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पटना के हाईप्रोफाइल विधानसभा सीट बांकीपुर में हुए उपचुनाव में जन सुराज के प्रशांत किशोर ने निर्णायक बढ़त ले ली है। उनकी जीत अब करीब-करीब पक्की है। भाजपा अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट पर हार के करीब है। 30 साल बाद यह सीट भाजपा के हाथ से जा रही है। भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद ब्राह्मण और भूमिहार समाज की नाराजगी भाजपा को भारी पड़ी है। नीट पेपर लीक के बाद हुए विरोध प्रदर्शन के चलते युवाओं ने भी जन सुराज के लिए खुलकर वोट दिया। भाजपा को क्यों अपने गढ़ में ही हार मिलने वाली है? प्रशांत किशोर क्यों जीत की ओर बढ़ रहे हैं? 7 पॉइंट में जानिए…। 1- भरत तिवारी एनकाउंटर, ब्राह्मण और भूमिहार समाज की नाराजगी भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर ब्राह्मण और भूमिहार वोट बैंक में सम्राट सरकार के खिलाफ काफी नाराजगी थी। इन्हें बीजेपी का कोर वोट बैंक माना जाता है। उपचुनाव को ब्राह्मण और भूमिहार मतदाताओं ने अपना गुस्सा प्रकट करने के मौके के रूप में इस्तेमाल किया। इसमें राजपूत वोट बैंक ने भी मदद कर दी। प्रशांत किशोर ने बांकीपुर के अलग-अलग मोहल्लों की सवर्ण बहुल सोसायटियों, क्लबों और व्यापारिक मंडलों के साथ छोटी-छोटी बैठकें कीं। लोगों को समझाया कि भाजपा शासन में जहानाबाद की नीट छात्रा हत्याकांड और आरा के भरत तिवारी का एनकाउंटर हुआ। किसी को न्याय नहीं मिला। भाजपा ने कथित तौर पर एक कम पढ़े लिखे और आपराधिक चरित्र वाले व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया है। कुर्मी वोट बैंक की नाराजगी: कुर्मी वोट बैंक में दो तरह की नाराजगी रही। नीतीश कुमार को बीजेपी ने जिस तरह से CM की कुर्सी से हटाया और वे राज्यसभा गए। उससे कुर्मी वोट बैंक में नाराजगी है। निशांत कुमार की इंट्री राजनीति में हुई। वह विधान परिषद गए, मंत्री बनाए गए, लेकिन कुर्मियों की नाराजगी दूर नहीं हुई। जमीन की बिक्री पर रोक: 12 टाउनशिप के निर्माण के लिए सरकार ने जमीन की खरीद बिक्री पर रोक लगा दी। इसका असर सवर्ण वोट बैंक के साथ ही कुर्मी वोट बैंक पर काफी पड़ा। ये ऐसा वर्ग है जो अपनी जमीनों पर ऐसी बंदिश बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। इसको लेकर इनके अंदर गुस्सा है। प्रशांत किशोर ने अपनी जनसभाओं में लोगों को समझाया कि भाजपा ने आपको ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ ले लिया है। ब्राह्मण समाज (सवर्ण) से आने वाले प्रशांत किशोर ने लोगों के बीच ‘राइट पीपल, राइट थिंकिंग’ (सही लोग, सही सोच) का अपना विचार बताया। व्यवस्था में बदलाव के लिए वोट की अपील की। 2- जेन-जी फैक्टर, छात्रों पर चली लाठी का युवाओं ने लिया बदला बांकीपुर चुनाव ऐसे वक्त हुआ जब दिल्ली में नीट पेपर लीक को लेकर जेन-जी आंदोलन चला। धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा। पटना समेत पूरे बिहार में छात्रों ने आंदोलन किया, पुलिस ने जमकर लाठी चलाई। नतीजा यह हुआ कि किसी भी जाति के युवा हों उनके अंदर बीजेपी के प्रति नाराजगी उपजी और उन्होंने बदलाव के लिए जन सुराज को चुना। यह उपचुनाव मुख्य रुप से बदलाव के लिए वोटिंग वाला चुनाव रहा। 