देखते ही उन्होंने बताया कि यह अत्यंत दुर्लभ ‘जान्सेन डिजीज’ है, जिसके दुनिया में तब सिर्फ 30 मरीज थे। 1990 के दशक में वैज्ञानिक डॉ. थॉमस गार्डेला इस बीमारी को पैदा करने वाले जीन को नियंत्रित करने वाला पेप्टाइड खोज चुके थे, पर शोध फाइलों में दबा रह गया। वजह यह थी कि गिने-चुने मरीजों के लिए कोई दवा कंपनी करोड़ों डॉलर लगाना नहीं चाहती थी। मेडिकल सम्मेलन में तो मुझे यह तक कह दिया,‘चार मरीजों की भला कौन परवाह करेगा?’ उस कड़वे सच ने मुझे तोड़ा नहीं, बल्कि मेरे भीतर सोई मां को वीरांगना बना दिया। अपने बेटों के भविष्य की खातिर मैं वैज्ञानिकों, शोध संस्थानों और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के दरवाजे खटखटाती रहीं। मेरी अथक कोशिशें रंग लाई और आखिर एनआईएच के दुर्लभ रोग केंद्र ने इस शोध को आगे बढ़ाने की मंजूरी दे दी।
कुछ दिन पहले मैरीलैंड स्थित एनआईएच क्लिनिकल सेंटर में मैं इतिहास रच रही थी। मैं इस प्रायोगिक दवा के पहले इंसानी ट्रायल की पहली प्रतिभागी बनी, मुझे पता है कि यह दवा मेरी टेढ़ी हो चुकी हड्डियों को ठीक नहीं कर सकती, पर मेरा फोकस खुद पर नहीं, बल्कि बेटे अरशान, जहान और भविष्य के अन्य मरीज हैं। उम्मीद है कि इलाज बीमारी को शुरुआती चरण में ही रोक सकेगा। मुझे लगता है कि डॉक्टर भले कभी-कभी हाथ खड़े कर दें, पर जब तक इंसान हार नहीं मानता, उम्मीद जीवित रहती है। मेरा संघर्ष इसी अटूट विश्वास की मिसाल है।’- नीना



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