दैनिक भास्कर की ‘स्पाई फाइल्स’ सीरीज में आप पढ़ रहे हैं- ऑपरेशन बांग्लादेश। पार्ट-1 में आपने पढ़ा- 1970 में पाकिस्तान में पहली बार आम चुनाव हुए। कुल 300 सीटों में से 167 सीटें पूर्वी पाकिस्तान के शेख मुजीब-उर-रहमान को मिलीं और पश्चिमी पाकिस्तान के जु
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मुजीब का पीएम बनना तया था, लेकिन तानाशाह राष्ट्रपति याह्या खान नहीं चाहते थे कि कोई बंगाली सत्ता संभाले।
याह्या ने मुजीब के साथ कई बैठकें कीं, लेकिन बात नहीं बनी। पूर्वी पाकिस्तान में बगावत छिड़ गई। याह्या ने बंगालियों का दमन करने का फैसला किया।
25 मार्च को ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू हो गया। एक ही रात में 10 हजार लोग मारे गए। पाकिस्तानी फौज महिलाओं को उठाकर अपने कैंपों में ले गई और महीनों गैंगरेप किया। लाखों बंगाली भागकर भारत आने लगे।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी फौरन जंग चाहती थीं, लेकिन सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ ने इस्तीफे की पेशकश कर दी। पार्ट-2 में उससे आगे की कहानी…
अप्रैल 1971 की एक सुबह। घड़ी में 11 बज रहे थे। प्रधानमंत्री दफ्तर में पीएम इंदिरा गांधी और सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ बैठे थे। इंदिरा बेहद परेशान थीं। उनका चेहरा गुस्से से लाल हो गया था।
उन्होंने सेना प्रमुख से कहा- ‘आपको वक्त चाहिए न… मिल जाएगा वक्त। जंग की तैयारी कीजिए।’
सैम ने कहा- ‘लेकिन मैं गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री की दखल नहीं मानूंगा। आप फैसला कर लीजिए।’
इंदिरा- ‘क्या मतलब?’
सैम- ‘मैं सिर्फ एक लीडर की बात मानूंगा। हर कोई दखल नहीं देगा।’
इंदिरा ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘सैम… आप मुख्य कमांडर होंगे। कोई दखलअंदाजी नहीं करेगा।’
सैम ने भी मुस्कुराते हुए कहा- ‘आई प्रॉमिस मैडम। जीत हमारी ही होगी।’

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ।
सेना प्रमुख को 6 महीने का वक्त मिल गया। इधर, पूर्वी पाकिस्तान में याह्या की सेना ने कत्लेआम मचा रखा था। हर दिन हजारों लोग मारे जा रहे थे। 6 महीने इंतजार का मतलब था पूर्वी पाकिस्तान का सफाया।
RAW चीफ आरएन काव परेशान थे- ‘करें तो करें क्या…?’ फिर उन्होंने अपने साथी अफसर शंकरन नायर को बुलाया।
‘हम सीधे-सीधे मिलिट्री एक्शन नहीं ले सकते, लेकिन उस जगह तो चोट कर सकते हैं, जहां दर्द सबसे ज्यादा हो।’ RAW चीफ ने कहा।
नायर ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘आपका इशारा गुरिल्ला वॉर है?’
काव ने कहा- ‘बिल्कुल।’
‘पर ये काम करेगा कौन?’ नायर ने पूछा।
‘वही बंगाली, जो भागकर भारत आए हैं।’ काव ने जवाब दिया।
अगले दिन नायर कोलकाता पहुंच गए। वे गुप्त रूप से 25 रिफ्यूजी कैंपों में गए। BSF की मदद से 18 से 35 साल के बंगालियों को संघर्ष के लिए तैयार किया।
उन्हें हथियार चलाने, घात लगाकर हमला करने, कमांडो ऑपरेशन्स और छोटे रेडियो सेट के इस्तेमाल की ट्रेनिंग दी गई। एक महीने के भीतर 2.5 लाख बागी बंगाली गुरिल्ला वॉर के लिए तैयार हो चुके थे।
लेकिन इतनी तैयारी काफी नहीं थी…
एक रोज RAW चीफ ने इंदिरा से कहा- ‘हमें फौरन एक और वॉर की तैयारी करनी चाहिए।’
इंदिरा ने पूछा- ‘अब किस वॉर की तैयारी?’
