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हिमाचल हाईकोर्ट ने सरकार का फैसला रद्द किया:प्लेसमेंट के दिन से प्रिंसिपलों को पूरी सैलरी दी जाए; 30 नवंबर तक बकाया भुगतान चुकाना होगा




हिमाचल हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग में प्रवक्ताओं को प्रिंसिपल का काम सौंपकर कम वेतन देने के मामले में सरकार के फैसले को गलत और भेदभावपूर्ण माना है। कोर्ट ने कहा कि जब कर्मचारियों से प्रिंसिपल पद की पूरी जिम्मेदारी और काम लिया गया, तो उन्हें उस पद का वेतन देने से इनकार नहीं किया जा सकता। जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की बैंच ने सुरिंदर सिंह समेत 9 याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए कि याचिकाकर्ताओं को जिस तारीख से उन्होंने प्रिंसिपल का कार्यभार संभाला था, उसी तारीख से प्रिंसिपल का उच्च वेतनमान और ग्रेड-पे दिया जाए। इस अवधि का बकाया भी उन्हें देना होगा। कोर्ट ने यह भुगतान 30 नवंबर 2026 तक करने के निर्देश दिए हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार वे शिक्षा विभाग में नियमित प्रवक्ता थे और प्रिंसिपल पद पर पदोन्नति के लिए पात्र थे। प्रिंसिपल के पद खाली होने के बावजूद नियमित विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की बैठक नहीं हुई। इसके बजाय सरकार ने उन्हें प्लेसमेंट के आधार पर प्रिंसिपल का कार्यभार दे दिया। हालांकि, उन्हें उनका पुराना वेतन ही मिलता रहा। सरकार के आदेश में यह भी कहा गया था कि प्लेसमेंट के दौरान उन्हें प्रिंसिपल पद का अतिरिक्त वित्तीय लाभ नहीं मिलेगा। 2025 में नियमित प्रिंसिपल बनाया गया बाद में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद नियमित DPC की बैठक हुई। 8 मई 2025 को याचिकाकर्ताओं को नियमित रूप से प्रिंसिपल नियुक्त किया गया। हालांकि, सरकार ने उन्हें वित्तीय लाभ नियमित नियुक्ति की तारीख से ही दिए। प्लेसमेंट के दौरान की अवधि का लाभ सिर्फ कागजों में माना गया। इसके खिलाफ प्रवक्ताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सरकार की दलील कोर्ट ने नहीं मानी सरकार ने कोर्ट में दलील दी कि प्रवक्ताओं को सिर्फ अस्थायी तौर पर प्रिंसिपल की जिम्मेदारी दी गई थी। सरकार के अनुसार उन्होंने बिना अतिरिक्त वित्तीय लाभ के काम करने की सहमति दी थी। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि जब किसी कर्मचारी से ऊंचे पद की जिम्मेदारियां और काम लिया जाता है, तो उसे उस पद के अनुसार वेतन पाने का अधिकार है। हेडमास्टरों को पहले मिल चुका है लाभ कोर्ट ने यह भी पाया कि प्रिंसिपल पद के लिए हेडमास्टर और लेक्चरर दोनों ही 50:50 के अनुपात में फीडर कैडर हैं। वर्ष 2015 से 2018 के दौरान हेडमास्टरों को प्लेसमेंट के आधार पर प्रिंसिपल बनाया गया था। उस समय सरकार ने उन्हें कार्यभार संभालने की पहली तारीख से ही उच्च वेतनमान और वरिष्ठता समेत सभी लाभ दिए थे। कोर्ट ने कहा कि एक ही पद के लिए समान स्थिति वाले कर्मचारियों के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने सरकार के संबंधित आदेश रद्द करते हुए शिक्षा विभाग को वित्तीय लाभ और बकाया राशि की गणना करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सभी 9 याचिकाकर्ताओं को उनके प्रिंसिपल पद का कार्यभार संभालने की वास्तविक तारीख से वेतन का लाभ दिया जाए और 30 नवंबर 2026 तक बकाया राशि का भुगतान कर दिया जाए।



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