बेगूसराय- IITian, IPS देने वाले गांव पर विस्थापन का खतरा:महेंद्रपुर के लोग बोले- छठी बार कटाव हुआ तो कहां जाएंगे, गांव से 100 मीटर पर पहुंची गंगा




चार बार विस्थापित होने के बाद भी जिस गांव ने चार-चार IITian और दो IPS दिए, उस गांव के लोग पांचवीं बार फिर विस्थापन के दर्द से सहमे हुए हैं। पहले चार बार गांव के लोगों का विस्थापन गंगा नदी के कटाव से हुआ था और पांचवीं बार भी विस्थापन का डर गंगा नदी के जारी कटाव से ही है। हालांकि, गंगा नदी का जलस्तर अभी खतरा के निशान से 1.21 मीटर नीचे है। बात बेगूसराय जिले के मटिहानी प्रखंड क्षेत्र स्थित महेंद्रपुर गांव की हो रही है। महेंद्रपुर गांव कभी दूध, घी और उन्नत फसलों के लिए जाना जाता था। आज गांव की करीब 7000 की आबादी दिन-रात डर के साए में जी रही है। गांव का उपजाऊ खेत रोज 10 मीटर से अधिक गंगा में समा रहा है और आबादी से मात्र 100 मीटर की दूरी पर गंगा की तेज धारा लोगों को सोने नहीं दे रही है। महेंद्रपुर के विस्थापन का डर जानने के लिए दैनिक भास्कर जब ग्राउंड पर पहुंची तो गांव के लोगों में डर का माहौल था। रिपोर्टर के सामने ही मिट्टी का बड़ा टीला गंगा नदी में समा गया। पढ़िए, पूरी रिपोर्ट। ‘100 साल पहले गांव में पहली बार कटाव हुआ था’ गांव के प्रेमचंद सिंह कहते हैं कि करीब 100 साल पहले हमारे गांव में कटाव हुआ था। उस समय चक्की बाजार के एक तरफ शाम्हो, दूसरे तरफ सोनवर्षा और तीसरी तरफ महेंद्रपुर बसा हुआ था। चक्की बाजार में ही प्राइमरी से लेकर मिडिल स्कूल तक हुआ करता था। कटाव में पूरा महेंद्रपुर गांव समाप्त हो गया। उन्होंने बताया कि दूसरी बार साल 1962 में कटाव शुरू हो गया, 1962 से 1965 तक लगातार कटाव होता रहा। इस गांव के हजारों हजार की आबादी विस्थापित हुई। 1965 के बाद 1972 से 1975 तक लगातार कटाव हुआ, उसमें भी गांव की आबादी पूरी तरह से विस्थापित हो गई। उसके बाद लगातार कटाव जारी रहा और 1981 में भीषण कटाव हुआ। उसके बाद महेंद्रपुर में कटाव निरोधक कार्य हुआ, इसके बाद दूर जाकर आबादी बसी। कम्युनिस्ट पार्टी के प्रयास से कटाव निरोधक कार्य हुआ और कटाई रुक गया। ‘1990 में तीन बंदबार बना, जिससे हमारा गांव कटने से बच गया’ प्रेमचंद सिंह ने कहा कि 1990 में फिर से कटाव हुआ और गंगा पश्चिम दिशा से ही गांव को विस्थापित करने के लिए उग्र हो गई। इसके बाद 1990 में तीन बंदबार बना, जिससे हमारा गांव कटने से बच गया। लेकिन आधे से अधिक लोग डरकर दूसरे जगह चले गए। कटाव से प्रभावित विस्थापित दरियापुर पंचायत में जाकर बस गए, उस पंचायत की दो तिहाई आबादी महेंद्रपुर के विस्थापित की है। उन्होंने कहा कि आजाद नगर कासिमपुर में भी एक हजार से महेंद्रपुर के ही विस्थापित हैं। सोनापुर पंचायत के विभिन्न जगहों पर 200 परिवार बसे हुए हैं। साफापुर अंबेडकर नगर में भी महेंद्रपुर के ही विस्थापित हैं। 