RAW चीफ- ‘साइकोलॉजिकल वॉर। आप विदेशों में पाकिस्तान के अत्याचारों के खिलाफ पत्र लिखिए।’
इंदिरा ने विदेशी नेताओं को पाकिस्तान की बर्बरता के बारे में लिखना शुरू कर दिया। RAW ने विदेशी पत्रकारों को रिपोर्टिंग के लिए भारत बुला लिया।

1971 की जंग में पाकिस्तान ने कम से कम 2 लाख बंगालियों का नरसंहार किया था।
13 जून 1971 को यूके के संडे टाइम्स में इन नरसंहारो के बारे में खबर छपी। संडे टाइम्स ने लिखा- ‘पूर्वी पाकिस्तान में 1 लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया है। चाकू और छुरियों से उनके अंग काट दिए गए हैं। हजारों बच्चों की आंखें फोड़ दी गई हैं।’
पाकिस्तान दुनिया के सामने बेनकाब हो गया। भारत यही तो चाहता था। ताकि उसे मिलिट्री एक्शन की कोई ठोस वजह मिल जाए।
अब तक जुलाई आ चुका था। RAW ने तय किया कि ग्राउंड पर जाकर बागी बंगालियों की तैयारियों का जायजा लिया जाए।
एक अफसर आधी रात को बंगालियों के कैंप में पहुंच गया। हर तरफ धुएं की गंध और जलते हुए मांस की बदबू फैली हुई थी।
कुछ ही घंटे पहले, पाकिस्तानी फौज ने एक गांव में ढूंढ़-ढूंढ़कर बंगालियों का कत्ल किया था।
गुरिल्ला टीम के कमांडर ने दीवार पर चढ़कर झांका- सात पाकिस्तानी फौजी खाना खा रहे थे। तीन पहरा दे रहे थे।
उसने नीचे उतरकर कहा- ‘मैंने दस गिने हैं। ज्यादा भी हो सकते हैं। एक फौजी ट्रक भी खड़ा है।’
उसने अपनी असॉल्ट राइफल लोड की और हाथ हिलाकर साथियों को आगे बढ़ने का इशारा किया। 15 बंगाली दबे पांव निकल पड़े।
आधे घंटे चलने के बाद वे जलती हुई इमारतों की रोशनी तक पहुंच गए। तभी एक पाकिस्तानी फौजी ने देख लिया। बंगाली कमांडर जोर से चिल्लाया- ‘जॉय बांग्ला!’
एक साथ 15 राइफलें गूंज उठीं- ठायं, ठायं। दसों पाकिस्तानी फौजी ढेर हो गए। गुरिल्ला टीम के कुछ लड़ाके उनकी लाशों पर चढ़ गए और थूकने लगे। वहां खड़े ट्रक से हथियार और गोला-बारूद निकाले और उसे आग के हवाले कर दिया।
यह सब देखकर RAW अफसर ने मन ही मन मुस्कुराते हुए कहा- ‘अब तो पाकिस्तान का टूटना तय है।’

बंगाली लड़ाकों को RAW ने ट्रेनिंग देकर पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध के लिए तैयार किया था।
वक्त का पहिया घूमता रहा और आ गया अक्टूबर 1971, भारत जंग के लिए तैयार था, लेकिन एक खुफिया खबर ने नेवी अफसरों की नींद उड़ा दी थी।
दिल्ली के वॉर रूम में रक्षा मंत्री जगजीवन राम, नौसेना चीफ एसएम. नंदा और RAW चीफ आरएन काव परेशान बैठे थे।
नौसेना चीफ ने कहा- ‘काव साहब, कराची पोर्ट पर एडवांस्ड सर्विलांस सिस्टम लगे हैं। हमें उसकी सटीक जानकारी चाहिए।’
काव ने कहा- ‘नंदा साहब… अभी के माहौल में वहां की तस्वीरें जुटाना छोटे-मोटे एजेंटों के बस की बात नहीं है। बड़े बाजों को मैदान में उतारना होगा।’
उसी रोज RAW चीफ ने शंकरन नायर के साथ मीटिंग की। नायर ने मुंबई में मौजूद अपने टॉप एजेंट को फोन मिलाया और अपनी जरूरतें बता दी।
पांच दिन बाद एजेंट का फोन आया- ‘सर, एक बंदा है जो हमारी मदद कर सकता है।’ नायर उससे मिलने के लिए फ्लाइट पकड़कर मुंबई पहुंच गए।
एजेंट ने बताया- ‘जिस आदमी की हमें जरूरत है, उसका नाम कावसजी है। पारसी डॉक्टर हैं। उनका एक छोटा समुद्री जहाज है। वे भारत और पाकिस्तान के बीच कुवैत के रास्ते सामान और मरीज लाते-ले जाते हैं।’
नायर ने झट से कहा- ‘क्या हम उस पर आंख मूंदकर भरोसा कर सकते हैं?’
