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संस्कृत के पदों के अनुवाद में संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण:भारतीय दर्शन के अरुपांतरणीय संस्कृत पद विषयक दो दिवसीय कार्यशाला संपन्न




भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् और भारतीय भाषा समिति के संयुक्त तत्वावधान में इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में आयोजित दो-दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला संपन्न हो गई। भारतीय दर्शन के अरुपांतरणीय संस्कृत पद विषय पर आयोजित इस कार्यशाला में देशभर के विद्वानों ने संस्कृत के दार्शनिक ग्रंथों के अनुवाद की चुनौतियों और ऐसे शब्दों पर विचार-विमर्श किया, जिनका दूसरी भाषाओं में सटीक अनुवाद अत्यंत कठिन है। संस्कृत ग्रंथ भारतीय चिंतन की महान थाती: डॉ. चामू कृष्ण शास्त्री उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि और भारतीय भाषा समिति के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. चामू कृष्ण शास्त्री ने कहा कि संस्कृत ग्रंथ भारतीय चिंतन एवं दर्शन की वह महान थाती हैं, जिसे हमारे ऋषियों ने सृजित किया है। भारतीय सांस्कृतिक विरासत को भावी पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए इनका सही अनुवाद आवश्यक है, लेकिन मूल पाठ का रूपांतरण करते समय अत्यंत सावधान रहने की जरूरत है। अनुवाद में संदर्भ और मूल अर्थ सबसे महत्वपूर्ण: प्रो. के जी सुरेश समापन सत्र के मुख्य अतिथि और इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक प्रो. के जी सुरेश ने कहा कि भाषा विचारों को आकार देती है और शब्दों के मूल अर्थ को समझे बिना भाषाई स्पष्टता संभव नहीं है। बेवजह अनुवाद को गलत बताते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई शब्द जैसे योग, धर्म, कर्म, या ईश्वर पहले से प्रचलित है, तो उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। अंग्रेजी अनुवाद में इन शब्दों की दार्शनिक गहराई खो जाती है। मूल शब्दों के प्रयोग से ही हम युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ सकते हैं।

मानक नियमावली और व्याख्यात्मक अनुवाद की जरूरत कार्यशाला के दौरान विभिन्न सत्रों में विद्वानों ने अनुवाद की प्रक्रिया को सुलभ और विवाद-रहित बनाने के लिए कई सुझाव दिए। ICPR के सदस्य-सचिव प्रो. सच्चिदानंद मिश्र ने कहा कि संस्कृत अनुवाद के लिए एक मानक नियमावली बने। उन्होंने शब्दशः अनुवाद के बजाय व्याख्या रूपी अनुवाद को अधिक सार्थक बताया। वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. गिरीश नाथ झा ने कहा कि वैदिक संस्कृत का अनुवाद कठिन है, लेकिन AI और आधुनिक तकनीक ने इसे काफी सुलभ बना दिया है। डॉ. सुदीप्त मुंशी ने अनुवाद को प्रामाणिक बनाने के लिए व्याख्याओं और पाद-टिप्पणियों के प्रयोग पर बल दिया। प्रो. महानंद झा और प्रो. कृष्ण मोहन पांडेय ने स्पष्ट किया कि संस्कृत के पारिभाषिक पद विशिष्ट आध्यात्मिक संदर्भों से जुड़े होते हैं, इसलिए संदर्भ के अनुसार ही अर्थ-निर्धारण होना चाहिए। प्रो. भरत नागराजाराव और प्रो. श्रीहरि पी. कुरुडी ने बताया कि प्राचीन काल में न्यूनतम अर्थ-विकृति के साथ संस्कृत ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद किन सिद्धांतों पर किया गया था। सांस्कृतिक जुड़ाव और राष्ट्रीय गौरव प्रो. सम्पदानंदा मिश्र ने शब्द-व्युत्पत्ति को अनुवाद का आधार बनाने की बात कही, वहीं प्रो. सुदर्शन ने कहा कि भारतीय संस्कृति में पूरे एशिया का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता है। विदेशी मानसिकता के प्रभाव को दूर कर हमें अपने धार्मिक ग्रंथों को अन्य भाषाओं में उपलब्ध कराना चाहिए।
कार्यक्रम की दो-दिवसीय रिपोर्ट डॉ. गिरिधर राव ने प्रस्तुत की। अतिथियों का स्वागत ICPR के निदेशक (PR) ने किया, संचालन मृण्मय चक्रवर्ती ने और धन्यवाद ज्ञापन देवेंद्र कुमार जाटव द्वारा किया गया।



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