3- नाराज नेताओं को अपनी ओर किया पीके ने बीजेपी और आरजेडी के कई नाराज नेताओं को अपनी तरफ किया। अतिपिछड़ा नेता रामबली चंद्रवंशी की सदस्यता आरजेडी ने बिहार विधान परिषद से खत्म करवा दी। इसके बाद रामबली जन सुराज के साथ चले गए। पीके ने उन्हें बांकीपुर उपचुनाव का प्रभारी बना दिया। शक्तियां नहीं दी तो रामबली गुस्सा हो गए। अंतिम समय में पीके ने रामबली को मना लिया। वे पीके साथ नजर आने लगे। बांकीपुर विधानसभा में चंद्रवंशियों के वोट बैंक को अपनी तरफ करने में पीके कामयाब रहे। 4- एक महीने में 150 चाय पर चर्चा, 50 जनसभाएं पीके ने ताबड़तोड़ चुनावी जनसभाएं की। 30 दिन में हर दिन 5 चाय पर चर्चा और 2 जनसभा की। राजद से अधिक बीजेपी को टारगेट पर लिया। सम्राट चौधरी पर खूब हल्ला बोला। घर-घर जाकर वोट मांगा। जनता से बार-बार कहते रहे कि अपने बच्चों के लिए वोट करिए, सरकार को बदलने के लिए वोट कीजिए। यह नरेटिव गढ़ने में लगे रहे कि उनकी जीत होगी तो बीजेपी बिहार में मुख्यमंत्री बदल देगी। दूसरा बड़ा नरेटिव गढ़ा कि बीजेपी वाले तो कहते रहते हैं कि कुत्ता-बिल्ली किसी को यहां से टिकट देंगे तो वह जीत जाएगा। ऐसा बोलकर प्रशांत ने वोट बैंक का विस्तार किया। बीजेपी ने ऐसा उम्मीदवार दिया जो ठीक से अपनी बात भी नहीं रख पा रहा था। इससे फायदा हुआ कि प्रशांत के बयान ही घूमते रहे। 5- नितिन नवीन की खामियों को गली-गली गिनाया प्रशांत किशोर की टीम गली-गली घूमती रही और दिखाती रही कि साफ-सफाई, सड़क और जल जमाव की स्थिति कैसी है। पीके खुद भी इसे नितिन नवीन का फेल्योर बताते रहे, जबकि यह काम नगर निगम के जिम्मे आता है। पीके लोगों को यह समझाने में कामयाब रहे कि विधायक का दायित्व भी होता है कि इसे देखे। बांकीपुर पटना का एक प्रमुख शहरी इलाका है। प्रशांत किशोर और उनकी टीम पारंपरिक जातिगत नारों के बजाय ड्रेनेज/जलजमाव की समस्या, ट्रैफिक प्रबंधन और इंफ्रास्ट्रक्चर, हायर एजुकेशन और युवाओं के पलायन जैसे मुद्दों को उठाया। लोगों को मिलने वाली सुविधा पर ध्यान दिलाया। 6- मंदिर-मंदिर मत्था टेका, अपनी छवि बदली बांकीपुर उपचुनाव के लिए प्रशांत किशोर ने अपनी छवि बदली। 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले बिहार यात्रा के दौरान जो PK माथे पर तिलक लगाने के चंद सेकेंड बाद उसे पोंछते नजर आए थे उन्होंने मंदिरों के चक्कर लगाए। प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद ही मंदिर-मंदिर जाना और पूजा करना शुरू कर दिया। वह माथे पर त्रिपुंड लगाए नजर आए। इस तरह आम वोटर खास तौर से सवर्णों और वैश्य वोटर को रिझाया। सिर के बढ़े बालों को चोटी जैसा आकार दे दिया। सवर्णों के यह कनेक्ट करता रहा। 6- यादव-मुस्लिम वोट डायवर्ट किया यादवों और मुसलमानों को लग गया कि तेजस्वी यादव ठीक से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। वे दो दिन के रोड शो पर निकले बाकी ज्यादातर समय विदेश में रहे। विधानसभा के मानसून सत्र से भी पूरी तरह से गायब रहे। यादवों के एक बड़े हिस्से को लगा कि बीजेपी से जन सुराज ही लड़ रही है। यही वजह है कि यादव वोट बैंक का एक हिस्सा जन सुराज की तरफ ढल गया। मुसलमानों में तेजस्वी को लेकर तो नाराजगी है ही। विधानसभा चुनाव के समय महागठबंधन की ओर से अतिपिछड़ा नेता मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री का फेस घोषित किया गया, लेकिन किसी मुसलमान फेस की घोषणा नहीं की। उसी समय