एजेंट मुस्कुराया- ‘सच कहूं तो भरोसा तो नहीं कर सकता, लेकिन हमारे पास एक ऐसा पत्ता है, जिससे हम उसे मना सकते हैं।’
एजेंट ने मेज पर एक फाइल खिसका दी। दरअसल, दो महीने पहले कावसजी अपने जहाज पर बिना टैक्स चुकाए महंगे सामान लाते हुए पकड़े गए थे। कस्टम्स विभाग उनके खिलाफ जांच कर रहा था। भारी जुर्माना लगना तय था।
नायर का दिमाग घूमा। कस्टम्स के चीफ उनके पुराने दोस्त थे। उन्होंने तुरंत फोन घुमाया। दस मिनट की बातचीत में डील पक्की हो गई।
तय हुआ कि RAW अपने सीक्रेट फंड से डॉक्टर का सारा जुर्माना भरेगी और कस्टम विभाग केस बंद करने का लेटर जारी करेगा, लेकिन यह लेटर सीधे डॉक्टर को नहीं दिया जाएगा।
अगली सुबह वो लेटर नायर के हाथों में था। वे अपने दो एजेंटों को लेकर दक्षिण मुंबई में डॉक्टर के क्लिनिक पहुंच गए।

डॉ. कावसजी के साथ RAW के डिप्टी चीफ शंकरन नायर। AI इमेज
नायर ने डॉक्टर से मिलते ही कहा- ‘हैलो मिस्टर कावसजी, आई एम कैप्टन मेनन फ्रॉम इंडियन नेवी।’ डॉक्टर कुछ कहते उससे पहले ही नायर ने वो लेटर टेबल पर रखा दिया।
नायर ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘हमारा एक छोटा-सा काम कर दें, तो यह लेटर आपका हो जाएगा। मन ना हो तो आप मना भी कर सकते हैं। फिर मैं ये लेटर इसी वक्त जला दूंगा। जांच फिर शुरू हो जाएगी।’
डॉक्टर ने भारी मन से लेटर देखा। फिर कहा- ‘बोलिए, कौन सा काम है?’
‘अगली पाकिस्तान ट्रिप पर हमारे दो आदमियों को साथ ले जाना है। जहाज दो दिनों के भीतर निकलना चाहिए।’ नायर ने कहा।
डॉक्टर ने बेबसी में सिर हिलाते हुए कहा- ’ठीक है।’
नायर वहां से निकलने लगे तो डॉक्टर ने पूछा- ‘कम से कम इतना बता दीजिए कि मैं किन लोगों को अपने साथ ले जा रहा हूं।’
नायर ने चलते-चलते कहा- ‘बस इतना जान लीजिए कि उनके नाम ‘रॉड’ और ‘मोरियार्टी’ हैं।’
‘रॉड’ नायर के नौसैनिक सहायक राव थे और ‘मोरियार्टी’ RAW के फोटोग्राफी डिपार्टमेंट के उस्ताद एजेंट मूर्ति थे।
दो दिन बाद, डॉक्टर कावसजी, दोनों एजेंटों को लेकर रवाना हो गए। जब तक जहाज हिंदुस्तानी सीमा में रहा, सब शांत था, लेकिन अब असली खेल शुरू होने वाला था।
जहाज जैसे ही कराची बंदरगाह पर रुका, पाकिस्तान CID की टीम वहां आ धमकी। एक इंस्पेक्टर दो सिपाहियों के साथ जहाज पर चढ़ गया। डॉक्टर की धड़कनें तेज हो गईं।
अफसरों ने कागजात खंगालने शुरू किए। इंस्पेक्टर की नजर पैसेंजर लिस्ट पर अटक गई। उसने डॉक्टर से पूछा- ‘रॉड और मोरियार्टी… कहां हैं ये दोनों?’
