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नई दिल्ली2 घंटे पहले
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पीएम मोदी ने शनिवार को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) का मोबाइल ऐप लॉन्च किया।
पीएम नरेंद्र मोदी ने शनिवार को ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में शनिवार को हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) का मोबाइल ऐप लॉन्च किया।
उन्होंने कहा, भारत G20 में इकलौता ऐसा देश है, जिसने पेरिस में कॉप-21 समिट में जो भी कमिटमेंट किए थे, उन्हें समय से पूरा करके दिखाया है। कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी अक्सर विकासशील देशों पर डाल दी जाती है। जबकि भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन आज भी दुनिया के औसत से आधे से कम है।
दरअसल, पेरिस में 2015 में हुए कॉप-21 सम्मेलन में भारत ने पर्यावरण को लेकर तीन बड़े लक्ष्य तय किए थे। पहला, 2030 तक 2005 के मुकाबले कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता 33–35% कम करना था। दूसरा, 2030 तक देश की बिजली क्षमता का करीब 40% हिस्सा गैर-जीवाश्म ऊर्जा से तैयार करना था। तीसरा, पेड़ और जंगल बढ़ाकर 2.5-3 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड सोखने की क्षमता तैयार करना था।

मोदी ने कहा- भारत दुनिया में पर्यावरण सुरक्षा के नए मापदंड स्थापित कर रहा, 5 बड़ी बातें
- हम दुनिया को साथ लेकर पर्यावरण की सुरक्षा के लिए नए तरीके अपना रहे हैं। भारत अपनी पुरानी पर्यावरण संरक्षण की सोच को आधुनिक तरीके से आगे बढ़ा रहा है।
- 12 साल पहले भारत की सोलर एनर्जी करीब 2 गीगावाट थी, आज यह 160 गीगावाट से ज्यादा हो चुकी है। वहीं, 12 साल में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की संख्या 950 गुना बढ़ी है।
- विकसित देशों में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन भारत से करीब 6 गुना ज्यादा है। भारत ने इस बात को वैश्विक मंचों पर लगातार उठाया है।
- भारत ने वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड, इंटरनेशनल सोलर अलायंस, ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस, इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस और मिशन लाइफ जैसी पहल शुरू की हैं।
- भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन लॉन्च हो चुकी है। यह दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेन है और स्वच्छ परिवहन की दिशा में एक नई शुरुआत है।
पेरिस कॉप-21 क्या है?
पेरिस कॉप-21 जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के तहत आयोजित 21वां अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था, जो 30 नवंबर से 12 दिसंबर 2015 तक फ्रांस की राजधानी पेरिस में हुआ था।
इसमें करीब 195 देशों ने हिस्सा लिया और पेरिस समझौता अपनाया गया। इसका उद्देश्य दुनिया के औसत तापमान में बढ़ोतरी को 2°C से काफी नीचे रखना और 1.5°C तक सीमित करने की कोशिश करना था। इसके तहत हर देश ने कार्बन उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपने-अपने लक्ष्य तय किए थे।

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