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Husband Wife Personal Space Benefits; Healthy Marriage Signs – Boundaries


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14 घंटे पहले

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सवाल- मैं 34 साल की वर्किंग वुमन हूं। मेरी शादी को छह साल हो चुके हैं। हमारे बीच वैसे तो कोई बड़ा झगड़ा नहीं होता, लेकिन एक बात को लेकर अक्सर तनाव रहता है। पति चाहते हैं कि हम अपना सारा खाली समय साथ बिताएं। उनका मानना है कि शादी के बाद पति-पत्नी के दोस्त, शौक और सोशल लाइफ भी एक जैसी होनी चाहिए।

मुझे ये बात समझ नहीं आती कि दोनों के शौक और सोशल लाइफ एक जैसी होना क्यों जरूरी है। उनके अलावा भी मेरी सोशल लाइफ क्यों नहीं हो सकती? मैं अकेले अपने स्कूल-कॉलेज के दोस्तों के साथ वक्त क्यों नहीं बिता सकती? उन्हें कैसे समझाऊं, क्या करूं?

एक्सपर्ट– डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा

सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। सबसे पहले यह समझिए कि आपकी इच्छा गलत नहीं है। शादी का मतलब यह नहीं कि आपकी अपनी पहचान, दोस्तियां और पसंद-नापसंद खत्म हो जाएं। जिस तरह आपके पति आपके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, उसी तरह आपकी अपनी दुनिया भी आपकी मानसिक सेहत और व्यक्तित्व का जरूरी हिस्सा है।

इसलिए यह सवाल कि “क्या शादी के बाद पति-पत्नी की सोशल लाइफ एक ही होनी चाहिए?”— इसका जवाब है, “नहीं।”

हालांकि, यह भी संभव है कि आपके पति आपको कंट्रोल न करना चाहते हों। कई बार ऐसी सोच कुछ अन्य कारणों से भी आती है, जैसेकि-

  • बहुत ज्यादा प्यार
  • असुरक्षा की भावना
  • अकेले पड़ जाने का डर
  • शादी को लेकर बनी पारंपरिक धारणाएं

इसलिए इस मुद्दे को “कौन सही, कौन गलत” की लड़ाई बनाने की बजाय इस नजरिए से देखना बेहतर और ज्यादा मददगार होगा कि “हम दोनों की जरूरतें क्या हैं।”

शादी में साथ जरूरी

हर समय साथ रहना नहीं

किसी भी स्वस्थ रिश्ते में दो चीजें साथ-साथ चलती हैं- निकटता और स्वतंत्रता। स्वतंत्रता का मतलब है- पर्सनल स्पेस। अगर रिश्ते में सिर्फ निकटता हो और पर्सनल स्पेस न हो तो व्यक्ति घुटन महसूस करने लगता है। वहीं अगर सिर्फ पर्सनल स्पेस हो और जुड़ाव-निकटता न हो तो दूरियां बढ़ने लगती हैं। एक हेल्दी मैरिज में इन दोनों के बीच एक संतुलन होता है।

मनोविज्ञान में इसे “डिफरेंशिएशन ऑफ सेल्फ” कहा जाता है। इसका मतलब है कि दो लोग भावनात्मक रूप से जुड़े रहने के साथ अपनी अलग पहचान भी बनाए रखें।

पार्टनर ऐसा क्यों चाहता है?

हर व्यवहार के पीछे कोई-न-कोई भावनात्मक जरूरत होती है। इसलिए पहले खुद से ये सवाल पूछिए कि आपके पति ऐसा क्यों चाहते हैं।

  • क्या उन्हें अकेलापन महसूस होता है?
  • क्या उन्हें डर है कि दोस्त आप दोनों के बीच दूरी बढ़ा देंगे?
  • क्या उनके परिवार में औरतें बहुत पारंपरिक भूमिका में थीं, जिनकी कोई पर्सनल लाइफ नहीं थी?
  • क्या वे यह मानते हैं कि अलग सोशल लाइफ का मतलब रिश्ते में कमी है?

अगर हमें किसी भी चीज का ठीक–ठीक कारण समझ में आ जाए तो बातचीत करना और उस समस्या का हल निकालना आसान हो जाता है।

CBT का ABC मॉडल

कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT) का एक आसान टूल है– ABC मॉडल। इस मॉडल को ऐसे समझिए–

A- Activating Event (घटना)

आप दोस्तों से मिलने की बात करती हैं।

B- Belief (विश्वास)

पति सोचते हैं– “अगर पत्नी अकेले दोस्तों के साथ जा रही है तो शायद उसे मेरे साथ रहना पसंद नहीं है।”

C- Consequence (परिणाम)

वे नाराज हो जाते हैं या आप दोनों के बीच बहस शुरू हो जाती है।

अब इस मॉडल के मुताबिक आपको अपने पति के Belief यानी उनके यकीन को चुनौती देनी है। आपको उन्हें यह समझाना है कि–

“दोस्तों के साथ समय बिताना, पति से दूर होना नहीं है।”

पार्टनर ये बात कैसे करें?

