5 घंटे पहले
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इस साल भाद्रपद शुक्ल तृतीया दो दिन 13 और 14 सितंबर को है। इस वजह से हरतालिका तीज के व्रत की तारीख को लेकर कन्फ्यूजन है। ज्योतिषियों के मुताबिक 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी के साथ हरतालिका तीज व्रत करना ज्यादा शुभ है, क्योंकि शास्त्रों में तीज व्रत चतुर्थी के साथ वाले दिन करने की बात कही गई है। जिस दिन द्वितीया और तीज का संयोग होता है, उस दिन तीज व्रत करने का महत्व नहीं है।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार तीज देवी पार्वती की तिथि है और चतुर्थी के स्वामी भगवान गणेश हैं। माता पार्वती का तीज व्रत और गणेश जी का चतुर्थी व्रत एक ही दिन, 14 सितंबर को किए जाएंगे। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया 13 सितंबर की सुबह 7:08 बजे शुरू होकर 14 सितंबर की सुबह 7:06 बजे समाप्त होगी। 14 सितंबर की सुबह सूर्योदय के समय तृतीया तिथि रहेगी, इस वजह से भी इसी दिन हरतालिका तीज व्रत करना चाहिए। महिलाएं पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना से तीज व्रत रखेंगी। चतुर्थी व्रत भी घर-परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से किया जाता है।
हरतालिका तीज पर महिलाएं करती हैं निर्जला व्रत
हरतालिका तीज व्रत सबसे कठिन व्रतों में से एक है। महिलाएं सूर्योदय से पहले स्नान करके व्रत करने का संकल्प लेती हैं। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की विधिवत पूजा की जाती है। पूजा के बाद महिलाएं दिनभर निराहार रहती हैं, पानी भी नहीं पीती हैं यानी निर्जल रहती हैं।
तीज की शाम को और रात में भी देवी पूजा की जाती है, अगले दिन सुबह भी जल्दी उठकर पूजा की जाती है, कई महिलाएं तीज की पूरी रात जागकर देवी मां के मंत्र जप करती हैं, कथाएं सुनती हैं, भजन गाती हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए हरतालिका व्रत किया था।
इस व्रत में महिलाएं पूजा के लिए मिट्टी या रेत से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएं बनाती हैं। पूजा में महिलाएं देवी पार्वती का सुंदर श्रृंगार करती हैं और सुहाग की चीजें जैसे लाल चुनरी, लाल चूड़ियां, कुमकुम, आभूषण चढ़ाती हैं। जिन महिलाओं के लिए दिनभर भूखे-प्यासे रहना संभव नहीं है, वे फलाहार और दूध का सेवन कर सकती हैं। बीमार, गर्भवती महिलाओं को व्रत करने से बचना चाहिए। जो महिलाएं व्रत नहीं कर रही हैं, वे विधि-विधान से पूजा-पाठ कर सकती हैं।
हरतालिका तीज व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा
देवी मां ने हिमालय राज के यहां पुत्री रूप में अवतार लिया था। जब देवी पार्वती विवाह योग्य हुईं, तब देवी ने शिव जो पति रूप में पाने के लिए तप किया था। तपस्या के दिनों में देवी ने भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया पर रेत से शिवलिंग बनाया और भगवान की पूजा की थी। इस तिथि पर देवी ने रातभर जागकर शिव जी का ध्यान किया। देवी की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और देवी को वरदान दिया कि वे उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करेंगे। इसके बाद शिव-पार्वती का विवाह हुआ था।

