‘मोदीजी, क्या आपका कोई करीबी दोस्त है, जिससे तनाव में बात करते हों या सलाह लेते हों?’ अंग्रेज पत्रकार एंडी मारिनो ने 2014 में ये सवाल किया।
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मोदी बोले- ‘संघ के दिनों में मेरे मेंटर थे- लक्ष्मणराव इनामदार। दिक्कत में उनसे खुलकर बात कर लेता था। अब मेरी सोचने की प्रक्रिया ऑटो-पायलट पर चल रही है।’
नरेंद्र मोदी के इस जवाब से पता चलता है कि वो इमोशनली कितने आत्मनिर्भर हैं।
76वें जन्मदिन पर उनकी शख्सियत के ऐसे ही 5 मनोवैज्ञानिक पहलुओं की कहानी…

साल 1995, गुजरात विधानसभा चुनाव। सीएम बनने को लेकर बीजेपी के 2 कद्दावर नेता शंकर सिंह वाघेला और केशुभाई पटेल भिड़ गए।
उस वक्त नरेंद्र मोदी गुजरात बीजेपी में संगठन महामंत्री थे। उन्होंने केशुभाई की मदद की। आखिरकार केशुभाई सीएम बने।
हालांकि कुछ महीने बाद नाराज वाघेला ने 47 विधायकों के साथ बगावत कर दी। मसला इतना बढ़ गया कि अटल बिहारी वाजपेयी को अहमदाबाद में कैम्प करना पड़ा। 2 दिन की बातचीत के बाद वाघेला की शर्तें मान ली गईं।
इसमें से एक शर्त थी- मोदी को गुजरात से हटाना। उन्हें दिल्ली में राष्ट्रीय सचिव बना दिया गया। मोदी ने इसे मौका माना और दिल्ली में पार्टी के बड़े नेताओं के करीबी बन गए।
मोदी ने हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू-कश्मीर जैसे उत्तरी राज्यों में संगठन का काम संभाला, कई देशों का दौरा किया, नई टेक्नोलॉजी-कंप्यूटर सीखे और संपर्क बढ़ाया। वो अक्सर दिल्ली के संघ मुख्यालय ‘केशव कुंज’ भी जाते।
1998 में केशुभाई और वाघेला में फिर से भिड़ंत हुई। केशुभाई सीएम बने। लेकिन बात इससे बनी नहीं और 2001 के आखिर में नए सीएम की खोज शुरू हुई। इसमें नरेंद्र मोदी के संघ, अटल और आडवाणी तीनों के पैमाने पर खरे उतरे।
अटल बिहारी ने मोदी को पीएम आवास बुलाकर कहा, ‘दिल्ली में पंजाबी खाना खाकर तुम काफी मोटे हो गए हो। फिर से गुजरात लौट जाओ।’
आखिरकार 6 साल बाद मोदी को गुजरात वापस भेजा गया और सीधे मुख्यमंत्री बनाया गया। राजनीतिक करियर में उन्होंने कई बार ऐसी वापसी से चौंकाया है।
मोदी कहते हैं, ‘मैं हमेशा मुश्किल हालात को मौके में बदलता हूं। पर्सनल लाइफ हो या पॉलिटिकल, मैं हमेशा ऐसा ही करता हूं। ‘हार’ शब्द मेरी डिक्शनरी में नहीं है। मैं कभी हार के बारे में नहीं सोचता। मैं कभी नहीं रुकता।’

7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के 14वें मुख्यमंत्री की शपथ लेते नरेंद्र मोदी।
कमबैक एबिलिटी से क्या फायदा?
- कमबैक एबिलिटी का मतलब सिर्फ पुराने स्तर पर लौटना नहीं है, बल्कि नाकामी से सीखकर खुद को नए, मजबूत और समझदार स्तर पर ले जाना है। इसके 2 स्टेज हैं-
- रेजिलिएंस: दिमाग की वह लचीली क्षमता, जिससे इंसान टेंशन या ट्रॉमा के बाद दोबारा नॉर्मल हो जाता है।
- पोस्ट-ट्रॉमैटिक ग्रोथ: नॉर्मल होने के बाद इंसान पहले से ज्यादा परिपक्व और मानसिक रूप से मजबूत हो जाता है।
- कमबैक करने वाले मानते हैं कि घटनाएं भले ही उनके बस में न हों, लेकिन उन पर रिएक्ट करना और कोशिश करना उनके हाथ में ही है। ये खूबियां इंसान को लंबे वक्त तक निराशा या डिप्रेशन में जाने से बचाती हैं।

