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- N Raghuraman Column: Saving Baby Elephant In Teesta River | Inspiring Story
5 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
जरा सोचिए, अगर कोई हाथी अपनी सूंड से आपकी गर्दन को कसकर लपेट ले तो आपके चेहरे के हावभाव कैसे होंगे? भले ही हाथी कितना भी छोटा क्यों न हो। जब मैंने ऐसी तस्वीर देखी, जिसमें उस हाथी के बच्चे ने एक मछुआरे की गर्दन पर सूंड लपेट रखी थी तो सिर्फ वह मछुआरा ही नहीं, बल्कि नाव में उस छोटे हाथी को पकड़कर बैठा दूसरा मछुआरा भी हंस रहा था। उनके हाथ में कोई ट्रॉफी नहीं थी, फिर भी उनके चेहरे की खुशी को शब्दों में बयां करना मुश्किल है।
थोड़ी देर पहले तक स्थिति कतई मजेदार नहीं थी। उस 13 दिन के हाथी के बच्चे की सूंड के अलावा पानी के ऊपर कुछ और नहीं दिख रहा था। इस हफ्ते की शुरुआत में उत्तर बंगाल की उफनती तीस्ता नदी की धारा में बहकर वह बच्चा अपने झुंड से बिछड़ गया था। बहाव उसे चार किमी नीचे ले आया और वह पानी में तैरने के लिए संघर्ष कर रहा था।
जलपाईगुड़ी के पांच मछुआरों- बबलू दास, मिथुन दास, कादर दास, बिस्वनाथ और गोपाल- ने पानी के ऊपर उठती उसकी छोटी-सी सूंड देखी। वे किनारे से बेबस होकर देखते रह सकते थे। लेकिन इसके बजाय उन्होंने अपनी छोटी-सी नाव तेज धार में उतार दी।
वे हाथी के करीब पहुंचे और जब नदी उसे बहाकर ले जाने के लिए आमादा थी, तो उनमें से तीन मछुआरे तेज बहाव में कूद गए। उन्होंने घबराए बच्चे को खींचकर संकरी नाव पर चढ़ाया और फिर उसके साथ तैरने लगे। नदी की धारा के खिलाफ वे नाव को किनारे की ओर धकेलते रहे।
उस सीन की कल्पना कीजिए। पांच मछुआरे, हाथी का एक नन्हा बच्चा, एक छोटी-सी नाव और एक ताकतवर नदी, जो उन्हें अलग करने पर तुली थी। आखिरकार वे सुरक्षित जगह पहुंच गए और बच्चे को वनकर्मियों को सौंप दिया। उसे काठाम्बारी रेंज ऑफिस ले जाया गया, जहां उसे पशु चिकित्सकों की देखभाल में रखा गया। लेकिन बच्चे को नदी से बचाना तो सिर्फ आधा काम था। बड़ी चुनौती उसे उसकी मां तक पहुंचाना था।
लंबे समय तक इंसानों के संपर्क में रहने के बाद हाथी अपने बच्चे को अपनाने से मना भी कर सकते हैं। पिछले साल उत्तर बंगाल में आई बाढ़ के दौरान बचाए गए एक बच्चे को उसके झुंड ने नहीं अपनाया था। इसलिए वन अधिकारियों, स्थानीय लोगों और मछुआरों ने समय के खिलाफ एक और दौड़भाग शुरू की। करीब दो घंटे तक उन्होंने झुंड की तलाश की। आखिरकार फॉरेस्ट टीम बच्चे को बैराज के पार तीस्ता नदी के उस सूखे हिस्से तक ले गई, जहां संभावित तौर पर उसके झुंड ने पनाह ली थी।
फिर वह पल आया, जिसका सभी को इंतजार था। मां अपने बच्चे के पास पहुंची और उसे अपना लिया। जल्द ही वह अपने बच्चे को दूध पिलाती दिखी। रेस्क्यू पूरा हो चुका था। लेकिन कहीं न कहीं उन तस्वीरों में एक और कहानी भी है, जो ध्यान देने लायक है।
यह सिर्फ हाथियों, नदियों या मछुआरों की कहानी नहीं है। यह कहानी इस बारे में है कि अच्छाई करने वाले इंसान पर उसका क्या असर होता है। बच्चे के पास उसे बचाने वालों को देने के लिए पैसे नहीं थे। वह धन्यवाद नहीं कह सकता था और यह भी नहीं समझ सकता था कि बबलू, मिथुन, कादर, बिस्वनाथ और गोपाल कौन हैं। वह बस इतना-सा कर सकता था कि अपनी सूंड एक मछुआरे की गर्दन पर लपेट दे। और इतना काफी था। यही वह राहत भरी हंसी थी, जो मछुआरे के चेहरे पर आई।
यह खुशी तब चुपके-से आती है, जब हम किसी जरूरतमंद की मदद करते हैं, किसी अजनबी को दिलासा देते हैं या किसी दूसरे इंसान का मुश्किल दिन थोड़ा आसान बना देते हैं। हो सकता है इसे रिकॉर्ड करने के लिए कोई कैमरा न हो। कोई तालियां न बजाए।
शायद किसी को पता भी न चले। फिर भी हमारे भीतर कुछ मुस्कुराता है। और शायद अच्छाई का सबसे खूबसूरत सीक्रेट यही है कि जब हम किसी की जिंदगी बेहतर बनाते हैं तो अकसर अपने दिल को भी खुश कर लेते हैं। शायद उस हाथी के बच्चे ने उन्हें बदले में कुछ दिया था- यह जानने की कभी न भूलने वाली खुशी कि उन्होंने सही काम किया। सबसे ज्यादा खुश करने वाला रिवॉर्ड कभी-कभी वह होता है, जो हमें कोई नहीं देता।
फंडा यह है कि अच्छाई के लिए हमेशा किसी रिवॉर्ड की जरूरत नहीं होती। जब हम मदद करते हैं तो भीतर पैदा होने वाली खुशी पैसे से खरीदी जा सकने वाली हर चीज से बड़ी होती है।

