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रश्मि बंसल का कॉलम:जहां जात से कोई छोटा नहीं, मेरा आदर्श भारत है वही…




मेरे पिताजी साइंटिस्ट थे, और मैं बंबई में पली-बढ़ी। हमारी कॉलोनी में हर तरह के लोग थे- बंगाली, मराठी, साउथ इंडियन। मेरी पढ़ाई भी ऐसे स्कूल में हुई, जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई- सब साथ पढ़ते थे। मिल-जुल कर रहना हमारे लिए आम बात थी। हां, मेरे पड़ोसी सांभर खाते हैं, और हम अरहर की दाल। लेकिन यह तो अच्छी बात है ना? वो अपने घर पर हल्दी-कुमकुम रखते हैं, और जन्माष्टमी पर मेरे घर पर सजती है झांकी। यह हुई ना बात। घर पर हम अपनी भाषा इस्तेमाल करते हैं और बाहर अंग्रेजी, कोई वाद-विवाद नहीं। औरों का खान-पान, भेष, बोली या धर्म मुझसे अलग होना आम बात है। यही बंबई शहर की खासियत थी। जबकि स्मॉल टाउन में रहने वाले मेरे रिश्तेदारों को आश्चर्य होता था। क्योंकि उस वक्त उन्हें इतना एक्सपोजर नहीं था। वो एक दायरे के अंदर, ‘अपने जैसों’ के बीच बंधकर रहते थे। शायद मैं बारह साल की थी, जब मैं ट्रेन से सफर कर रही थी और किसी ने मुझसे पूछा- तुम्हारा कास्ट क्या है? अब स्कूल में पढ़ा तो था कि चार कास्ट होते हैं और पापा से डिस्कस भी किया था कि हमारा कास्ट कौन-सा है। लेकिन मेरे मन में था कि कास्ट तो एक ऐतिहासिक मामला है, आज के इंडिया में इसका क्या लेना-देना। खैर, वो मेरी मासूमियत समझिए या बुद्धूपन। मुझे सचमुच जात-पात, भेदभाव का कोई एहसास नहीं था। हमारे घर पर कामवाली आती थी, शायद उनका कास्ट हमसे अलग होगा, लेकिन इसका जिक्र मेरे घर पर कभी हुआ नहीं। हम ‘बेस्ट’ बस में अकसर जाते थे, बगल में कौन बैठा है किसे पता। क्या मैं अपने खयालों की आदर्श दुनिया में रहती थी? जब मंडल कमीशन ने ओबीसी कोटा की घोषणा की और दिल्ली यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों ने बवाल खड़ा किया, तब पता चला कि यह देश का एक अहम मुद्दा है। उस समय मेरी सोच थी कि रिजर्वेशन सही नहीं है, सीट उसे मिलनी चाहिए जो अव्वल नंबर लाए। आज मैं दोनों तरफ से सिचुएशन को देख सकती हूं, समझ सकती हूं। एक लेखक होते हुए मुझे दूर-दराज क्षेत्रों में जाने का मौका मिला। लोगों से बात की, उनकी समस्याएं सुनीं। ओडिशा में कंधमाल जिला हो या छत्तीसगढ़ का बस्तर, विकास तो हुआ है, लेकिन अब भी बहुत काम बाकी है। गांव-कस्बे में कास्ट का दबदबा है, इसे नकारा नहीं जा सकता। अगर यहां के होनहार बच्चों को लाइफ में आगे बढ़ने का मौका मिले तो रिजर्वेशन का सही उपयोग है। जब इन परिवारों में से कोई एक बाहर की दुनिया में कदम रखेगा तो उनके पूरे समाज को प्रेरणा मिलेगी। एक आशा जगेगी। इन्हीं बच्चों के लिए जवाहर नवोदय विद्यालय खोले गए हैं। ताकि पांचवीं क्लास से एक माहौल मिले, वो तालीम मिले, जिससे वो अपने बल पर आगे बढ़ पाएं। लेकिन क्या यह काफी है? शायद नहीं। कास्ट का लेबल कभी-कभी बच्चे की साइकी पर बोझ बन जाता है। आत्मविश्वास को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है। इस संदर्भ में मैंने इंस्टाग्राम पर एक अजूबा अकाउंट देखा, जिसका नाम है @चमारस्टूडियो। सुधीर राजभर इस कम्युनिटी से आते हैं, जो कभी चमड़े का काम करते थे, अछूत माने जाते थे, लेकिन सुधीर राजभर ने उलटा किया। मैं इस कम्युनिटी से हूं, मुझे गर्व है, वो कहते हैं। हमें अपने हाथों से काम करना आता है और यह काम बढ़िया है। उन्होंने कई सारे कारीगरों को जोड़कर एक कंपनी खोली है, जो अव्वल क्वालिटी के प्रोडक्ट्स बनाती है, जैसे कि हैंडबैग, फर्नीचर इत्यादि। उनकी एक फेमस कुर्सी है, जो पॉपस्टार रिहाना ने भी पसंद की है। और हां, वो चमड़े का नहीं, रबर के पुराने टायर और कैनवास के मिश्रित मटेरियल का इस्तेमाल करते हैं। क्योंकि दुनिया में आज वीगन प्रोडक्ट्स की डिमांड है। सुधीर राजभर को आज एक आर्टिस्ट और इनोवेटर के रूप में जाना जाता है। उनकी अपनी एक पहचान है, कोई हीनभावना नहीं। कहने का मतलब यह कि जो दबे हुए हैं, उन्हें अच्छे घरों के बच्चों से कॉम्पीट करने में मदद मिलनी चाहिए। लेकिन आईआईटी-आई ईएम-आईएएस के आगे भी दुनिया है। सुधीर राजभर ने अपनी कास्ट को अपनी पहचान की दीवार नहीं, अपनी पहचान का हिस्सा बनाया। जहां जात से कोई छोटा नहीं, मेरा आदर्श भारत वही। एक लेखक होते हुए मुझे दूर-दराज क्षेत्रों में जाने का मौका मिला। लोगों से बात की, उनकी समस्याएं सुनीं। ओडिशा में कंधमाल जिला हो या छत्तीसगढ़ का बस्तर, विकास तो हुआ है, लेकिन अब भी बहुत काम बाकी है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)



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