8 नवंबर 2016, रात के 8:15 बजे। पीएम मोदी ने देश के नाम संबोधन में ऐलान किया, ‘आज रात 12 बजे से 500 और 1000 के नोट लीगल टेंडर नहीं होंगे।’ एक झटके में देश के 86% नोट रद्दी हो गए।
पीएम मोदी ने इस फैसले को बेहद गुप्त रखा। मंत्रियों को भी उसी शाम कैबिनेट मीटिंग में इस बारे में बताया। मोदी ने कहा, ‘मैंने पूरी रिसर्च की है। अगर यह नाकाम हुआ, तो मैं जिम्मेदार हूं।’
दरअसल, मोदी ने इसके लिए राजस्व सचिव हसमुख अधिया समेत 6 अफसरों को चुना था। इन्हें गोपनीयता की शपथ दिलाई गई। कुछ युवा रिसर्चर्स को भी टीम में जगह दी गई। ये सभी पीएम आवास से काम करते थे। एक साल की रिसर्च के बाद नोटबंदी लागू की गई।
मोदी ने नवंबर 2016 से जनवरी 2017 तक दिए हर भाषण में ब्लैक मनी और नोटबंदी का जिक्र किया। इससे जनता का मिजाज संभालने में मदद मिली।

13 नवंबर 2016 को गोवा में पीएम मोदी ने नोटबंदी को लेकर कहा, ‘आपको 50 दिन की कठिनाई सहन करनी है।’
किताब ‘हाऊ द बीजेपी विंस: इनसाइड इंडियास ग्रेटेस्ट इलेक्शन मशीन’ में सीनियर जर्नलिस्ट प्रशांत झा एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हवाले से लिखते हैं, ‘जब वे (मोदी) बोलते थे, तो हमें कुछ हफ्तों की मोहलत और मिल जाती। अगर उनकी साख न होती, तो जनता के गुस्से और दंगों का सामना किए बिना कोई सरकारी मशीनरी इसे लागू नहीं कर पाती।’
पीएम मोदी ने हर बड़े फैसले को खुद लीड किया। मसलन- 4 घंटे के नोटिस पर देश में लॉकडाउन लगाना, सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान कंट्रोल रूम से निगरानी करना। जेन-जी प्रोटेस्ट के बाद भी उन्होंने खुद इंस्टाग्राम पर सेल्फी वीडियो बनाकर पोस्ट किए।
किताब ‘नरेंद्र मोदी: अ पॉलिटिकल बायोग्राफी’ के मुताबिक, मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बैठक में मोदी ने अधिकारियों से कहा, ‘सजा की चिंता मत करो, मेरे ऑफिस में कोई सजा नहीं होगी। आपको रिस्क लेना होगा। कोई दिक्कत हुई, तो मैं जिम्मेदार हूं।’
ऑलवेज इन-कमांड से क्या फायदा?
- ऑलवेज इन-कमांड का मतलब है- हर फैसला खुद करना और जिम्मेदारी लेना।
- अमेरिकी साइकोलॉजिस्ट जूलियन रोटर की ‘लोकस ऑफ कंट्रोल’ की थ्योरी के मुताबिक, जो लोग कामयाबी और नाकामी की जिम्मेदारी लेते हैं, वे ज्यादा सफल, मानसिक रूप से मजबूत और कम तनावग्रस्त होते हैं।
- ऐसे लोग किसी बाहरी उकसावे या कठिन परिस्थितियों में मकसद से नहीं भटकते, बल्कि सोच-समझकर अगला कदम तय करते हैं। इन्हें ‘इमोशनली मास्टर’ कहते हैं।