10000 की आबादी कटाव प्रभावित होकर विस्थापित हो चुकी है। अभी 6-7 हजार जनसंख्या वाला हमारा गांव यहां बचा हुआ है। वह भी एक बार फिर से विस्थापित होने के कगार पर है। जमीन कटकर समाप्त हो गया, राजस्व भूमि कासिमपुर कट गया, बलहपुर में कटाव हो रहा है। कटते-कटते अब अंतिम में 100 मीटर पर हमारे गांव की आबादी बसी हुई है और सभी लोग डरे हुए हैं कि पता नहीं कैसे कटाव उसे बचेंगे। अभी जहां कटाव हो रहा है, वहां से करीब ढाई किलोमीटर दूर गंगा चली गई थी। प्रेमचंद ने कहा कि साल 2021 के बाद फिर कटाव होना शुरू हुआ और गंगा धीरे-धीरे हमारे गांव के समीप आ गई। गंगा के दक्षिण का चैनल समाप्त हो गया। अब मुख्य चैनल हमारे गांव के बगल से गुजर रही है। गाद के कारण गंगा नदी की गहराई समाप्त हो चुकी है। गंगा छिछली नदी की तरह हो गई है। जिसके कारण हर साल बाढ़ आता है और कटाव तेज होता जा रहा है। 1962 में महेंद्रपुर गांव की आबादी कटकर विस्थापित हो गई राहुल कुमार सिंह ने बताया कि साल 1962 में सबसे बड़ा कटाव हुआ, जब पूरे महेंद्रपुर गांव की आबादी कटकर विस्थापित हो गई। जिसके बाद लोग दूर में जाकर बसे थे, लेकिन 1975 में वह भी कटकर समाप्त हो गया। जबकि 1 किलोमीटर दूर जाकर आबादी बसी थी, लेकिन 1 किलोमीटर तक कटाव हो गया और अरमान के साथ बनाया गया सबका आशियाना पूरी तरह से समाप्त हो गया। 1975 से काटा जारी रहा तो 1981 तक एक बार फिर पूरा गांव कटकर गंगा में समा गया। अब महेंद्रपुर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। महेंद्रपुर गांव का अस्तित्व अब समाप्ति के कगार पर है। भारत में प्रजातांत्रिक व्यवस्था है, लेकिन सत्ताधारी दल के कोई भी लोग यहां नहीं आए। राजद विधायक आए, कम्युनिस्ट पार्टी के जिला मंत्री आए। ‘बरसात में दो से ढाई महीने आने-जाने का एकमात्र सहारा नाव होता है’ रामानंद ने बताया कि गांव के लोगों की बाइक समेत सभी गाड़ियां गुप्ता-लखमीनिया बांध पर सोनापुर में खड़ी रहती है। गांव का कनेक्शन जिला मुख्यालय से पूरी तरह से कट जाता है। नाव ही एक मात्र साधन रहता है, उस समय कोई बीमार पड़ जाते हैं तो पूरे गांव के लोग परेशान हो जाते हैं कि आखिर जल्दी से अस्पताल कैसे पहुंचाया जाए। सरकारी नाव की संख्या कम रहती है, उससे बचाव नहीं हो पता है, हम लोग निजी स्तर पर नाव रखते हैं। उन्होंने कहा कि सत्ताधारी दल के नेता कुंभकर्णी नींद में सोए हुए हैं, केवल वोट की राजनीति होती है। गांव को मजबूत करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते हैं। कब सत्ताधारियों के नींद टूटेगा पता नहीं, कब सांसद और सदन में बैठे लोग हम लोगों को बचाने आएंगे। भगवान जाने हम लोग को वह बचाएंगे कि नहीं बचाएंगे, मेरा घर और गांव बचेगा कि नहीं बचेगा। दहशत के माहौल में हम लोग किसी तरह से जी रहे हैं। ‘हमारे गांव के दो IITian