हिसार35 मिनट पहले
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हिसार के रहने वाले उद्योगपति डॉ. सुभाष चंद्रा कर्ज माफी फॉर्मूले पर विवादों में हैं।
जी ग्रुप के फाउंडर सुभाष चंद्रा ने सोमवार को 22 हजार करोड़ के कर्ज के मामले में सोशल मीडिया पर लाइव आकर सफाई दी। इस दौरान उन्होंने 3 पन्नों का एक डॉक्यूमेंट शेयर करते हुए दावा किया कि मामले को लेकर गलतफहमी और गलत धारणाएं फैलाई जा रही हैं। हालांकि, चंद्रा ने इस लाइव के दौरान कमेंट सेक्शन को लॉक रखा था, जिस वजह से सिर्फ एकतरफा बात ही सामने आ पाई।
असल में यह विवाद तब और गहरा गया था जब भगोड़े कारोबारी विजय माल्या ने X पर पोस्ट कर NCLT के फैसले को “भारतीय इंसाफ का असली मजाक” करार दिया था। आरोप लगाया था कि 22 हजार करोड़ रुपए के कर्ज को महज कुछ करोड़ में निपटाया जा रहा है।

सुभाष चंद्रा की ओर से सोशल मीडिया पर रात को की गई पोस्ट।
डॉक्यूमेंट्स के जरिए सुभाष चंद्रा ने क्या दावे किए…
- 1. मेरी व्यक्तिगत उधारी शून्य : सुभाष चंद्रा के बयान के मुताबिक, उन्होंने व्यक्तिगत रूप से शून्य उधारी ली है। 22,000 करोड़ रुपए की राशि उनके द्वारा दी गई ‘पर्सनल गारंटी’ की कुल रकम थी।
- 2. ₹4,800 करोड़ की गारंटी ही मूल उधारी के वक्त दी गई थी : दस्तावेज में स्पष्ट किया गया है कि ₹22,000 करोड़ की पर्सनल गारंटी में से केवल ₹4,800 करोड़ की गारंटी ही कंपनियों द्वारा कर्ज लेते समय दी गई थी। बाकी की गारंटी डिफॉल्ट होने के बाद दी गई थीं।
- 3. कुल 4,808 करोड़ में से 3,803 करोड़ रुपए चुकाए जा चुके हैं : सुभाष चंद्रा की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, बैंकों/वित्तीय संस्थानों द्वारा जारी कुल राशि ₹4,808 करोड़, उधारकर्ताओं द्वारा वापस चुकाई गई राशि: ₹3,803 करोड़ और शेष मूल बकाया राशि केवल ₹998 करोड़ है।
- 4. ₹5,311 करोड़ के दावे के मुकाबले शेष दावा ₹4,262 करोड़ : बैंकों ने ₹998 करोड़ के मूल बकाए के खिलाफ कुल ₹5,311 करोड़ का दावा पेश किया था। इसमें से ₹1,049 करोड़ के दावों का निपटारा/भुगतान हो चुका है, जिसके बाद अब शेष दावा ₹4,262 करोड़ का रह गया है।
- 5. सभी देनदारियों के निपटान का भरोसा : चंद्रा ने कहा कि उन्होंने सभी उधारकर्ताओं से चर्चा की है और उन्होंने आश्वासन दिया है कि लेंडर्स (बैंकों) के साथ खातों के मिलान के बाद शेष ₹4,262 करोड़ का भुगतान और निपटारा कर दिया जाएगा।

दस्तावेजों में दिया प्रमुख बैंकों और लेंडर्स का ब्योरा
- इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस: ₹726 करोड़ के लोन में से ₹771 करोड़ वापस किए गए। व्यक्तिगत दिवालियापन कार्यवाही शुरू होने के बाद इसे पूरी तरह सेटल कर दिया गया है।
- एक्सिस बैंक ग्रुप: ₹388 करोड़ के डिस्बर्समेंट में से ₹157 करोड़ चुकाए जा चुके हैं। सेटलमेंट प्रक्रिया के तहत शेष भुगतान जारी है।
- इन बैंकों की सेंटलमेंट प्रक्रिया चल रही : HDFC ग्रुप, केनरा बैंक, एडेलवाइस, फ्रैंकलिन टेम्पलटन, इंडसइंड बैंक, LIC हाउसिंग फाइनेंस, RBL बैंक, यूनियन बैंक के पास या तो पर्याप्त सिक्योरिटी उपलब्ध थी या फिर इनके दावों का पुनर्मूल्यांकन और सेटलमेंट की प्रक्रिया चल रही है।
अब जानिए सुभाष चंद्रा के कर्ज निपटारे का मामला क्या है…
सवाल 1. NCLT ने सुभाष चंद्रा के पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामले में क्या फैसला सुनाया है?
जवाब: इंसॉल्वेंसी ट्रिब्यूनल NCLT ने सुभाष चंद्रा के रीपेमेंट प्लान को इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड की धारा 114 के तहत मंजूरी दे दी है। इसके तहत सुभाष चंद्रा को ₹22,006.57 करोड़ के कुल कर्ज के बदले महज ₹6.5 करोड़ का भुगतान करना होगा। इसके बाद उनका बाकी का पूरा ₹22,000 करोड़ से अधिक का बकाया कानूनी तौर पर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
सवाल 2. यह फैसला किसने सुनाया और ट्रिब्यूनल में राय क्या थी?
