रायपुर में कथावाचक इंद्रेश महाराज ने गुरुवार को Gen-Z से चर्चा की। इस दौरान उन्होंने युवाओं से रिलेशनशिप, पढ़ाई, सफलता, भक्ति और जीवन के उद्देश्य पर खुलकर बातचीत की। उन्होंने कहा कि आज इंसानों को जाति, वर्ग और अलग-अलग पहचान के नाम पर बांटा जा रहा है।
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आने वाले समय में यही लड़ाई Gen-Z और Gen-Alpha के नाम पर भी हो सकती है। उन्होंने युवाओं से कहा कि इन पहचान से पहले मानव बनना और इंसानियत को समझना जरूरी है।
इंद्रेश महाराज ने कहा कि पहले लोगों का विनाश बम और हथियारों से किया जाता था, लेकिन आज सोशल मीडिया के जरिए लोगों के मन और बुद्धि को प्रभावित किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर राग-द्वेष, ईर्ष्या और नकारात्मकता बढ़ रही है। इसका असर सीधे लोगों की सोच और रिश्तों पर पड़ रहा है।

रिलेशनशिप में निष्ठा और स्पष्टता जरूरी
इंद्रेश महाराज ने रिलेशनशिप पर बात करते हुए युवाओं से कहा कि रिश्तों में निष्ठा और स्पष्टता जरूरी है। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी का एक किस्सा सुनाते हुए रिलेशनशिप की अलग-अलग स्थितियों का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि एक स्थिति ऐसी है, जब दो लोग साथ रहते हैं, लेकिन शादी नहीं करते। दूसरी स्थिति में कोई व्यक्ति एक रिश्ते में रहते हुए दूसरे व्यक्ति से भी उसी तरह बात करता है और दोनों को बराबर प्राथमिकता देता है।
उन्होंने तीसरी स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि कई बार कोई व्यक्ति किसी रिश्ते में रहता है और दूसरा उसके रिश्ता टूटने का इंतजार करता रहता है कि वह उसके पास आ जाए। ऐसी स्थिति को रिश्ता कहना ही ठीक नहीं है। उन्होंने युवाओं से कहा कि रिश्तों को खेल या विकल्प की तरह नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और भावनाओं के साथ समझना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज कॉलेजों में भी युवाओं का ध्यान पढ़ाई से ज्यादा रिलेशनशिप पर जा रहा है। ऐसे में युवाओं को अपने भविष्य और जीवन के उद्देश्य को लेकर भी गंभीर होना चाहिए।
भारत में सोमवार, मंगलवार, एकादशी और प्रदोष जैसे कई व्रत रखे जाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा व्रत पति-पत्नी की एक-दूसरे के प्रति निष्ठा का है। पति अपनी पत्नी के प्रति ईमानदार रहे और पत्नी भी अपने पति का साथ निभाए। जीवनभर एक-दूसरे के प्रति प्रेम, विश्वास और समर्पण बनाए रखना ही सच्चे रिश्ते की पहचान है।

जाति के बाद अब Gen-Z की लड़ाई न शुरू हो जाए
इंद्रेश महाराज ने कहा कि इंसानों को पहले ही जाति और दूसरी पहचानों में बांटा जा चुका है। आज ब्राह्मणवाद, बनियावाद, क्षत्रिय, दलित जैसे नामों पर बहस होती है। आने वाले समय में यह लड़ाई भी हो सकती है कि कौन Gen-Z है, कौन मिलेनियल है और कौन Gen-Alpha है।
उन्होंने कहा कि अलग-अलग पीढ़ियों के पास अपने समय के हिसाब से सुविधाएं और परिस्थितियां रही हैं। उसी के अनुसार उनकी सोच बनी है। इसका मतलब यह नहीं कि कोई बड़ा या छोटा है। पहले मानव बनिए, इंसान बनिए ।
सवाल- क्या मॉडर्न सक्सेस और भक्ति साथ-साथ चल सकते हैं?