यह बात गूंजी थी कि क्या मुसलमान सिर्फ चादर बिछाने के लिए हैं। दुजरा और सब्जीबाग इलाकों में जन सुराज ने काफी मेहनत की और मुसलमान वोट बैंक के बड़े हिस्से को अपनी तरफ करने में कामयाब रहे। मुसलमानों को भी लगा कि आरजेडी को वोट देने का मतलब वोट बर्बाद करना है। बीजेपी को रोकना है तो जन सुराज को वोट देना होगा। पीके लगातार बीजेपी पर हमलावर रहे, तेजस्वी पर नहीं इसका भी असर रहा। जनक्कनपुर थाने में पुलिस से भिड़ंत: वोटिंग से एक दिन पहले जन सुराज के कार्यकर्ता को डिटेन करने के सवाल पर प्रशांत किशोर पुलिस थाना पहुंच गए और वहां डट गए। थाना प्रभारी पर गुस्सा दिखाया। इससे मैसेज गया कि प्रशांत कार्यकर्ता के लिए खड़ा रहने वाले नेता हैं। वोटर में मैसेज गया कि प्रशांत शासन-प्रशासन से डरने वाले नेता नहीं हैं। 7- उपचुनाव से फायदा, एक ही सीट पर लगना था पूरा संसाधन बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर का दावा था कि नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को 25 से ज्यादा सीटें मिल जाएंगी तो वे राजनीति छोड़ देंगे। उस चुनाव में जेडीयू को 85 सीटों पर जीत मिली। प्रशांत किशोर की पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। प्रशांत ने राजनीति नहीं छोड़ी और तय किया कि वे बांकीपुर उपचुनाव लड़ेंगे। इसमें उनके सामने सहुलियत यह थी कि पूरे बिहार पर फोकस करने की जरूरत नहीं थी। एक सीट पर अपना पूरा संसाधन लगा दिया। नितिन नवीन के राज्य सभा जाने के बाद सीट खाली हुई थी, बीजेपी ने मंडल स्तर के कार्यकर्ता नीरज सिन्हा को उतारा। बीजेपी ने पूरी ताकत लगाई। केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक के मंत्री चुनाव प्रचार में आए, लेकिन प्रशांत एग्रेसिव होकर लड़े और बीजेपी के 30 साल के किले को ढ़ाह दिया। प्रशांत सरकार की ही मुश्किल नहीं बढ़ाएंगे, बल्कि नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के सामने भी चुनौती हैं। कांग्रेस की जो लाचारी कई बार आरजेडी के साथ रहने की दिखती रही है उसे भी राहत मिलने की गुंजाइश है। यानी प्रशांत की जीत के साथ बिहार की राजनीति कई तरह से बदलेगी। बीजेपी का माइक्रो मैनेजमेंट ध्वस्त हो गया वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह कहते हैं, ‘ग्राउंड में पीके का असर था। बीजेपी का माइक्रो मैनेजमेंट ध्वस्त हो गया। पीके के विरोध में कुछ नहीं था, सब कुछ उनके पक्ष में ही था। कास्ट और रिलीजन से ऊपर उठ कर लोगों ने जन सुराज को वोट किया।’ वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार ने कहा, ‘प्रशांत किशोर की जीत का सबसे बड़ा कारण बीजेपी और तेजस्वी यादव का अहंकार है। यादव और मुसलमान प्रशांत की तरफ चले गए। आरा कांड का असर पड़ा। कॉकरोच पार्टी के आंदोलन का असर भी पड़ा।’ वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश अश्क ने कहा, ‘ओपिनियन पोल के अनुसार बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे आए हैं। मीडिया रिपोर्ट में ये बात सामने आ रही थी कि प्रशांत किशोर बीजेपी के उम्मीदवार पर भारी पड़ेंगे।’
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बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत के 7 फैक्टर:30 दिन, हर दिन 5 चाय पर चर्चा, स्टूडेंट्स पर लाठीचार्च, जानिए जीत की पूरी कहानी