19 फरवरी 2026 को AI समिट के दौरान पीएम मोदी ने अचानक दाएं-बाएं खड़े गूगल के CEO सुंदर पिचई और OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन का हाथ पकड़ा और इशारा किया कि सब एक-दूसरे का हाथ पकड़कर ऊपर उठाएं।
ज्यादातर लीडर्स समझ गए और एक-दूसरे का हाथ ऊपर उठा लिया, लेकिन अलग-बगल खड़े ऑल्टमैन और Anthropic के CEO डारियो अमोदेई थोड़ा असहज दिखे। उन्होंने एक-दूसरे का हाथ नहीं पकड़ा, सिर्फ मुट्ठी ऊपर उठाई। दोनों AI इंडस्ट्री में एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं। सोशल मीडिया में इसे ‘AI कोल्ड वॉर’ कहा जाने लगा।

नई दिल्ली में हुए AI समिट के दौरान पीएम मोदी के साथ ग्रुप फोटो के लिए एकजुट हुए AI लीडर्स।
ऐसा ही कुछ दिल्ली में हुई BRICS समिट में भी दिखा। 12 सितंबर की शाम सभी 11 सदस्य देशों के लीडर ग्रुप फोटो के लिए जुटे। उनके बीच में थोड़ा गैप था। कुछ तस्वीरें खिंचने के बाद पीएम मोदी ने दाएं-बाएं खड़े रूसी राष्ट्रपति पुतिन और चीनी राष्ट्रपति का हाथ पकड़कर उन्हें पास-पास किया। फौरन सभी नेताओं ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और गैप कम किया।
सोशल बोल्डनेस से क्या फायदा?
- जिनके अंदर सोशल बोल्डनेस होती है, वो हर मौके पर कॉन्फिडेंस के साथ आसानी से अपनी बात रख पाते हैं।
- ब्रिटिश-अमेरिकी साइकोलॉजिस्ट रेमंड कैटेल ने ‘16 पर्सनैलिटी फैक्टर्स’ नाम का एक मॉडल तैयार किया है। इसमें व्यक्तित्व से जुड़े 16 पैरामीटर्स में से एक है- सोशल बोल्डनेस। जिन लोगों में यह ज्यादा होती है, वे सामाजिक तनाव का सामना आसानी से कर पाते हैं।
- अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी के पूर्व प्रोफेसर अल्बर्ट बांडुरा की थ्योरी के मुताबिक, जब आप नए माहौल में खुद को प्रभावी ढंग से पेश करते हैं, तो आपकी ‘सेल्फ-एफिकेसी’ बढ़ती है, यानी अपनी क्षमताओं पर भरोसा बढ़ता है। साथ ही ‘लोग क्या सोचेंगे’ वाले डर से बचाती है।

पीएम मोदी सिर्फ साढ़े 3 से 4 घंटे सोते हैं। सुबह 5 बजे उठते हैं। फिर योग, प्राणायाम और ध्यान करते हैं। हर मौसम ठंडे पानी से नहाते हैं। शाकाहार पसंद करते हैं। यानी पर्सनल लाइफ में मोदी नियमों-कायदों से रहने वाले व्यक्ति हैं और ऐसे ही वे पब्लिक लाइफ में हैं।
जून 2014 में पीएम बनने 10 दिन के भीतर उन्होंने साउथ ब्लॉक का दौरा किया और दफ्तर में फैली बेतरतीबी का सिर्फ जिक्र किया। अफसर समझ गए कि वे साफ-सफाई और नियमों को लेकर सख्त हैं।