अब सवाल ये है कि उनके मन में बैठे विचारों या उनके यकीन को बदलने के लिए बातचीत कैसे करें। बात करते हुए आपको “मैं” वाले वाक्यों का इस्तेमाल करना है।

बहुत से कपल बातचीत की शुरुआत आरोप से करते हैं, जैसेकि—

“तुम मुझे कभी आजादी नहीं देते।”

ऐसी बात सामने वाले को डिफेंसिव बना देती है। इसके बजाय “मैं” वाले वाक्यों का इस्तेमाल करें, जैसेकि–

“मुझे अपने पुराने दोस्तों से मिलकर अच्छा लगता है। इससे मैं भावनात्मक रूप से बेहतर महसूस करती हूं। इसका मतलब यह नहीं कि मैं तुम्हारे साथ समय नहीं बिताना चाहती।”

इस तरह सामने वाला आपकी भावनाओं को सुनता है, आरोप को नहीं।

रिश्ते में बनाएं ‘स्पेस एग्रीमेंट’

कई कपल बिना बात किए उम्मीदें बना लेते हैं। बाद में वही उम्मीदें विवाद बन जाती हैं। इसलिए अपने मन से कुछ भी तय करने की बजाय मिल–बैठकर कुछ बातें तय करें—

  • सप्ताह में कितना समय सिर्फ आप दोनों साथ बिताएंगे।
  • महीने में कितनी बार दोनों अपने-अपने दोस्तों से मिलेंगे।
  • आप दोनों कब और कहां साथ जाएंगे और कब अलग–अलग जाएंगे।
  • पहले से इसकी जानकारी देने का तरीका क्या होगा।
  • इस तरह के नियम दोनों के लिए समान होंगे।

ACT (एक्सेप्टेंस एंड कमिटमेंट) थेरेपी टूल

ACT (एक्सेप्टेंस एंड कमिटमेंट) थेरेपी कहती है कि किसी भी रिश्ते का फैसला डर से नहीं, बल्कि अपने मूल्यों के आधार पर होना चाहिए। इसलिए खुद से ये सवाल पूछिए—

  • मैं कैसी पत्नी बनना चाहती हूं?
  • मैं कैसी इंसान बने रहना चाहती हूं?
  • क्या दोनों बातें एक साथ संभव हैं?

इस सवाल का जवाब अक्सर “हां” होता है।

आप एक अच्छी, कमिटेड पत्नी भी हो सकती हैं और अपने दोस्तों से जुड़ी हुई अच्छी दोस्त भी, अच्छी इंसान भी। इन बातों में कोई अंतर्विरोध नहीं है।

सीमाएं तय करने से कमजोर नहीं होते रिश्ते

मनोविज्ञान में हेल्दी बाउंड्रीज बहुत महत्वपूर्ण हैं। बाउंड्रीज यानी सीमा का मतलब दीवार खड़ी करना नहीं है। इसका मतलब है—

“यह मेरी व्यक्तिगत जरूरत है और मैं चाहता/चाहती हूं कि आप इसका सम्मान करें।”

एक उदाहरण:

“महीने में एक बार मैं अपने कॉलेज फ्रेंड्स से अकेले मिलना चाहती हूं। उसी तरह अगर आप अपने दोस्तों के साथ समय बिताना चाहें तो मुझे भी खुशी होगी।”

इमोशनल बैंक अकाउंट भरते रहिए

रिश्तों के विशेषज्ञ अक्सर इमोशनल बैंक अकाउंट की बात करते हैं। अगर रिश्ते में प्यार, सम्मान, समय और भरोसा लगातार जमा होता रहे तो छोटी-छोटी असहमतियों से रिश्ता टूटता नहीं है।

इसलिए जब आप दोस्तों से मिलें, उससे पहले और बाद में पति के साथ भी अच्छा समय बिताइए। उन्हें यह महसूस होना चाहिए कि वे आपकी प्राथमिकता हैं।

अगर पति फिर भी न माने तो क्या करें?

अगर पति से प्यार और शांति से बातचीत की हर कोशिश नाकाम हो रही है, बार-बार शांत बातचीत के बाद भी वे—

  • दोस्तों से मिलने पर रोक लगाते हैं।
  • हर बार अपराधबोध महसूस कराते हैं।
  • आपकी हर गतिविधि पर नजर रखना चाहते हैं।
  • आपकी सोशल लाइफ धीरे-धीरे खत्म करवाने की कोशिश करते हैं।

तो यह सिर्फ दो व्यक्तियों की अलग–अलग पसंद का मामला नहीं है। यह कंट्रोलिंग व्यवहार की दिशा में जा सकता है। ऐसी स्थिति में कपल काउंसलिंग मददगार हो सकती है। किसी निष्पक्ष विशेषज्ञ के सामने बातचीत करने से दोनों अपनी भावनाएं बेहतर तरीके से समझ और समझा पाते हैं।

आखिर में एक बात और। किसी भी रिश्ते का लक्ष्य दो लोगों को एक जैसा बनाना नहीं होता। लक्ष्य यह होता है कि दो अलग-अलग लोग अपनी-अपनी पहचान बचाए रखते हुए एक-दूसरे के जीवन को बेहतर बनाएं। अगर आप सम्मान के साथ अपनी जरूरत रखें और उतने ही सम्मान से उनके डर और भावनाओं को सुनें, तो इस मुद्दे का समाधान टकराव से नहीं, बातचीत से निकल सकता है।

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