डॉक्टर का दिल हलक में आ गया। उन्होंने अपनी घबराहट छुपाते हुए कहा- ‘ओह! समझ गया आप क्या सोच रहे हैं। अजीब नाम हैं ना? दरअसल ये भारतीय ईसाई हैं… उनके नाम ऐसे ही होते हैं। दोनों अंदर केबिन में पड़े हैं।’
‘जाओ, चेक करो!’ इंस्पेक्टर ने कड़क आवाज में अपने सिपाही को हुक्म दिया।
डॉक्टर ने हाथ जोड़ लिए- ‘साहब! भूलकर भी मत जाइएगा। दोनों को चेचक हो गया है। एक को हुआ और दूसरे को लग गया। जब तक वे ठीक नहीं होते, वहां कोई नहीं जा सकता। आपको भी इंफेक्शन हो जाएगा।
डॉक्टर सालों से कराची आ-जा रहे थे, इसलिए इंस्पेक्टर को शक नहीं हुआ। उन्होंने जहाज को बंदरगाह में रुकने की इजाजत दे दी।
जब CID की टीम जहाज से उतरी, तो डॉक्टर ने गहरी सांस ली। उनके हाथ कांप रहे थे। उन्होंने सोडे के साथ एक कड़क स्कॉच बनाया और एक ही घूंट में गटक गए।

डॉ. कावसजी की जहाज की जांच करते हुए पाकिस्तानी रेंजर्स। AI इमेज
अब तक रात हो चली थी। सन्नाटा पसरा था। जहाज धीमे-धीमे बंदरगाह के मुहाने पर दो बड़ी चट्टानों के बीच आकर रुक गया। RAW के एजेंटों ने खिड़की से बाहर झांका।
‘क्या तुम भी वही देख रहे हो जो मैं देख रहा हूं?’ राव ने हैरान होकर पूछा।
मूर्ति ने कहा- ‘यह तो कमाल है।’
सामने एक ताजा कंक्रीट का ढांचा खड़ा था, जिस पर भारी-भरकम एंटी-एयरक्राफ्ट गन तैनात थी।
दोनों एजेंट दनादन तस्वीरें खींचने लगे। उन्होंने किलेबंदी, तोपों की स्थिति और बंदरगाह पर खड़े जंगी जहाजों की तस्वीरें कैद कर लीं। आधे घंटे तक कैमरे की क्लिक-क्लिक चलती रही।
अब कैप्टन ने जहाज मोड़ा और ले जाकर किनारे पर लगा दिया। दोनों एजेंट फिर से उस खास केबिन में छिप गए। सुबह डॉक्टर जहाज से उतरे। मार्केट जाकर अपना काम निपटाया और फिर जहाज में लौट आए।
जहाज को अब कुवैत जाना था। दोपहर में वह कराची से निकल पड़ा। बंदरगाह से बाहर निकलते वक्त एजेंटों ने चट्टान के दूसरे हिस्से की भी तस्वीरें खींच लीं।
जहाज अरब सागर के रास्ते कुवैत पहुंचा। वहां राव और मूर्ति उतरे और सीधे भारतीय दूतावास पहुंच गए। उसी रोज कैमरों से निकालकर रीलें स्पेशल फ्लाइट से दिल्ली भेज दी गईं।
दिल्ली के एक सीक्रेट लैब में दो फोटोग्राफर तैयार बैठे थे। रीलें आते ही तुरंत वॉर रूम पहुंचाई गईं। रक्षा मंत्री जगजीवन राम, नौसेना चीफ एसएम. नंदा और RAW चीफ काव बैठे हुए थे। सामने बड़ी प्रोजेक्टर स्क्रीन लगी हुई थी। RAW अफसर एक-एक करके तस्वीरें दिखाते जा रहा था।
आखिर उन तस्वीरों में था क्या…
कराची बंदरगाह के अंदर और बाहर का एक-एक नक्शा और तस्वीरें। पाकिस्तानी तोपें कहां हैं, उनके तेल के डिपो कहां हैं और जंगी जहाज किस जगह खड़े हैं… हर तस्वीर RAW के पास थी।
एक रोज इंदिरा ने सेना प्रमुख से पूछा- ‘क्या आप जंग के लिए तैयार हैं?’
