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पद्मश्री लौटाने वाले भगत पूरन सिंह को मिले भारत रत्न:BJP-MP साहनी ने HM को लिखा पत्र, समाजिक सेवा में अहम योगदान; गोल्डन टेंपल पर सैन्य कार्रवाई से नाराज थे




गोल्डन टेंपल पर सैन्य कार्रवाई के खिलाफ 1984 में पद्मश्री लौटाने वाले व पंजाब के अमृतसर में पिंगलवाड़ा के संस्थापक भगत पूरण सिंह को मरणोपरांत देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की डिमांड आम आदमी पार्टी (AAP) से भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुए राज्यसभा सांसद डॉ. विक्रमजीत सिंह साहनी ने की। डॉ विक्रमजीत सिंह साहनी ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखा और कहा है कि पिंगलवाड़ा (अमृतसर) के संस्थापक भगत पूरण सिंह समाजसेवी के साथ पर्यावरण प्रेमी भी थी। सांसद साहनी ने अपने पत्र में कहा कि भगत पूरन सिंह जी का पूरा जीवन मानव सेवा, पर्यावरण संरक्षण और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े उपेक्षित लोगों के कल्याण के लिए समर्पित रहा। वे एक सच्चे समाजसेवी और दूरदर्शी थे, जिन्होंने बिना किसी निजी स्वार्थ के जीवन भर अनाथों, बीमारों और बेसहारा लोगों को आश्रय दिया। भगत पूरण सिंह को 1981 में भारत सरकार ने पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया लेकिन तीन साल बाद ही 1984 में उन्होंने गोल्डन टेंपल में हुई सैन्य कार्रवाई के खिलाफ अपना पद्म श्री अवार्ड लौटा दिया था।
साहनी ने गृहमंत्री को लिखे लेटर में कही ये अहम बातें.. भारत रत्न देने की मांग: सांसद बिक्रमजीत सिंह साहनी ने गृहमंत्री अमित शाह को लिखे पत्र में अपील की है कि निष्काम मानव सेवा और समाज के प्रति अप्रतिम योगदान को देखते हुए भगत पूरन सिंह जी को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया जाए। उन्होंने लिखा है कि वो इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान के लिए डिजर्व करते हैं। जीवन भर का समर्पण: उन्होंने पत्र में स्पष्ट लिखा कि भगत पूरन सिंह जी का अपना कोई स्थायी घर नहीं था। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन गरीबों, लाचारों, दिव्यांगों और अनाथों की देखभाल और सेवा में बिता दिया। पिंगलवाड़ा की स्थापना का उल्लेख: पत्र में इस सांसद साहनी ने कहा है कि 1947 में स्थापित पिंगलवाड़ा समाज के उपेक्षित वर्गों के लिए एक सहारा बना। यहां बच्चों, बुजुर्गों और विधवाओं को जीवन के सबसे कठिन और असहनीय क्षणों में एक आत्मीय और पारिवारिक माहौल मिलता है। पर्यावरण संरक्षण के प्रयास: साहनी ने गृहमंत्री का ध्यान भगत पूरन सिंह जी द्वारा पर्यावरण के क्षेत्र में किए गए कार्यों की ओर भी आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि पूरन सिंह जी ने बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाए और पर्यावरण से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर जन-जागरूकता फैलाई। पद्मश्री लौटाने का संदर्भ: सांसद ने पत्र में इस ऐतिहासिक तथ्य का भी उल्लेख किया कि 1981 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया था, लेकिन 1984 में श्री हरिमंदिर साहिब (गोल्डन टेंपल) पर हुई सैन्य कार्रवाई के विरोध में उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए यह नागरिक सम्मान सरकार को वापस लौटा दिया था।
