जंतर-मंतर पर 33 दिन से कॉकरोच जनता पार्टी का अनशन, सोनम वांगचुक की 25 दिनों की भूख हड़ताल, पीएम आवास के बाहर राहुल गांधी का धरना, संसद में रोज गूंजता हंगामा और अब देश के सभी जिलों में प्रदर्शन का आह्वान। सभी की एक ही मांग है- शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प
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आखिर अब तक धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा क्यों नहीं हुआ?
हमने यही सवाल 5 पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स से पूछा। इसके पीछे कोई एक वजह नहीं, बल्कि 4 बड़ी वजहों का गुच्छा है। इन्हें ही समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में…


रशीद किदवाई और अमिताभ तिवारी का मानना है कि सरकार ने धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा ले लिया, तो ‘एक्सेप्टेंस ऑफ गिल्ट’ का संदेश जाएगा। यानी सरकार से गलती हुई है और उसने स्वीकार कर ली है। पीएम मोदी ऐसी मैसेजिंग नहीं देना चाहते। इसीलिए सरकार पेपर-लीक के मुद्दे पर गंभीर और प्रो-एक्टिव दिखना चाहती है…
- 21 जुलाई को NDA संसदीय दल की मीटिंग में पीएम मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि NEET पेपर लीक मामले में फौरन कार्रवाई की जाएगी और युवाओं का भरोसा जीता जाएगा।
- 22 जुलाई को केंद्रीय मंत्री डॉ. जेपी नड्डा ने कहा कि हम संसद में पेपर लीक पर चर्चा करने को तैयार हैं। उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी से भी बातचीत की पेशकश की।
- 23 जुलाई को पीएम मोदी ने ऐलान किया कि NEET पेपर लीक मामले की सुनवाई के लिए एक फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाया जाएगा। पीएम मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा- युवाओं के भविष्य से बढ़कर कुछ नहीं, दोषी बख्शे नहीं जाएंगे।
रशीद किदवाई कहते हैं, ‘मोदी सरकार की ऐसी धारणा बनी है कि उसमें मंत्रालय नहीं, सबकुछ पीएमओ से तय होता है। ऐसे में मंत्री ने इस्तीफा दिया, तो ये चर्चा हो सकती है कि पीएमओ की भी गलती है। पीएम मोदी कतई नहीं चाहेंगे कि ऐसा हो।’
निशांत कुमार बताते हैं कि नीति छोटी हो या बड़ी, मामला विदेश से जुड़ा या किसी संकट से निपटने का, कमान सीधे पीएमओ के हाथ में रहती है। ऐसे में मंत्रियों को पूरी तरह जिम्मेदार बनाकर इस्तीफा लेना आसान नहीं है।

अमिताभ तिवारी, आशुतोष और निशांत कुमार मानते हैं कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा न लेने के पीछे ‘द मोदी वे ऑफ पॉलिटिक्स’ है, माने यही पीएम मोदी की पॉलिटिक्स का तरीका है।
आशुतोष इसे डिकोड करते हुए कहते हैं, ‘पीएम मोदी विदेश दौरे पर वर्ल्ड लीडर्स से गले मिलते हैं, हैंडशेक करते हैं, झप्पियां पाते हैं और ठहाके लगाते हैं। लेकिन ये चीजें भारत में बहुत कम दिखती है। पीएम मोदी न तो विपक्ष और न ही अपनी पार्टी के नेताओं से ऐसे मिलते हैं। वो यह किसी भी तरह से प्रकट नहीं करना चाहते हैं कि उन्हें कोई दबाव में ला सकता है। ये सब पीएम मोदी की पर्सनैलिटी का हिस्सा है। वो अपनी पार्टी और सरकार के सबसे बड़े नेता हैं। ऐसे में उनका रवैया पूरी सरकार और पार्टी का रवैया बन जाता है।’
निशांत कुमार कहते हैं कि पीएम मोदी कल्ट पॉलिटिक्स के लिए जाने जाते हैं। कल्ट यानी ऐसा व्यक्तित्व जो हारता नहीं। कमजोर नहीं दिखता। इसलिए चाहे परीक्षा पेपर लीक का मामला हो या कोई और आरोप मोदी सरकार न आरोप मानती है, न मंत्रियों के इस्तीफे होते हैं।