अमेरिका की धरती पर रिसर्च कर रहे’ उन्होंने बताया कि बाढ़ के दौरान सरकार की ओर से भोजन का कैंप चलाया जाता है। गांव में जो नाव उपलब्ध है, उसे सरकारी घोषित करके चलाया जाता है। लेकिन समय पर मजदूरी नहीं मिलता है। हमारा गांव भले ही चार-चार बार विस्थापित हो चुका है। लेकिन प्रतिभा की कमी नहीं है, कई बच्चे उच्च पद गए हैं। प्रेमचंद ने कहा कि हम भले ही दियारा के रहने वाले हैं, लेकिन हमारे गांव के दो IITian अमेरिका की धरती पर रिसर्च कर रहे हैं। मेरे गांव में शिवबालक प्रसाद सिंह त्यागी एसपी बने थे, उनके पुत्र और पुत्रवधू भी अमेरिका में जॉब कर रहे हैं, वह दोनों आईआईटियन हैं और अमेरिका में जॉब कर रहे हैं। इस बार के यूपीएससी एग्जाम में हमारे गांव की बेटी रुचि कुमारी ने क्वालीफाई किया। रुचि कुमारी एसपी बनी है, हमने अपने बेटी को सम्मानित भी किया। ‘अब तो हमारे गांव का रकवा ही नहीं बचा है कि कटाव से विस्थापित होने पर जाकर बसेंगे’ अजय प्रताप सिंह कहते हैं कि चार बार हमारा गांव गंगा से कट कर विस्थापित हो चुका है। अब फिर पांचवीं बार भी कटने के लिए की स्थिति में है। जब गांव पूरी तरह कट जाता है तो आधा किलोमीटर से 1 किलोमीटर पीछे हटकर फिर से बसाया जाता है। कुछ लोग दूसरे दूसरे जगह जाकर आशियाना बना लेते हैं। अब तो हमारे गांव का रकवा ही नहीं बचा है कि कटाव से विस्थापित होने पर जाकर बसेंगे। उन्होंने कहा कि अभी गांव से 100 मीटर की दूरी पर गंगा है। 3 साल में गंगा डेढ़ किलोमीटर काटकर अंदर आ गई है। अब कटाव होगा तो गुप्ता- लखमीनिया बांध पर, NH किनारे और रेलवे लाइन किनारे जाएंगे। वहां अगर जेसीबी और पोकलेन लेकर सरकार पहुंच जाएगी, कहेगी आप लोग अतिक्रमण में हैं, तो सरकार को जवाब देना होगा कि अतिक्रमण तो गंगा नदी ने किया है। अजय ने कहा कि पहले उसके अतिक्रमण को समाप्त करने की व्यवस्था किया जाए। हम स्वाभिमानी लोग हैं, हम अपनी रोजी-रोटी अपने मेहनत से कमा कर खाते हैं। हम गांव में रहेंगे, लेकिन हमें गंगा के कटाव से बचाओ, गांव को विस्थापन से बचाओ। शासन-प्रशासन को सोचना होगा की गंगा नदी ने जो हमारी जमीन का अतिक्रमण किया है, उसे बचाओ। एग्जिक्यूटिव इंजीनियर बोले- सीनियर अधिकारियों को मामले की जानकारी दी है बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल बेगूसराय के कार्यपालक अभियंता राजीव कुमार ने बताया कि महेंद्रपुर गांव के समीप कटाव की सूचना मिलते ही अधिकारियों की टीम के साथ मौके पर जाकर स्थिति देखी है। इसके बाद वरीय अधिकारी को मामले से अवगत कराया गया। कटाव स्थल से आवासीय मकानों की दूरी करीब 100 मीटर है। कटाव को तत्काल रोकने के लिए वरीय अधिकारी के निर्देश पर बांस रोल (Bamboo Roll) एवं झाड़ी से न्यूनतम बाढ़ रक्षात्मक कार्य किया जा रहा है।



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