भगत पूरन सिंह की उपलब्धियां सिलसिलेवार जानिए… 1947 में ऑल इंडिया पिंगलवाड़ा की स्थापना: भारत-पाक विभाजन के समय जब लाखों लोग विस्थापित और असहाय हो गए थे, तब उन्होंने अमृतसर में बेसहारा, मानसिक व शारीरिक रूप से अक्षम लोगों और गंभीर बीमारियों से पीड़ितों के आश्रय के लिए पिंगलवाड़ा की नींव रखी। ‘चलती-फिरती संस्था’ के रूप में पहचान: भगत पूरन सिंह खुद हाथ से चलने वाली गाड़ी पर असहाय और गंभीर रूप से बीमार मरीजों को लादकर सड़कों और रेलवे स्टेशनों से उठाते थे और उनका इलाज कराते थे। वे खुद भिक्षा मांगकर मरीजों के भोजन और दवाओं का प्रबंध करते थे। पर्यावरण संरक्षण के अग्रदूत: आज जब वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संकट की चर्चा होती है, भगत पूरन सिंह जी ने दशकों पहले ही पॉलिथीन के नुकसान, वनों की कटाई और जल प्रदूषण के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था। उन्होंने खुद अपने हाथों से हजारों पेड़ लगाए और लोगों को पौधे बांटे। साहित्यिक एवं जागरूकता योगदान: उन्होंने पर्यावरण, सामाजिक बुराइयों, नशाखोरी और स्वच्छता जैसे विषयों पर सैकड़ों पम्फलेट, पर्चे और पुस्तकें लिखकर लोगों में बांटीं। वे कागज की बचत के लिए पुरानी कॉपियों और रद्दी पन्नों का उपयोग संदेश छापने के लिए करते थे। पद्मश्री पुरस्कार (1981): मानवता के प्रति उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1981 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया। हालांकि, 1984 के घटनाक्रम से आहत होकर उन्होंने यह सम्मान वापस कर दिया था। अविचल सेवा संस्थान का निर्माण: आज भी अमृतसर स्थित पिंगलवाड़ा संस्था बिना किसी सरकारी अनुदान पर पूरी तरह से निर्भर हुए, जन-सहयोग के बल पर हजारों लाचारों, अनाथों और रोगियों को मुफ्त भोजन, आवास, शिक्षा और चिकित्सा सुविधाएं प्रदान कर रही है। बेसहारा लोगों का सहारा बना पिंगलवाड़ा: भगत पूरण सिंह ने अमृतसर में बेसहारा, बीमार, दिव्यांग, बुजुर्ग और जरूरतमंद लोगों की सेवा के लिए पिंगलवाड़ा की स्थापना की। संस्था 6 मार्च 1957 को ऑल इंडिया पिंगलवाड़ा चैरिटेबल सोसाइटी के रूप में पंजीकृत हुई। पिंगलवाड़ा में जरूरतमंद दिव्यांगों के लिए कृत्रिम अंग, फिजियोथेरेपी, आंखों और दांतों से संबंधित चिकित्सा सुविधाएं विकसित की गईं। जिन बच्चों का कोई सहारा नहीं था, उन्हें पिंगलवाड़ा में आश्रय, भोजन, शिक्षा और देखभाल उपलब्ध कराई गई। प्राकृतिक खेती को बढ़ावा: उन्होंने रासायनिक खाद और कीटनाशकों से मुक्त खेती की वकालत की। पिंगलवाड़ा ने बाद में उनके विचारों के आधार पर प्राकृतिक खेती के फार्म विकसित किए। पिंगलवाड़ा में प्रिंटिंग प्रेस स्थापित कर पर्यावरण, जनसंख्या वृद्धि, बेरोजगारी, जंगलों की कटाई और सामाजिक समस्याओं पर सामग्री प्रकाशित कर मुफ्त बांटी गई। पिंगलवाड़ा की नर्सरी में पौधे तैयार कर लोगों को मुफ्त बांटने की व्यवस्था की गई, ताकि हरियाली और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिले।भगत पूरण सिंह हाथ से बनी खादी के समर्थक थे। वे स्वयं खादी पहनते थे और अपने कर्मचारियों को भी खादी उपलब्ध कराने पर जोर देते थे।



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