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ड्राइविंग करते-करते सीखा बेकरी का हुनर:कोडरमा में खड़ा किया अपना कारोबार, टोस्ट, ब्रेड पापड़, बन से कमाई कर दे रहा रोजगार




कोडरमा के झुमरीतिलैया स्थित बिशुनपुर रोड निवासी अर्जुन महतो के बेटे दिलीप ने मेहनत और हुनर के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई है। करीब एक साल पहले तक दिलीप एक बेकरी में गाड़ी चलाने का काम करते थे। गाड़ी चलाते हुए उनकी नजर बेकरी में तैयार होने वाले प्रोडक्ट और उन्हें बनाने के तरीके पर रहती थी। धीरे-धीरे उन्होंने टोस्ट, ब्रेड पापड़, बन और ब्रेड समेत अन्य उत्पाद तैयार करने की प्रक्रिया सीखी। साथ ही बेकरी कारोबार में होने वाले मुनाफे और बाजार की मांग को भी समझा। इसके बाद उनके मन में खुद का कारोबार शुरू करने का विचार आया। उन्होंने घर पहुंचकर माता-पिता को अपनी इच्छा बताई। पिता ने बड़े कारोबार के लिए पैसे की व्यवस्था को लेकर सवाल किया। इसके बाद दिलीप ने जानकारी जुटाई और पीएमएफएमई योजना के तहत 35 प्रतिशत सब्सिडी पर 7.50 लाख रुपए का लोन लिया। इसी पूंजी से उन्होंने अपनी बेकरी शुरू की। शुरुआती दौर में कुछ परेशानियां आईं, लेकिन धीरे-धीरे कारोबार पटरी पर आ गया। रोज 70 किलो मैदा, 7-8 हजार का कारोबार दिलीप फिलहाल रोज करीब 70 किलो मैदा से बेकरी के विभिन्न उत्पाद तैयार करते हैं। तैयार माल बाजार में करीब 7 से 8 हजार रुपए प्रतिदिन में बिक जाता है। इससे उन्हें रोज करीब 1 से 1.5 हजार रुपये की आमदनी होती है। दिलीप के अनुसार, इससे सालाना करीब 5 से 6 लाख रुपए की आमदनी हो जाती है। फिलहाल वे टोस्ट, ब्रेड पापड़, बन और ब्रेड तैयार कर रहे हैं। आने वाले दिनों में बेकरी से जुड़े अन्य उत्पाद भी तैयार करने की योजना है। उन्होंने बताया कि अभी बेकरी लोन पर है, इसलिए किस्त चुकाने के बाद आर्थिक दबाव रहता है। हालांकि उत्पादन बढ़ने और लोन की किस्तें खत्म होने के बाद आमदनी में और बढ़ोतरी की उम्मीद है। बेकरी के इस काम में पूरा परिवार भी जुड़ा है। पिता अर्जुन महतो, मां और दिलीप की पत्नी उत्पाद तैयार करने में सहयोग करते हैं, जबकि दिलीप और उनका छोटा भाई बाजार में तैयार माल की बिक्री और अधिक से अधिक दुकानों तक उत्पाद पहुंचाने की जिम्मेदारी संभालते हैं। पिता अब बेटे के कारोबार में बने भागीदार दिलीप के पिता अर्जुन महतो बताते हैं कि एक-दो साल पहले तक वे घर से कुछ दूरी पर स्थित आश्रम से खुदरा भाव में सब्जियां खरीदकर घर-घर बेचते थे। इससे होने वाली आमदनी से परिवार की जरूरतें किसी तरह पूरी होती थीं। बेटे ने जब बेकरी का कारोबार शुरू किया तो धीरे-धीरे परिवार की स्थिति बदलने लगी। अब अर्जुन ने सब्जी बेचना छोड़ दिया है। बेटे के कारोबार में हाथ बंटाते हैं। उनका कहना है कि इस काम से आमदनी भी हो रही है। बेटे की मदद भी हो जाती है। साथ ही, काम करने में उन्हें संतोष मिलता है। दिलीप की कहानी उन युवाओं के लिए मिसाल है, जो मुश्किल परिस्थितियों में हिम्मत हार जाते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने अनुभव को हुनर में बदला और उसी हुनर के सहारे अपना कारोबार खड़ा किया।



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