सेना प्रमुख सैम ने जवाब दिया- ‘आई एम ऑलवेज रेडी स्वीटी।’ दरअसल, सैम अक्सर इंदिरा के लिए इस शब्द का इस्तेमाल करते थे।
फिर आई 3 दिसंबर 1971 की रात। अचानक पाकिस्तानी एयरपोर्स ने भारत के कई ठिकानों पर बमबारी शुरू कर दी। रात 12 बजे पीएम इंदिरा गांधी ऑल इंडिया रेडियो पर आईं और जंग का ऐलान कर दिया।
उसी रात पाकिस्तान की सबसे बड़ी पनडुब्बी पीएनएस गाजी डूब गई। दरअसल, गाजी गुपचुप तरीके से भारत के सबसे बड़े विमानपोत INS विक्रांत को डुबोने आई थी।
वह कई घंटों से INS विक्रात के इंतजार में विशाखापट्टनम में खड़ी थी, लेकिन विक्रांत उसे दिखा नहीं। आखिर दिखता भी कैसे, RAW के एजेंटों ने उसे चुपचाप अंडमान भेज दिया था।
गाजी में डीजल से बैटरियां चार्ज की जा रही थीं, जिसकी वजह से खतरनाक हाइड्रोजन गैस अंदर भरती जा रही थी। इसी के चलते वह खुद ही बिस्फोट होकर तबाह हो गई।

भारत का सबसे बड़ा युद्धपोत INS विक्रांत।
4 दिसंबर को भारतीय वायु सेना ने भी पाकिस्तान पर बमबारी शुरू कर दी। कराची और आसपास के हवाई अड्डों पर आसमान से रॉकेट बरस रहे थे।
इधर, इंडियन नेवी की 3 ओसा-I मिसाइल बोट चुपचाप मुंबई से कराची की तरफ बढ़ रही थीं। भारत ने ये मिसाइल बोट रूस से खरीदी थी। जब बोट कराची से 250 समुद्री मील दूर थीं, तभी रडार पर ‘बीप-बीप’ की आवाज आने लगी। कैप्टन चिल्लाया- ‘पाकिस्तानी जहाज करीब आ रहा है। मिसाइल दागो।’
पहली मिसाइल छूटी, फिर दूसरी, फिर तीसरी। पाकिस्तानी का जंगी जहाज PNS खैबर तबाह हो गया। पाकिस्तान को लगा कि यह वायुसेना का हमला है। तभी मिसाइल बोट ने एक और पाकिस्तानी युद्धपोत और गोला-बारूद से भरे एक मालवाहक जहाज को तबाह कर दिया।
अब मिसाइल बोट ने कराची बंदरगाह का रुख किया। भारत को कराची के फ्यूल टैंकों की सटीक लोकेशन पता थी। मिसाइलें सीधे निशाने पर लगीं और कराची बंदरगाह का तेल भंडार धू-धू कर जल उठा।
5 दिसंबर की सुबह तक पहला हमला पूरा हो चुका था। पाकिस्तानी नौसेना की रीढ़ टूट चुकी थी। उन्होंने अपने बचे-खुचे जहाजों को बंदरगाह के अंदर छिपा लिया।
तीन दिन बाद यानी 8 दिसंबर की रात भारतीय नेवी ने पाकिस्तान के एक तेल टैंकर और युद्धपोत PNS दक्का को भी डुबो दिया।
भारत अपना हवाई रास्ता तो पहले ही बंद कर चुका था, नेवी के इन हमलों से पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने का समुद्री रास्ता भी कट गया।

इंडियन नेवी का ओसा मिसाइल वोट। भारत ने ये वोट रूस से खरीदा था।
अब पाकिस्तान बड़ा पलटवार करने वाला था, बहुत बड़ा पलटवार…
8 दिसंबर की रात भारत का युद्धपोत INS खुखरी मुंबई से कराची के लिए निकला। टारगेट था- पाकिस्तानी पनडुब्बी PNS हैंगोर को डुबाना। 9 दिसंबर की सुबह खुखरी गुजरात तट पर पहुंच गया। कप्तान को लगा कि पाकिस्तानी पनडुब्बी आस-पास ही है।