29 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने PMO का पहली बार दौरा किया था।
मोदी ने शुरुआती मीटिंग्स में साफ कर दिया था कि भारी-भरकम शब्द, लंबी चर्चाएं और लालफीताशाही नहीं चलेगी। थ्योरी के बजाय ‘टू द पॉइन्ट’ एक्शन प्लान दीजिए। तैयारी से आइए और फॉलो-अप मीटिंग के लिए तैयार रहिए।
मंत्री सुबह 9 बजे तक दफ्तर पहुंच जाते और साढ़े 9 बजे से बैठकें लेने लगते। हर जरूरी बैठक में पीएम खुद मौजूद रहते। अक्सर शाम तक मीटिंग्स चलतीं।
सेल्फ-डिसिप्लिन से क्या फायदा?
- सेल्फ डिसिप्लिन का मतलब आजादी खत्म करना नहीं, बल्कि आदतों और जिंदगी पर कंट्रोल है। ये रोज काम करने और लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करता है। प्रोक्रास्टिनेशन, यानी काम टालने की आदत से बचता है। प्रोडक्टिविटी बढ़ाता है।
- साइकोलॉजी के 2 टॉपिक हैं- मार्शमेलो एक्सपेरिमेंट और डिलेड ग्रैटिफिकेशन। इनके मुताबिक, जो लोग फौरन मिलने वाली खुशी को टालकर भविष्य के बड़े फायदे के लिए ठहरते हैं, वे ज्यादा सफल और संतुष्ट रहते हैं।
- न्यूरोसाइकोलॉजी के मुताबिक, सेल्फ डिसिप्लिंड इंसान के दिमाग के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स हिस्से को एक्टिव रखता है, जो लॉजिकल रीजनिंग, इंपल्स कंट्रोल और प्लानिंग के लिए जिम्मेदार है।

पहलगाम आतंकी हमले के दो दिन बाद, यानी 24 अप्रैल 2025। पीएम मोदी बिहार के मधुबनी पहुंचे। करीब 27 मिनट तक हिंदी में भाषण देने के बाद पीएम अचानक से अंग्रेजी में बोलने लगे और 82 सेकंड तक बोलते रहे।
उन्होंने कहा, ‘Today, from the soil of Bihar, I say to the whole world- India will identify, track and punish every terrorist and their backers. We will pursue them to the ends of the earth.’
बिहार के हिंदीभाषी इलाके से अंग्रेजी में बोलकर पीएम मोदी ने दुनिया, खासकर पर पश्चिमी दुनिया को मैसेज दिया कि भारत कार्रवाई करेगा।

मधुबनी से पीएम मोदी ने अंग्रेजी में बोलकर पूरी दुनिया को मैसेज दिया कि भारत एक्शन लेगा।
असर्टिव कम्युनिकेशन से क्या फायदा?
- भावनाओं में बहकर बात कहने से स्थिति बेकाबू हो सकती है। ऐसे में असर्टिव कम्युनिकेशन कारगर होता है। बिना भावनाओं में बहे दूसरे शब्दों में टार्गेटेड ऑडिएंस तक अपना मैसेज पहुंचाते हैं, ताकत का अहसास कराते हैं और बिना टकराए सीमाएं तय कर देते हैं।
- साइकोलॉजी में इसे ‘डॉग व्हिसल रेटोरिक’ कहते हैं। यानी खास लोगों तक उनकी भाषा में संदेश पहुंचाना। इससे वहां गैर-मौजूद लोगों तक मैसेज पहुंचा सकते हैं।
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References & further readings…
- नरेंद्र मोदी: अ पॉलिटिकल बायोग्राफी- एंडी मारिनो
- द पैराडॉक्सियल प्राइम मिनिस्टर: नरेंद्र मोदी एंड हिस इंडिया- शशि थरूर
- हाऊ द बीजेपी विंस: इनसाइड इंडियास ग्रेटेस्ट इलेक्शन मशीन- प्रशांत झा
- पावर विद इन: द लीडरशिप लेगेसी ऑफ नरेंद्र मोदी- आर बालासुब्रमण्यम
- मोदी डीमेस्टिफाइड: द मेकिंग ऑफ अ प्राइण मिनिस्टर- रमेश मेनन
- नरेंद्र मोदी: द मैन, द टाइम्स- नीलांजन मुखोपाध्याय
- मोदी डीमेस्टिफाइड: द मेकिंग ऑफ अ प्राइम मिनिस्टर- रमेश मेनन
- द मोदी इफेक्ट: इनसाइड नरेंद्र मोदीज कैंपेन टू ट्रांसफॉर्म इंडिया- लैंस प्राइस
- मोदीज इंडिया: हिंदू नेशनलिज्म एंड द राइज ऑफ एथनिक डेमोक्रेसी- क्रिस्टोफ जेफरलॉट
- पॉडकास्टर लेक्स फिल्डमैन के साथ बातचीत