जवाब: इससे पहले NCLT की दो सदस्यीय बेंच में इस मामले को लेकर विभाजित राय आई थी। इसके बाद NCLT चेयरमैन ने तीसरे सदस्य के रूप में जुडिशियल मेम्बर नीलेश शर्मा को नियुक्त किया। नीलेश शर्मा ने बहुमत के आधार पर 144 पन्नों के आदेश में रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी।
सवाल 3. क्या सुभाष चंद्रा ने खुद ₹22,006 करोड़ का पर्सनल लोन लिया था?
जवाब: नहीं, यह रकम सुभाष चंद्रा द्वारा दी गई ‘पर्सनल गारंटी’ से जुड़ी है। जब किसी कंपनी या मूल कर्जदार को बैंक लोन देते हैं, तो कई बार प्रमोटर अपनी व्यक्तिगत गारंटी देता है कि अगर कंपनी भुगतान नहीं कर पाई, तो वह इसे चुकाएगा।
एस्सेल ग्रुप की कंपनियों के लिए गए लोन के लिए सुभाष चंद्रा ने पर्सनल गारंटी दी थी। कंपनियों के डिफॉल्ट करने पर यह क्लेम सुभाष चंद्रा पर आ गया। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने यह सारा पैसा व्यक्तिगत तौर पर उधार लिया था।
सवाल 4. यह पूरा मामला कब और कैसे शुरू हुआ था?
जवाब: यह पूरा मामला साल 2016 में शुरू हुआ था, जब इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस (IHF) ने कुछ कंपनियों को ₹726 करोड़ का लोन दिया। 2018 में डॉ. सुभाष चंद्रा इस लोन के पर्सनल गारंटर बने, यानी कंपनी के पैसे न चुकाने पर उन्हें यह रकम भरनी थी।
जब कंपनियों ने डिफॉल्ट किया, तो इंडियाबुल्स ने 2022 में सुभाष चंद्रा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी। 2024 में NCLT ने इस केस को आगे बढ़ाया।
अब सवाल उठता है कि मामला ₹178 करोड़ के नोटिस से शुरू होकर ₹22,000 करोड़ तक कैसे पहुंचा? दरअसल, नियम यह है कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया शुरू होती है, तो उसके सारे कर्जदाता अपना-अपना बकाया मांगने आ जाते हैं।
सुभाष चंद्रा ने एस्सेल ग्रुप की दूसरी कंपनियों के कर्जों के लिए भी HDFC, एक्सिस, कैनरा और RBL जैसे कई अन्य बैंकों को पर्सनल गारंटी दे रखी थी।
इन सभी बैंकों के पुराने कर्जों, सालों के भारी-भरकम ब्याज और पेनल्टी को आपस में मिलाकर कुल क्लेम ₹22,006.57 करोड़ हो गया। इसी ₹22,000 करोड़ के बकाए के बदले अब NCLT ने ₹6.5 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी है।
सवाल 5. किस प्रमुख बैंक या संस्थान ने इस फैसले का विरोध किया था?
जवाब: LIC हाउसिंग फाइनेंस की अगुआई में कुछ कर्जदाताओं ने इस रीपेमेंट प्लान पर आपत्ति जताई थी। LIC हाउसिंग ने इसे “अव्यवहारिक और गैर-कानूनी” बताते हुए कहा था कि उन्हें ₹1,322.39 करोड़ के बकाए के बदले केवल ₹38.09 लाख दिए जा रहे हैं।
सवाल 6. NCLT ने असहमति जताने वाले लेनदारों की आपत्तियों को क्यों खारिज किया?
जवाब: NCLT ने पाया कि विरोध करने वाले लेनदारों के पास 20% से भी कम वोटिंग शेयर थे। रीपेमेंट प्लान को 80.81% वोटिंग शेयर वाले लेनदारों की जरूरी मंजूरी मिल चुकी थी। कानून के मुताबिक, बहुमत की मंजूरी के कारण ट्रिब्यूनल ने आपत्तियों को खारिज कर दिया।
सवाल 7. क्या इसका मतलब यह है कि बैंकों का ₹22,000 करोड़ का कर्ज पूरी तरह डूब गया?
जवाब: नहीं, 99.97% का हेयरकट केवल सुभाष चंद्रा की ‘व्यक्तिगत गारंटी’ के क्लेम पर लागू होता है। जिन मूल कंपनियों ने लोन लिया था, वे अब भी कर्जदार बनी हुई हैं।
बैंक उन कंपनियों, उनकी संपत्तियों और अन्य गिरवी रखे गए कोलेटरल से अपनी वसूली जारी रख सकते हैं। NCLT ने भी अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि क्रेडिटर्स के पास मूल कर्जदारों से वसूली का अधिकार बना रहेगा।
सवाल 8. इस फैसले का भारतीय बैंकिंग और कॉर्पोरेट सेक्टर पर क्या असर पड़ेगा?
जवाब: यह फैसला आने वाले ऐसे सभी मामलों के लिए एक बड़ी मिसाल बनेगा। इससे साफ संदेश मिलता है कि अगर 75% से ज्यादा कर्ज देने वाले बैंक या लोग किसी रीपेमेंट प्लान पर राजी हो जाते हैं, तो अदालत उनके इस कारोबारी फैसले को ही सर्वोच्च मानेगी।
फिर भले ही बैंकों को उनका 99% से ज्यादा पैसा छोड़ना पड़े और रिकवरी के नाम पर सिर्फ नाममात्र की रकम ही क्यों न मिले।