खुखरी में एक परंपरा थी। रात 8 बजकर 45 मिनट पर सभी इकट्ठा होकर एक साथ समाचार सुना करते थे। उस रोज भी समाचार शुरू हुए- ‘यह आकाशवाणी है। अब आप अशोक वाजपेयी से समाचार….’ तभी हैंगोर से निकले पहले टारपीडो ने खुखरी को हिट किया। कैप्टन मुल्ला कुर्सी से गिर गए। उनका सिर लोहे से टकराया और खून बहने लगा।
दूसरा धमाका होते ही खुखरी की बिजली चली गई। खुखरी में 2 छेद हो चुके थे। जहाज के भीतर तेजी से पानी भर रहा था। अंदर आग लग चुकी थी। कुछ ही देर बाद खुखरी डूब गया। कैप्टन समेत 17 अफसर और 176 नौसैनिक भी डूब गए।
ये उस जंग में डूबने वाला इकलौता भारतीय जहाज था। उसके बाद भारत ने पाकिस्तान को समुद्र में टिकने नहीं दिया।
उधर जमीन पर, पूर्वी पाकिस्तान के दलदली इलाकों और टूटी सड़कों के चलते इंडियन आर्मी की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ गई थी। पाकिस्तानी फौज ढाका जाने वाले रास्तों पर घेराबंदी करके बैठी थी। मकसद था- भारतीय सेना को तब तक रोके रखो, जब तक कि संयुक्त राष्ट्र यानी यूएन दखल ना दे दे।
इंडियन आर्मी की कुछ टुकड़ियां फंसी हुई थीं। ढाका पहुंचने के लिए उन्हें मेघना नदी पार करनी थी। इस पर बना पुल पाकिस्तानी पहले ही गिरा चुके थे।

भारत के जवानों ने 13 दिनों के भीतर पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
बंगाली लड़ाकों और इंडियन आर्मी को हेलिकॉप्टरों के जरिए नदी पार कराने का फैसला किया गया।
9 से 11 दिसंबर के बीच, 36 घंटों के अंदर 110 उड़ानों के जरिए 700 से ज्यादा जवानों को मेघना नदी के पार उतार दिया गया। 11 दिसंबर तक भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान में गहराई तक घुस चुकी थी। अब सिर्फ एक ही मंजिल बची थी- ढाका।
पांच दिन बाद यानी 16 दिसंबर को भारत ने ढाका पर भी कब्जा जमा लिया। उसी रोज पाकिस्तान ने घुटने भी टेक दिए। ढाका के रेसकोर्स मैदान में पाकिस्तानी जनरल एएके नियाजी ने 93 हजार सैनिकों के साथ सरेंडर कर दिया। पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए। नए मुल्क का जन्म हुआ- ‘बांग्लादेश।’
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ऑपरेशन बांग्लादेश सीरीज का पार्ट-1 भी पढ़िए :
रेफरेंस :
1. The Kaoboys of R&AW: Down Memory Lane : By B. Raman
2. The War That Made R&AW : By Anushka Nandakumar & Sandeep Saket
3. Field Marshal Sam Manekshaw : By Maj Gen Shubhi Sood
4. A Stranger in My Own Country : By Maj. Gen. Khadim Hussain Raja
5. The Soldier and the Changing State : By Zoltan Barany