जवाब– क्यों नहीं चल सकते? लेकिन पहले यह समझना होगा कि आप स्वतंत्रता को किस रूप में देखते हैं। फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि आपके पास पैसा आने लगे तो आप अपनी मर्जी से खा-पहन सकें और माता-पिता पर निर्भर न रहें।
आज कई युवा क्लब जाना नहीं चाहते, वहां का माहौल भी उन्हें पसंद नहीं आता, लेकिन सिर्फ इस डर से जाते हैं कि कहीं उनका फ्रेंड सर्कल उन्हें अपने से दूर न कर दे या उन्हें पुराने विचारों वाला न समझे। यह कैसी स्वतंत्रता है? आप उन चार दोस्तों की गुलामी कर रहे हैं।
इंडिपेंडेंट होने का मतलब है कि आपकी बुद्धि और विचार संकीर्ण न रहें, बल्कि विकसित हों। जिस सुख और आनंद आप क्लब में ढूंढने जाते हैं, उससे कहीं अधिक आनंद आपको संकीर्तन और कथा में मिल सकता है।
मेरे पास एक लड़की आई थी। वह 21-22 साल की थी और उसने कहा कि वह झांसी में मेरी कथा कराना चाहती है, लेकिन पहले आईएएस अधिकारी बनना चाहती है। उसका उद्देश्य था कि अपनी जगह का उत्थान कर सके और अपनी पहली सैलरी से कथा कराए।
बाद में उसने आईएएस अधिकारी बनने के बाद अपने माता-पिता को दोस्त की तरह बुलाकर कथा कराई। इसलिए अपनी जिंदगी में ऐसे दोस्तों को चुनिए, जो आपको कथा, सत्संग और वृंदावन लेकर जाएं। सिर्फ इसलिए किसी काम को मत कीजिए कि दोस्त आपसे दूर न हो जाएं।

सवाल- हम अपनी जिंदगी की तुलना दूसरों से करने लगते हैं। इसे कैसे रोकें?
जवाब- यह मानव स्वभाव है। इंसान को अक्सर अपने से ज्यादा खुश दूसरा व्यक्ति दिखाई देता है। हमें लगता है कि सामने वाला हमसे ज्यादा सुखी है।
इसका एक उदाहरण मैं खुद हूं। आपको लगता है कि मैं कितना आनंद में हूं, लेकिन मेरे ऊपर 10 हजार लोगों के सामने कथा करने का दबाव है। लाइव टेलीकास्ट होता है, आलोचनाएं सहनी पड़ती हैं। परिवार के लोग फोन करते हैं और कई बार मैं फोन तक नहीं उठा पाता।
फिर भी हमें लगता है कि सामने वाला हमसे ज्यादा खुश है। इसे पूरी तरह बदलना मुश्किल है। इसका रास्ता भक्ति है।
भक्ति के बाद भावना बदलने लगती है। फिर यह नहीं लगता कि सामने वाला मुझसे ज्यादा खुश क्यों है, बल्कि मन में आता है—“हे ठाकुर जी, इसे और प्रसन्न कर दो, इसे और आनंद दो।” सबके सुखी होने की भावना ही साधु स्वभाव है।
सवाल- जब पता है कि एक दिन चले जाना है तो फिर संसार में इतना क्यों लगे रहते हैं?
जवाब- क्योंकि यह कर्म का बंधन है। हम कुछ कर्म करके आए हैं और उनका परिणाम भी हमें भुगतना है। संसार भी तभी आगे बढ़ेगा, जब हर व्यक्ति अपना कर्म करेगा। अगर हम यह सोचकर बैठ जाएं कि एक दिन मरना ही है, इसलिए कुछ करने की जरूरत नहीं, तो यह भी सही नहीं है।
हमें इस संसार में कुछ करके, कुछ विकास करके और दूसरों को प्रेरणा देकर जाना है। इसलिए जीवन को सफल बनाने के लिए हम यहां आए हैं। सिर्फ मरने के लिए नहीं, बल्कि अपने हिस्से का काम करके जाने के लिए।
सवाल- अगर सब कुछ पहले से लिखा है तो फिर मेहनत क्यों करें? और मनचाहा परिणाम न मिले तो क्या करें?
जवाब- हमें यह पता नहीं है कि क्या लिखा हुआ है। इसलिए हमें प्रयास करना ही होगा। मान लीजिए मुझे कोई विश्वविद्यालय जाना है। मुझे मंजिल पता है, लेकिन रास्ते में कितने गड्ढे हैं, कहां मोड़ आएगा, बारिश होगी या तूफान आएगा, यह मुझे नहीं पता। अगर मैं रास्ते की सारी परेशानियों के बारे में सोचता रहूंगा तो मंजिल तक कभी नहीं पहुंच पाऊंगा।
इसलिए मंजिल को ध्यान में रखकर चलते रहिए। रास्ते में जो आएगा, उसका सामना करते हुए आगे बढ़िए। यह भी जरूरी नहीं कि जिस मंजिल की आपने कल्पना की है, वहां बिल्कुल वही परिणाम मिले। जिंदगी में थोड़ी अनिश्चितता रहेगी ही।
इसलिए पूरी मेहनत कीजिए, लेकिन अपनी इच्छाओं का बोझ बहुत ज्यादा मत रखिए। खुश रहने की इच्छा जरूर रखिए। चाहे जिंदगी में कोई दिल तोड़कर चला जाए या कोई मुश्किल आ जाए, फिर भी हंसते-मुस्कुराते रहिए और अपने उद्देश्य पर काम करते रहिए।

सवाल- दिनभर कॉन्फिडेंट रहता हूं, लेकिन अकेले में डर लगता है कि अगर मैं सफल नहीं हुआ तो क्या होगा?
