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Ashutosh Varshney Column | India AI Future Challenges & Global Leadership


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3 घंटे पहले

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आशुतोष वार्ष्णेय ब्राउन यूनिवर्सिटी, अमेरिका में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर - Dainik Bhaskar

आशुतोष वार्ष्णेय ब्राउन यूनिवर्सिटी, अमेरिका में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर

एआई पर जारी बहस में कई बड़े चेहरे शामिल हैं और यह एक गंभीर भू-राजनीतिक मुद्दा भी बनता जा रहा है। सवाल है कि एआई का लीडर कौन बनेगा। इस साल की शुरुआत में दिल्ली में हुई एआई समिट के बावजूद भारत अभी इस दौड़ में शामिल नहीं है। यह एक विडम्बना है, क्योंकि पिछले दो दशकों में भारत आईटी क्षेत्र में दुनिया का एक बड़ा लीडर बना है।

एआई में भारत के पिछड़ने की बड़ी वजह यह थी कि इसके लिए बड़े निवेश की जरूरत थी। यह रकम दसियों से सैकड़ों अरब डॉलर तक भी हो सकती है। सरकार और उद्यमियों, दोनों की कल्पनाशीलता की कमी भी झलकी। भारत के नीति बनाने वाले लोग समझ नहीं पाए कि एआई कितना बड़ा बदलाव लेकर आएगा। वे आईटी में मिली सफलता से ही खुश थे।

एआई हमारे जीने के तरीके को ठीक उसी तरह बदल देगा, जैसे कंप्यूटर ने बदल दिया था। लेकिन कंप्यूटर धीरे-धीरे विकसित हुआ था, जबकि एआई बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जन्म 2022 के आखिर में चैटजीपीटी के लॉन्च के साथ हुआ।

इसलिए लोगों का इससे जुड़ाव अभी चार साल से भी कम पुराना है। इतने कम समय में इसके एक अरब से ज्यादा यूजर हो गए हैं और एआई तकनीक बेचने वाली कंपनियां खबरों, शेयर बाजार और लोगों की सोच पर हावी हो गई हैं।

एआई हमारी काम करने की क्षमता बढ़ाता है, लेकिन इसके चलते काफी नुकसान भी हो सकता है। मैं ब्राउन यूनिवर्सिटी में जिस सेमिनार का सह-निर्देशन करता हूं, उसमें हार्वर्ड केनेडी स्कूल के राजनीतिक विचारक आर्कन फंग ने एआई के दोहरे असर को अच्छी तरह समझाया।

उनका कहना था कि एआई इंसानों को सक्षम बना सकता है, उनकी जगह ले सकता है और उन्हें अपने अधीन भी कर सकता है। फंग ने बताया अब उन्हें छात्रों को रिसर्च असिस्टेंट रखने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि एआई यह काम आसानी से कर सकता है। मेरे काम में भी ऐसा होना शुरू हो गया है। एआई एक बेहद कुशल रिसर्च असिस्टेंट है।

इसके अलावा, एआई टर्म पेपर लिख सकता है, प्रॉब्लम सेट कर सकता है और गणित के सवाल हल कर सकता है। घर ले जाकर देने वाली परीक्षाओं की जगह अब धीरे-धीरे पुराने तरीके से क्लास में बैठकर हाथ से लिखी जाने वाली परीक्षाएं ली जा रही हैं। संगीतकार भी अब कहने लगे हैं कि अगर एआई को सही तरीके से निर्देश दिए जाएं, तो वह गा और बजा भी सकता है। ये सभी उदाहरण इंसानों की जगह लेने के हैं, लेकिन इंसानों को सक्षम बनाने के मामले में क्या होगा?

कोड लिखना एआई के सबसे ज्यादा सशक्त बनाने वाले कामों में से एक माना गया है। हालांकि, हर कोई कोड लिख नहीं सकता या लिखना नहीं चाहेगा। तो क्या एआई रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाने के उदाहरण भी दे सकता है?

फंग लिखते हैं, एआई ने लाखों लोगों को सीखने और खोजने, अपने सबसे जरूरी ईमेल्स का जवाब देने और अपने शेड्यूल को व्यवस्थित करने, खाना बनाने या घर की देखभाल जैसे कामों को बेहतर करने, काम या छुट्टी के लिए यात्राएं प्रबंधित करने और ऐसे ही अनगिनत दूसरे कामों में सक्षम बनाया है। इससे साफ है कि एआई से आमजन की जिंदगी आसान तो हो रही है।

हमारी जिंदगी आसान बनाने की एआई की क्षमता से बच पाना मुश्किल होगा, और इसका काफी हिस्सा जल्द ही मध्यम वर्ग के घरों में देखने को मिलेगा। पर एक मुश्किल मुद्दा यह होगा कि इंसानों की जगह लेने वाले एआई से कैसे निपटा जाए। बड़े शहरों में डिलीवरी करने वाले लोगों का काम आसानी से खत्म हो सकता है। यहां तक कि एआई के ऐसे काम, जो इंसानों की जगह ले सकते हैं, ग्रामीण भारत में खेती पर भी असर डाल सकते हैं।

सरकार की नीतियां यह तय करने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं कि एआई का इस्तेमाल किस स्तर तक किया जाए। इसमें यह तय करना भी शामिल है कि हथियारों और युद्ध के मैदान से जुड़े फैसलों में एआई का इस्तेमाल कितनी हद तक किया जाए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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