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कबीर दास जी कुछ बातें ऐसी लिख गए हैं, जिनका आज बहुत समसामयिक महत्व दिखता है। उनकी एक पंक्ति को हम जेन-जी के लिए संदेश मान सकते हैं- माला तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुख मांहि। मनुवा तो दहु दिसि फिरे, यह तो सुमिरन नाहिं। अब इसे सुनकर लगता है कबीर दास जी ने माला फेरने वालों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की है। पर यहां माला मतलब कर्मयोग है। मन कर्मयोगी को भटकाता है। इसलिए वो कहते हैं कि अपने लक्ष्य के प्रति जागरूक रहें। दस दिशा में मन घूमता है। जेन-जी का उत्साह, उनकी ऊर्जा भी इस तरह से सभी दिशाओं में फैली है। दुनिया के हर कोने से उनकी अंगड़ाइयों के स्वर आ रहे हैं। इसलिए कबीर ने एक और इशारा किया है कि मन जब भटके तो एक रास्ता और है मन को मोड़ने का, और वो है अपने भीतर। जब भी कोई मनुष्य अपने भीतर उतरेगा तो उसको थोड़ी शून्यता की अनुभूति होगी और वही उसकी असली ऊर्जा है। जेन-जी कितने ही व्यस्त हों पर थोड़ा समय योग और ध्यान पर जरूर लगाएं।
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:जेन-जी कितने ही व्यस्त हों थोड़ा समय योग-ध्यान को दें