जवाब- आपने खुद बताया कि जो काम उठाते हैं, उसे कर भी लेते हैं। फिर भी मन में डर रहता है कि अगर यह काम नहीं हुआ तो क्या होगा। यहां सबसे पहले आपको यह समझना होगा कि आप अपने लिए जी रहे हैं या किसी दूसरे की इच्छा पूरी करने के लिए।
अगर आपके पिता चाहते हैं कि आप डॉक्टर बनें और आप केवल उनकी इच्छा के लिए यह कर रहे हैं, तो कहीं न कहीं आपने खुद को पीछे कर दिया है।
मेरे पिता कभी नहीं चाहते थे कि मैं कथावाचक बनूं। मैं सिंगर बनना चाहता था। मैंने उनसे कहा तो उन्होंने कहा कि अगर गायक बनना चाहते हो तो वृंदावन में क्या कर रहे हो? मुंबई जाओ। मैं वहां गया, म्यूजिक डायरेक्टर से मिला और ऑडिशन दिए।
बाद में मेरे नाना जी ने सिर्फ एक बात कही “सिंगर बनकर संसार के लोगों को रिझाओगे, लेकिन संसार आज रिझेगा और कल नहीं। अगर परमात्मा को रिझा लिया तो वह हमेशा प्रसन्न रहेंगे। इसलिए पहले यह तय कीजिए कि आप जिंदगी में करना क्या चाहते हैं। सिर्फ फाइनेंशियली फ्री होना कोई उद्देश्य नहीं है। उद्देश्य तय कीजिए और उस दिशा में आगे बढ़िए।
डर लगे तो थोड़ा एकांत में बैठकर भगवान का स्मरण कीजिए। “हरे कृष्ण, हरे कृष्ण…” का जाप कीजिए और फिर आगे बढ़ जाइए। अगर कोई काम नहीं हुआ तो भी यह मानिए कि शायद उसमें आपकी भलाई रही होगी।
सवाल- हमें पता होता है कि कोई काम गलत है, फिर भी हम उसे छोड़ नहीं पाते। इससे कैसे बचें?
जवाब- महाभारत में धृतराष्ट्र ने भी यही बात कही थी—वह जानते थे कि धर्म क्या है, लेकिन फिर भी धर्म के रास्ते पर चल नहीं पा रहे थे। हमारे आसपास का वातावरण हमारे व्यवहार को प्रभावित करता है। अगर आसपास के लोग लगातार गलत काम कर रहे हैं और हमें यह भरोसा दिलाते रहते हैं कि “एक बार करके देख लो, कुछ नहीं होगा”, तो धीरे-धीरे हमें भी वही सही लगने लगता है।
गलत काम का असर तुरंत दिखाई नहीं देता। वह धीरे-धीरे दीमक की तरह मन और विचारों को कमजोर करता है। बाद में व्यक्ति सोचता है कि पहले मैं इतना दयालु था, अब मेरे अंदर इतनी कठोरता और कपट क्यों आ गया?इसलिए अपने आसपास के वातावरण को थोड़ा ठीक कीजिए। ऐसे लोगों के साथ कम बैठिए, कम बात कीजिए और कम समय बिताइए, जो लगातार गलत कामों में लगे रहते हैं।
अगर उनसे पूरी तरह दूर रहना संभव नहीं है तो अकेले में ध्यान और भगवान का स्मरण कीजिए। जिस नाम में आपकी श्रद्धा हो, उसका जाप कर सकते हैं। इससे मन को स्थिर रखने में मदद मिलती है।
सवाल- भक्त व्यक्ति को भी जीवन में दुख क्यों सहना पड़ता है?
जवाब- अगर भगवान श्रीराम स्वयं परमात्मा होते हुए 14 वर्ष के लिए वन गए, तो हमारे जीवन में दुख आने पर सवाल क्यों होना चाहिए? भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में भी ऐसी परिस्थितियां आईं, जब उन्हें ब्रजवासियों से दूर जाना पड़ा और रणभूमि छोड़नी पड़ी। संसार का असली स्वरूप ही “दुःखालयम् शाश्वतम्” बताया गया है। यहां हम केवल सुख भोगने नहीं आए हैं। हमें अपने कर्मों के परिणाम भी भुगतने पड़ते हैं।
कई बार हम पूछते हैं कि पिछले जन्म में हमने क्या किया, हमें तो याद भी नहीं। लेकिन यही कर्म का चक्र है। इसीलिए जीवन में आने वाले हर दुख का कारण हमें पता हो, यह जरूरी नहीं। भक्ति दुख को जीवन से पूरी तरह खत्म नहीं करती, लेकिन व्यक्ति को इतना सक्षम बना सकती है कि दुख उसे तोड़ न पाए, बिखेर न पाए।इसे ऐसे समझिए भक्ति एनेस्थीसिया की तरह है। ऑपरेशन तो होगा, लेकिन दर्द कम महसूस होगा।
