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नीमा में फाइलेरिया जांच के लिए लगा कैंप:दो जगहों पर लगा 'नाइट ब्लड सर्वे', 100 से ज्यादा सैंपल लिए गए




बांका में फाइलेरिया (हाथीपांव) जैसी गंभीर बीमारी के समूल खात्मे और माइक्रो फाइलेरिया की पहचान को लेकर स्वास्थ्य विभाग द्वारा रजौन प्रखंड में ‘नाइट ब्लड सर्वे’ अभियान पूरी मुस्तैदी से चलाया जा रहा है। अभियान में तेजी लाते हुए प्रखंड के नीमा गांव में बुधवार को लगातार तीसरे दिन दो अलग-अलग स्थानों पर रात्रि 10 बजे से विशेष शिविर आयोजित किए गए। गांव में दो स्थानों पर कैंप लगाकर लोगों के सैंपल लिए जा रहे हैं। दोनों स्थानों पर करीब 100 लोगों का ब्लड सैंपल लिया जा चुका है। ​ रजौन सीएचसी के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. ब्रजेश कुमार ने बताया कि अभियान के पहले दिन सोमवार को लिए गए 77 रक्त नमूनों की जांच में 2 लोग माइक्रो फाइलेरिया से संक्रमित (पॉजिटिव) पाए गए हैं। वहीं मंगलवार को दूसरे दिन के शिविर में 78 ग्रामीणों के सैंपल एकत्र किए गए। इस प्रकार नीमा गांव में शुरुआती दो दिनों के भीतर कुल 155 लोगों के रक्त नमूने लिए जा चुके थे, और अब तीसरे दिन की जांच को मिलाकर यह आंकड़ा तेजी से 300 के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। ​ प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. ब्रजेश कुमार ने बताया कि रजौन प्रखंड के तीन चयनित गांवों- नीमा, पुनसिया और लहोरिया से 300-300 के हिसाब से कुल 900 रक्त नमूने संग्रह करने का लक्ष्य निर्धारित है। इसके लिए अधिकतम चार दिनों का माइक्रो प्लान तैयार किया गया है। नीमा गांव का 300 का लक्ष्य पूरा होते ही टीम अगले चरण में पुनसिया और फिर लहोरिया गांव में सर्वे का कार्य शुरू करेगी। ​डॉ. ब्रजेश कुमार ने क्षेत्रवासियों से अपील करते हुए कहा कि दो पॉजिटिव मरीज मिलने के बाद लोगों को और अधिक सतर्क होने की जरूरत है। फाइलेरिया के सूक्ष्म परजीवी (माइक्रोफाइलेरिया) रात के समय ही मानव रक्त में सक्रिय होते हैं, इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नमूनों का संग्रह देर रात ही किया जाता है। उन्होंने कहा कि फाइलेरिया का संक्रमण शरीर में पहुंचने के बाद कई वर्षों तक कोई लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए जिन लोगों में कोई लक्षण नहीं हैं, वे भी अनिवार्य रूप से शिविर में पहुंचकर अपनी जांच कराएं। शिविर में बीसीएम विष्णुदेव कापरी, सीएचओ कौशल कुमार, सीएचओ आनंद कुमार, जीएनएम पवन कुमार, एएनएम विनीता कुमारी और लैब तकनीशियन राजेश रंजन मुस्तैदी से अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, जबकि पीरामल फाउंडेशन की टीम भी पूरे अभियान में तकनीकी सहयोग प्रदान कर रही है।



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