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मानसिक रोगियों की सेवा करने वालों की मेंटल हेल्थ भी खतरे में है। इसी विषय पर रिसर्च करने वाली मानसिक चिकित्सालय की जूनियर रेजिडेंटल डॉ दिव्या बताती है। उन्होंने कई ऐसे केस स्टडी की है जिसमें रोगी की सेवा करते हुए तीमारदार भी रोग के चपेट में जा रहे है। डॉ दिव्या बताती है कि एक मां अपने बेटी की सेवा करते हुए खुद डिप्रेशन में चली गईं। करीब 13 साल से बेटे के इलाज और उसके व्यवहार में बदलाव झेलते-झेलते उनकी अपनी मानसिक सेहत बिगड़ गई। वह लोगों से बात करने से बचने लगीं, अकेले रहने लगीं और बार-बार रोने लगती है। वहीं एक बहू की है, जो 12 साल तक अल्जाइमर से पीड़ित ससुर की देखभाल करती रही। घर की जिम्मेदारियों के साथ बुजुर्ग की देखभाल का दबाव इतना बढ़ा कि उसकी नींद प्रभावित होने लगी और बाद में उसमें साइकोसिस के लक्षण सामने आए। डॉ. दिव्या के मुताबिक, मरीज की देखभाल करने वाला व्यक्ति अपना ज्यादातर समय उसके साथ बिताता है। जिससे कई बार हाई टेंशन से उसके दिमाग पर भी असर पड़ता है। केस-1- 13 साल से बेटे की बीमारी झेल रही मां खुद डिप्रेशन में पहुंचीं 22 साल के युवक को लगभग 13 साल से साइकोसिस के लक्षण थे। परिवार ने कई डॉक्टरों से इलाज कराया, लेकिन बीच-बीच में दवा छूटने और इलाज नियमित नहीं चल पाने के कारण परेशानी बनी रही। लंबे समय तक बेटे की बीमारी और उसके भविष्य की चिंता का असर मां की मानसिक सेहत पर भी पड़ा। डॉक्टर दिव्या के मुताबिक, मां गंभीर डिप्रेशन के लक्षणों से जूझने लगीं। वह लोगों से कम बात करती थीं, अकेले रहने लगी थीं, बार-बार रोती थीं और चिड़चिड़ापन बढ़ गया था। मां ने सुसाइड की भी कोशिश की। परिवार जब अस्पताल पहुंचा, तो बेटे के साथ मां को भी इलाज की जरूरत थी। बेटे की बीमारी को लेकर लगातार चिंता करते-करते मां खुद ऐसी स्थिति में पहुंच गईं, जहां उनकी मानसिक सेहत का ध्यान रखना भी जरूरी हो गया। यह मामला बताता है कि लंबे समय तक मरीज की देखभाल करने वाले परिजनों की परेशानियां भी अनदेखी नहीं की जा सकतीं। केस-2- 12 साल तक ससुर की देखभाल कर रही बहू की मानसिक सेहत बिगड़ी 12 सालों एक 72 सालों से एक बुजुर्ग अल्जाइमर से पीड़ित है। उनकी पत्नी नहीं थीं और बेटा काम के सिलसिले में बाहर रहता था। ऐसे में बहू ही उनकी देखभाल की मुख्य जिम्मेदारी निभा रही थी। डॉक्टर दिव्या के मुताबिक अल्जाइमर में मरीज को चीजें याद रखने में परेशानी होती है। कई बार उसे यह भी याद नहीं रहता कि उसने खाना खाया है या दवा ली है। ऐसे में देखभाल करने वाले को बार-बार ध्यान देना पड़ता है। बहू को बुजुर्ग की देखभाल के साथ घर भी संभालना था। लंबे समय तक लगातार जिम्मेदारी निभाने के बीच उसकी नींद प्रभावित होने लगी। वह रात में भी उठती थी और धीरे-धीरे उसके व्यवहार में बदलाव आने लगे। बाद में उसमें साइकोसिस के लक्षण सामने आए। महिला घर से भागने लगी। अकेले में बुदबुदाने लगी। रोने हसने लगी। डॉक्टर दिव्या के मुताबिक, महिला की हालत को देखते हुए उसके पति को वापस आना पड़ा और बुजुर्ग के लिए अलग से देखभाल करने वाले की व्यवस्था करनी पड़ी। इस मामले में भी मरीज की देखभाल की लंबी जिम्मेदारी का असर तीमारदार की मानसिक सेहत पर दिखाई दिया। केस-3- पिता बीमार हुए, बेटे पर बढ़ीं जिम्मेदारियां; मां की चिंता भी बढ़ी भदोही की रहने वाली एक महिला के 22 वर्षीय बेटे की परेशानी वर्ष 2024 में शुरू हुई। उसी दौरान उसके पिता बीमार पड़ गए और उन्हें डेंगू भी हुआ। घर की जिम्मेदारियां