राजस्थानी प्रेम कहानी के पार्ट-1 में आपने पढ़ा कि किस तरह राजा सावंत सिंह, बणी-ठणी के कायल हो गए। सावंत सिंह के जीवन में कविता और भक्ति पहले से थी, लेकिन बणी-ठणी को गाते और कविता पाठ करते सुना, तो उनकी साधना का रंग ही बदल गया। धीरे-धीरे राजा सावंत और
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पार्ट-2 में पढ़िए आगे की कहानी…
राजा सावंत सिंह के जीवन को भक्ति और कविता पूर्णता प्रदान करते थे, लेकिन उस दिन बणी-ठणी को सुनने के बाद उनकी साधना में अध्यात्म का एक नया और गहरा आयाम जुड़ गया था।
धीरे- धीरे राजा और बणी- ठणी का रिश्ता जैसे राधा और कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम का रूपक बन गया था। दोनों कृष्ण और राधा की तरह एक-दूसरे के पूरक थे। दोनों एक-दूसरे को कविताएं लिखते और अपनी भक्ति को शब्दों में पिरोते और संवाद करते थे।

अब नागरीदास (सावंत सिंह) और रसिक बिहारी (बणी- ठणी) अक्सर कृष्ण भक्ति की रचनाओं की इस जुगलबंदी का आनंद लेते, दोनों के बीच लिखी रचनाओं को लेकर गहरा संवाद होता जो राधा और कृष्ण के दिव्य प्रेम को दर्शाता –
सावंत सिंह: ‘राधा-माधव के मिलन की आस… मन भावन, पावन यह एहसास…’ बणी- ठणी, क्या तुम मेरी कविता में ‘राधा’ का अक्स देखती हो?
बणी- ठणी: महाराज,आपकी कविता दिव्य प्रेम की गूंज है। मैं तो बस उस धुन को समझती हूं।
कविता और भक्ति के इस रस ने किशनगढ़ के वातावरण को सराबोर कर दिया था। इधर राजा का प्रिय दरबारी चित्रकार निहाल चंद इस आध्यात्मिक और निश्छल जुड़ाव का साक्षी बन रहा था। एक ऐसा भाव जिसकी गहराई को शब्दों में बांध पाना मुश्किल था। निहाल चंद ने अपनी कूंची से भाव और भक्ति के इस पूरे वातावरण को खास चित्र श्रृंखला में उतार दिया।

चित्र श्रृंखला में छलकता राधा और कृष्ण का आध्यात्मिक प्रेम।
इन चित्रों में राधा-कृष्ण प्रेम था, भक्ति थी और एक अनूठा सौंदर्य। इसी श्रृंखला को बनाते हुए निहाल चंद ने राधा की वो अद्भुत पेंटिंग बनाई जो समय बीतने के साथ बणी- ठणी के नाम से प्रचलित हुई।

निहाल चंद की यही पेंटिंग ‘बणी- ठणी’ के नाम से प्रचलित हुई।
किशनगढ़ शैली के वरिष्ठ चित्रकार शंकर सिंह राठौड़ बताते हैं कि विद्वानों के अनुसार सावंत सिंह उन्हें राधा स्वरूप मानते थे और खुद को कृष्ण स्वरूप समझ कर पोएट्री करते थे।

राधा की इसी पेंटिंग की तुलना लेखक एरिक डिकिन्सन ने लिओनार्डो दा विंची की ‘मोनालिसा’ से की और उसे भारत की मोनालिसा कहा। इतना ही नहीं 1973 में भारत सरकार ने ‘राधा’ का डाक टिकट निकाल कर इस पेंटिंग को सम्मानित भी किया।

किशनगढ़ आर्टिस्ट पवन कुमावत बताते हैं – कला समीक्षक, कार्ल खंडेलवाला और एरिक डिकिंसन यहां आए और उन्होंने राधा के चित्र को देखा। इससे पहले उन्होंने मोनालिसा का चित्र भी देखा था, तो उन्होंने पाया कि दोनों ही चित्र अपने आप में श्रेष्ठता स्थापित करते हैं। दोनों की मुस्कान विशेष स्थान रखती है, जिसके चलते उन्होंने कहा कि राधा का ये चित्र भारत की मोनालिसा है।
(कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। फोटो व पेंटिंग आभार : किशनगढ़ पूर्व राजपरिवार, चित्रकार,शहज़ाद अली शेरानी )
इनपुट सहयोग- रोहित पारीक
राधा कृष्ण की चित्र श्रंखला बनाते हुए निहाल चंद को ‘बणी- ठणी’ पेंटिंग बनाने की प्रेरणा कैसे मिली? ऐसा क्या था इस पेंटिंग में जिसके कारण इसे दुनियाभर के कला जगत में ख़ास पहचान मिली।
जानेंगे कल के एपिसोड में…

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बणी- ठणी कौन थी? ऐसा क्या था उस तस्वीर में जो राजस्थान की धरोहर बनी, जिसने किशनगढ़ शैली को दुनिया भर के कला जगत में पहचान दिलाई। जानते हैं राजा सावंत सिंह और बणी- ठणी की कहानी, जिनके प्रेम और भक्ति को कलाकार निहाल चंद ने अमर कर दिया… पूरी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