अमिताभ तिवारी और हर्षवर्धन त्रिपाठी मानते हैं कि सरकार ने अगर मांग मान ली और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले लिया, तो मांगों का पिटारा खुल जाएगा। इसके संकेत भी दिखने लगे हैं…
- 20 जुलाई को डॉ. जेपी नड्डा के घर कॉकरोच जनता पार्टी के दो प्रवक्ता- सौरव दास और आशुतोष रांका मिलने पहुंचे और अपनी मांगे रखी। 22 जुलाई को दोबारा CJP को मिलने का ऑफर दिया गया, तो उन्होंने इसे ठुकरा दिया। कहा कि अब न्यूट्रल जगह पर बातचीत होगी या जंतर-मंतर पर। जब तक हमारी सभी मांगे पूरी नहीं हो जातीं, तब प्रदर्शन जारी रहेगा।
- 21 जुलाई को जब राहुल गांधी ने पीएम आवास पर धरना दिया, तो डॉ. जितेंद्र सिंह और केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन मनाने पहुंचे। लेकिन बात नहीं बनी। बाद में जितेंद्र सिंह ने कहा कि राहुल पहले संसद में पेपर लीक पर चर्चा की मांग कर रहे थे, लेकिन जब सरकार तैयार हो गई, तो वो कहने लगे कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर ही हम मानेंगे।
21 जुलाई को धरने पर बैठे राहुल गांधी को मनाते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह और गोविंद मोहन।
रशीद किदवाई मानते हैं कि बीजेपी सरकार ने पिछली मनमोहन सिंह की सरकार से सीख ली हो, जहां आरोप लगते ही या मांग होते ही मंत्रियों के इस्तीफे हो जाते थे। बीजेपी ये ट्रेंड अपनी सरकार में नहीं लाना चाहती।
2015 में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे पर आरोप लगे कि दोनों ने लंदन में रह रहे भगोड़े ललित मोदी की वहां से पुर्तगाल जाने में मदद की है। सुषमा और वसुंधरा के इस्तीफे की मांग होने लगी।
तब 24 जून 2015 को केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने एक बयान दिया- ‘नहीं… नहीं, इसमें (मोदी सरकार में) मंत्रियों के त्यागपत्र नहीं होते हैं, भैया। यूपीए सरकार नहीं है, ये एनडीए सरकार है।’ राजनाथ का यही बयान बीजेपी सरकार का अघोषित नियम बना हुआ है।
निशांत कुमार बताते हैं कि मोदी कुशल राजनेता हैं। वे इस्तीफे के डोमिनोज इफेक्ट से बचना चाहते हैं। उन्हें पता है एक मंत्री का इस्तीफा लेते ही दूसरे मंत्रियों के इस्तीफे की मांग तेज हो जाएगी। इनमें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी जैसे नाम शामिल हो सकते हैं।

ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार कभी झुकी नहीं। 2018 में विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर का इस्तीफा और 2021 में कृषि कानून वापस लेना इसकी मिसाल हैं। लेकिन इस बार हालात कुछ थोड़े बदले हुए हैं।
- अमिताभ तिवारी बताते हैं कि जब मोदी सरकार ने इस्तीफे या फैसले वापस लिए तब उसके पास स्पष्ट बहुमत था, लेकिन आज ऐसा नहीं है। अभी मोदी सरकार NDA सहयोगियों के सहारे है। अगर कल को धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो जाए और TDP, JDU जैसे सहयोगी गड़बड़ कर दें, तो सरकार अल्पमत में आ सकती है।
- रशीद किदवाई कहते हैं कि बीजेपी का हर कदम राजनीतिक तौर पर नपा-तुला होता है। एमजे अकबर के इस्तीफे से बीजेपी को कोई राजनीतिक नुकसान नहीं हुआ। अगर वे कैबिनेट में बने रहते तो कुछ घाटा हो सकता था, क्योंकि उन पर महिलाओं ने आरोप लगाए थे।
- आशुतोष मानते हैं कि जब किसानों ने सवा साल तक कृषि कानूनों का विरोध किया, तब जाकर सरकार ने कृषि कानून वापस लिए। उसमें भी पीएम मोदी ने कहा था कि हम किसानों को समझा नहीं पाए। उन्होंने ये नहीं कहा कि हमसे गलती हुई।
- रशीद किदवाई मानते हैं कि बीजेपी के वोटर्स नहीं चाहेंगे कि उनके लीडर यानी पीएम मोदी किसी तरह से बैकफुट पर दिखें। ये बात पीएम मोदी और बीजेपी अच्छी तरह से जानते हैं।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी है। हजारों की तदाद में युवा एकट्ठा है और नारेबाजी कर रहे हैं।
तो क्या धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं ही होगा?
- रशीद किदवाई कहते हैं कि सरकार के पास पहले मौका था कि कैबिनेट रीशफल में धर्मेंद्र प्रधान को हटा दें, लेकिन पॉलिटिकल वजहों से ऐसा नहीं हुआ। अब प्रधान तभी हटेंगे, जब सरकार को लगेगा कि उनके मंत्री बने रहने से बड़ा राजनीतिक नुकसान हो सकता है।
- हर्षवर्धन त्रिपाठी मानते हैं कि इस्तीफा तो होगा ही होगा। कब होगा, यह नहीं कह सकते। हो सकता है, समय लेकर लिया जाए। मेरा मानना है कि अभी ही ले लेना चाहिए। ये कोई जिद या अहंकार का मसला नहीं है। अब मसला है- सरकार में जवाबदारी लेने का बोध है या नहीं।
- अमिताभ तिवारी भी मानते हैं कि इस्तीफा हो सकता है, लेकिन शायद वक्त लगे। क्योंकि राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में सरकार रिस्क नहीं लेगी।
- निशांत कुमार कहते हैं कि मोदी अपने मंत्रियों की लिस्ट औसतन हर 2 साल में कुछ बदलती है, लेकिन यह हमेशा कैबिनेट विस्तार या फेरबदल के पर्दे के पीछे ही किया गया। ऐसा धर्मेंद्र प्रधान के मामले में भी हो सकता है।
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