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Boria Majumdar Column | Pakistan Cricket Crisis & Babar Azam Controversy


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4 घंटे पहले

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बोरिया मजुमदार सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा के सहलेखक और खेल पत्रकार - Dainik Bhaskar

बोरिया मजुमदार सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा के सहलेखक और खेल पत्रकार

इंग्लैंड के साथ टेस्ट सीरीज के अधबीच में पाकिस्तान ने घबराकर ऐसा कदम उठा लिया कि पूछिए मत। उसने सात खिलाड़ियों को वापस भेज दिया और कोचों को हटा दिया और मानो उन्हें सबक सिखाने की नजीर पेश करना चाहता हो।

अब बाबर आजम ऑन-रिकॉर्ड कह रहे हैं कि उन्हें इन फैसलों की कोई जानकारी ही नहीं थी। तो आखिर पीसीबी इन खिलाड़ियों को घर भेजकर किस बात का उदाहरण सामने रखना चाहता था? बेइज्जती और दुर्व्यवहार का? और जो कुछ उन्होंने किया, उससे पाकिस्तान के दूसरे खिलाड़ियों को क्या संदेश जा रहा है?

खिलाड़ियों और कोचों पर तो गाज गिर रही है, लेकिन अधिकारियों का क्या? उनके बारे में एक शब्द तक क्यों नहीं? वे जवाबदेह क्यों नहीं हैं? ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई उनसे एक सवाल तक न करे और वे ऐसे काम करते रहें, जैसे कुछ हुआ ही नहीं?

सच्चाई यह है कि खिलाड़ी आसान निशाना और मोहरे हैं। पीसीबी उनके साथ तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करके बच निकल सकता है। और चूंकि वह सत्ता की स्थिति में है, इसलिए कोई उसे चुनौती देने की हिम्मत नहीं करेगा। पाकिस्तानी क्रिकेट और उसका खेल जगत वहां पर खेल प्रशासन की कमान संभाल रहे राजनीतिक वर्ग के अहंकार का शिकार हो गया है।

ये सच है कि खिलाड़ियों ने भी सीरीज में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है, लेकिन अगर आप ड्रेसिंग रूम में यह सुन रहे हों कि आपका बोर्ड मैच और सीरीज का बहिष्कार करने की धमकी दे रहा है, तो आप किस मानसिक स्थिति में खेल जारी रखेंगे? आप अपने काम पर कैसे फोकस कर पाएंगे?

सलमान आगा का ही उदाहरण लीजिए। उन्हें पहले टेस्ट में आखिरी वक्त पर कप्तानी संभालने के लिए कहा गया और फिर दूसरे टेस्ट के लिए टीम से बाहर कर दिया गया। अब तीसरे टेस्ट से पहले उन्हें घर भेज दिया गया है। यह हास्यास्पद है। आप इंग्लैंड में एक टेस्ट मैच के आधार पर किसी खिलाड़ी का आकलन कैसे कर सकते हैं? वह भी तब, जब आखिरी क्षण में उसे कप्तानी की जिम्मेदारी सौंपी गई हो?

पाकिस्तान में बहुत लंबे समय से चीजों को यूं ही चलते रहने दिया गया है। बहुत लंबे समय से खिलाड़ी और कमेंटेटर चुप रहे हैं। आखिरकार अब हम प्रभावशाली लोगों को आवाज उठाते देख रहे हैं। पूर्व खिलाड़ियों को बोलना ही होगा, क्योंकि अंत में नुकसान सिर्फ खेल का ही होता है।

जिन खिलाड़ियों को वापस भेज दिया गया है, वे अपमानित होकर घर लौट रहे हैं और उनका भविष्य अनिश्चित नजर आ रहा है। और जो खिलाड़ी इंग्लैंड में खेल रहे हैं, उनके पास परिस्थितियों के अनुकूल ढलने का समय नहीं है। ऐसे में तो टीम को मानसिक रूप से पूरी तरह टूट ही जाना है।

और व्यापक तस्वीर यह है कि इन तमाम घटनाओं को पाकिस्तान के एक “फेल्ड-स्टेट’ होने से जोड़ा जा सकता है। खेल महज उसका एक और प्रतिबिम्ब है। हर जगह तस्वीर भयावह है। कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं है, जो उम्मीद की किरण बन सके। वहां हर चीज पर राजनीति हावी है।

हर स्तर पर दखल और नियंत्रण ने पाकिस्तान के खेल का बेड़ा गर्क कर दिया है। क्रिकेट टीम महज इस बात का उदाहरण हैं कि इस तरह का हस्तक्षेप क्या कर सकता है। दोष खिलाड़ियों पर मढ़ा जा रहा है। लेकिन क्या गलती उन्हीं की है? क्या पाकिस्तान के पतन की सारी जिम्मेदारी उन्हीं पर डालकर बाकी चीजों पर परदा डाला जा सकता है?

बड़ा सवाल यह भी कि आज पाकिस्तान में कितने लोग उन राजनेताओं पर उंगली उठाएंगे, जो खेल में लगातार दखल देते रहे हैं और जिन्होंने पाकिस्तान क्रिकेट को इस हालत में पहुंचा दिया है? यह एक समूची व्यवस्था की विफलता है। ढांचे का पूरी तरह चरमरा जाना है।

यह एक ऐसी निष्प्राण राज्य-व्यवस्था, जिसमें खेल का कोई महत्व ही नहीं रह गया है। लॉर्ड्स में पाकिस्तानी टीम के समर्पण और हॉकी में उसकी दुर्दशा का कारण भी यही है।

फिलहाल एक मुल्क के रूप में तो पाकिस्तान की यही कहानी है और ऐसा संकेत देने वाली बहुत कम चीजें हैं कि इसमें जल्द कोई बदलाव आने वाला है। तब तक प्रशंसक और खिलाड़ी बड़े राजनीतिक अहंकारों की बलिवेदी पर लगातार कुर्बान किए जाते रहेंगे।

पाकिस्तान में हर जगह तस्वीर भयावह है। तमाम चीजों पर सियासत हावी है। हर स्तर पर दखल और नियंत्रण ने पाकिस्तान के खेल का बेड़ा गर्क कर दिया है। क्रिकेट टीम महज इस बात का उदाहरण है कि खेल में इस तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप क्या कर सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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