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कांगड़ा जिले की धीरा तहसील के एक 64 वर्षीय रिटायर्ड अधिकारी से साइबर ठगों ने 33 लाख रुपए ठग लिए। ठगों ने करीब एक महीने तक उन्हें डिजिटल अरेस्ट में रखा। पहले उन्होंने टेलीकॉम कंपनी का अधिकारी बनकर फोन किया, फिर पुलिस, आईपीएस और सीबीआई अधिकारी बनकर 6.8 करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग में फंसाने का डर दिखाया। गिरफ्तारी से बचाने के नाम पर पीड़ित से अलग-अलग खातों में पैसे ट्रांसफर करवाए गए। साइबर क्राइम पुलिस थाना धर्मशाला में दर्ज शिकायत के अनुसार, ठगी का यह सिलसिला 30 जुलाई को शुरू हुआ। फोन करने वाले ने पीड़ित को बताया कि उनके आधार कार्ड पर आईसीआईसीआई बैंक में एक खाता खोला गया है। इस खाते का इस्तेमाल 6.8 करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग में हुआ है। इसके बाद पुलिस अधिकारी बनकर फोन करने वाले ने कहा कि उनके नाम गिरफ्तारी वारंट जारी हो गया है। अलग अलग लोगों को सरकारी अधिकारी बताया ठगों ने पीड़ित का भरोसा जीतने के लिए अलग-अलग लोगों को सरकारी अधिकारी बताया। एक व्यक्ति ने खुद को आईपीएस अधिकारी बताते हुए कहा कि उसने मामले को खत्म कराने के लिए 70 लाख रुपए कमीशन लिया है। इसके बाद सीबीआई अधिकारी बनकर एक शख्स ने जांच का बहाना बनाकर पीड़ित पर निगरानी शुरू कर दी। ठगों ने यहां तक कहा कि पीड़ित की सुरक्षा के लिए दो लोगों को तैनात किया गया है। पीड़ित को निर्देश दिए गए कि वह हर एक-दो घंटे में अपनी खैरियत की जानकारी दे। घर से बाहर निकलने और वापस लौटने की जानकारी भी ठगों को देनी पड़ती थी। फोन और वीडियो कॉल के जरिए लगातार संपर्क में रखकर ठगों ने ऐसा माहौल बना दिया कि पीड़ित को हर समय गिरफ्तारी का डर सताता रहा। बैंक खातों और मोबाइल की जांच का बहाना बनाया इसके बाद ठगों ने बैंक खातों और मोबाइल की जांच का बहाना बनाया। पीड़ित को बताया गया कि जांच के लिए उनके खाते में मौजूद पैसे को बताए गए बैंक खाते में ट्रांसफर करना होगा। लगातार मिल रही धमकियों और मानसिक दबाव के बीच पीड़ित ने ठगों की बात मान ली। शिकायत के अनुसार 12 अगस्त को 4 लाख रुपए और 20 अगस्त को 29 लाख रुपए आरटीजीएस के जरिए बताए गए खातों में ट्रांसफर किए गए। इस तरह कुल 33 लाख रुपए ठगों के हाथ चले गए। 28 अगस्त को फोन बंद हुए तो खुला ठगी का राज रकम ट्रांसफर होने के बाद भी ठगों का संपर्क जारी रहा। करीब एक सप्ताह बाद 28 अगस्त की सुबह अचानक फोन और वीडियो कॉल बंद हो गए। लंबे समय तक संपर्क नहीं होने पर पीड़ित को संदेह हुआ। तब उन्हें एहसास हुआ कि जिन लोगों से वे पुलिस, आईपीएस और सीबीआई अधिकारी समझकर बात कर रहे थे, वे साइबर ठग थे। मोबाइल नंबर और बैंक खातों की जांच में जुटी पुलिस शिकायत के आधार पर साइबर क्राइम पुलिस थाना धर्मशाला ने भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66(डी) के तहत केस दर्ज किया है। पुलिस ठगी में इस्तेमाल मोबाइल नंबरों, बैंक खातों और डिजिटल लेनदेन की जांच कर रही है। रकम किन खातों में पहुंची और इस नेटवर्क में कितने लोग शामिल हैं, इसका पता लगाया जा रहा है। साइबर ठगी का नया हथियार डिजिटल अरेस्ट बन चुका है। पुलिस या सीबीआई का कोई अधिकारी फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे ट्रांसफर करने को नहीं कहता। ऐसे किसी कॉल पर घबराने के बजाय संबंधित एजेंसी से आधिकारिक माध्यम से सत्यापन करना चाहिए।
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कांगड़ा में रिटायर्ड अफसर से 33 लाख की ठगी:एक महीने तक डिजिटल अरेस्ट रखा, मनी लॉन्ड्रिंग में फंसाने का डर दिखाया