बढ़ीं तो बेटे के व्यवहार में बदलाव आने लगा। वह चिड़चिड़ा रहने लगा, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगा और घरवालों से झगड़ने लगा। धीरे-धीरे उसने लोगों से बातचीत कम कर दी और अकेले कमरे में रहने लगा। मां ने बताया कि उनका बेटा पढ़ाई में अच्छा था। उसने 11 वीं में 86% अंक हासिल किए थे। बायोलॉजी लेकर पढ़ाई कर रहा था और आगे डॉक्टर बनना चाहता था। वह पढ़ाई के साथ घर के कामों में भी हाथ बंटाता था, लेकिन बीमारी के बाद उसकी दिनचर्या बदल गई। उसे रात में नींद नहीं आती थी और बेचैनी होने लगी। अब बेटे के इलाज और देखभाल के लिए मां को अस्पताल में उसके साथ रहना पड़ता है। घर के कामकाज और दूसरी जिम्मेदारियां पीछे छूट गई हैं। बेटे को इस हालत में देखकर वह दुखी रहती हैं। दो साल से उसकी परेशानी झेल रही मां के मन में यही चिंता रहती है कि बेटा कब ठीक होगा और उसकी जिंदगी दोबारा पहले जैसी कब होगी। इन सब परिस्तिथियों से मां का स्ट्रेस लेवल भी बढ़ने लगा है। केस-4- 70 साल के दादा को खुद सहारे की जरूरत, लेकिन पोते की कर रहे देखभाल मानसिक चिकित्सालय में एक और परिवार की कहानी है। यहां करीब 70 साल के बुजुर्ग अपने पोते के साथ रह रहे हैं। पोते को साइकोसिस की समस्या है और वह अपनी देखभाल ठीक से नहीं कर पाता। परिवार के मुताबिक, बचपन में ही उसके माता-पिता का निधन हो गया था। उसे माता-पिता का साथ और देखभाल नहीं मिल सकी। अब पोते की देखभाल की जिम्मेदारी दादा-दादी उठा रहे हैं। दादा को इस उम्र में खुद सहारे और देखभाल की जरूरत हो सकती है, लेकिन उन्हें पोते के इलाज और उसकी जरूरतों का ध्यान रखना पड़ रहा है। पोते के साथ अस्पताल में रहना और उसकी हालत को लेकर चिंता करना उनके लिए भी आसान नहीं है। मरीज के व्यवहार का असर तीमारदारों पर भी पड़ता है मानसिक चिकित्सालय की जूनियर रेजिडेंट डॉ. दिव्या के मुताबिक, मरीज की देखभाल करने वाला व्यक्ति अपना ज्यादातर समय उसके साथ बिताता है। वह मरीज की परेशानी समझने, उसे संभालने और रोजमर्रा के कामों में मदद करने की कोशिश करता है। लेकिन कई बार मानसिक बीमारी से जूझ रहा व्यक्ति चिड़चिड़ा हो सकता है, गुस्सा कर सकता है या अपशब्द कह सकता है। बीमारी के कारण उसे अपने व्यवहार में आए बदलाव का एहसास भी नहीं होता। परिवार की काउंसलिंग भी इलाज का हिस्सा डॉ. दिव्या के मुताबिक, मानसिक बीमारी का इलाज करते समय सिर्फ मरीज पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। परिवार के सदस्यों की स्थिति समझना भी जरूरी है। इसी वजह से कुछ मामलों में मरीज के साथ उसके परिजनों की भी काउंसलिंग की जाती है। काउंसलिंग में परिवार को बीमारी के बारे में समझाया जाता है और बताया जाता है कि मरीज के व्यवहार में बदलाव आने पर किस तरह प्रतिक्रिया देनी है। साथ ही यह भी समझाया जाता है कि देखभाल की जिम्मेदारी निभाते हुए अपनी नींद, आराम और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान कैसे रखें। डॉक्टरों के मुताबिक, यदि ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो तीमारदार को भी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। मरीज की देखभाल की जिम्मेदारी परिवार के सदस्यों में बांटना, पर्याप्त आराम करना और जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग लेना भी मददगार हो सकता है।
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मानसिक रोगियों की देखभाल में तीमारदार भी हो रहे बीमार:किसी की मां डिप्रेशन में गई तो किसी की बहू को साइकोसिस
