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Neerja Chowdhury Column | Cockroach Movement Impact on Politics & BJP


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3 घंटे पहले

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नीरजा चौधरी वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार - Dainik Bhaskar

नीरजा चौधरी वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार

कॉकरोच आंदोलन का आगामी चुनावों या भारतीय राजनीति पर क्या असर पड़ेगा, इसका आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन जेन-जी ने सरकार को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। साथ ही, इस आंदोलन ने विपक्ष में भी नई ऊर्जा का संचार किया है।

सरकार ने भी संसद के मानसून सत्र में परिसीमन विधेयक लाने की अपनी योजना पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है। जबकि माना जा रहा था कि एनडीए संसद में इसे पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंच चुका है। डीएमके और एनसीपी (एसपी) भी विधेयक का समर्थन करने के विकल्प खुले रखे हुए प्रतीत हो रहे थे। लेकिन अब उनका रुख पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित दिखाई दे रहा है।

बंगाल में बड़ी सफलता और कई क्षेत्रीय दलों में टूट के चलते जो परिदृश्य भाजपा के पक्ष में जाता दिखाई दे रहा था, उसमें अब कॉकरोच आंदोलन के बाद नया मोड़ आता दिख रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 20 जुलाई को मध्य दिल्ली में तैनात रैपिड एक्शन फोर्स की निदेशक ने अपनी आंतरिक रिपोर्ट में स्वीकारा है कि जिस दिन सीजेपी समर्थकों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की थी और उन पर लाठीचार्ज तथा हिंसा हुई थी, उस दिन अत्यधिक बलप्रयोग किया गया और पुलिस की कार्रवाई में गम्भीर कमियां थीं। शीर्ष अदालत ने भी टिप्पणी की कि किसी प्रदर्शन से निपटने के लिए लाठीचार्ज उचित नहीं ठहराया जा सकता।

छात्रों के खिलाफ पुलिस की बर्बरता ने इस मुद्दे को देश के लगभग हर मध्यम-वर्गीय परिवार तक पहुंचा दिया। शहरी मध्यम-वर्ग लंबे समय से भाजपा के प्रमुख समर्थन आधार के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन परीक्षा एवं शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग उनके परिवारों का भी भावनात्मक मुद्दा बन गई है।

अचानक मध्यम-वर्गीय माता-पिता अपनी जेन-जी संतानों पर गर्व महसूस करने लगे हैं। उन्हें लग रहा है कि उनके बच्चों ने अपेक्षा से अधिक साहस, संवेदनशीलता और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए भी शिक्षा गरीबी से निकलने का सबसे बड़ा माध्यम मानी जाती है।

2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों पर सिमटने के बाद मुश्किल में दिखी थी, लेकिन तब इसकी वजह यूपी में पार्टी के भीतर का टकराव और संघ का चुनावों में सक्रिय प्रचार नहीं करना माना गया था। लेकिन इस बार पार्टी धारणा की लड़ाई लड़ रही है। अब बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि भाजपा, सीजेपी नेतृत्व से किए वादों को कितनी ईमानदारी से पूरा करती है।

उतना ही महत्वपूर्ण यह भी होगा कि क्या वह देश की शिक्षा-व्यवस्था में प्रभावी सुधार लागू करती है। भाजपा परिस्थितियों के अनुसार जल्दी रणनीति बदलने वाली पार्टी है। प्रधानमंत्री ने नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में विशेष टास्क फोर्स के गठन की घोषणा की है। साथ ही, नीट में धांधली करने वालों के खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान करने वाला कानून इसी सप्ताह लाने की योजना भी बनाई जा रही है।

30 से कम आयु की लगभग आधी आबादी वाले भारत में जेन-जी को साधने के लिए अब पार्टी हरसंभव प्रयास करती दिखाई दे रही है। उसने सीजेपी की लगभग सभी मांगें स्वीकार कर लीं। हालांकि यह लेख लिखे जाने तक पटना और कुछ अन्य स्थानों पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस नहीं ली गई थीं।

ये और बात है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के एक वर्ग को रास नहीं आया है। इससे पार्टी के मध्यम-वर्गीय समर्थन आधार में भी असंतोष पैदा हुआ है, जो भाजपा के लिए चिंता का विषय हो सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ कांग्रेस को मिलने की संभावना दिखाई दे रही है। उसने अपने पत्ते भी सही खेले। राहुल गांधी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों और अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक से मिलने नहीं गए।

इससे आंदोलन की विश्वसनीयता बनी रही और उसे किसी राजनीतिक दल का मुखौटा नहीं माना गया। लेकिन जब छात्रों पर लाठीचार्ज हुआ, तब राहुल, प्रियंका और अन्य कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना दिया। कांग्रेस ने प्रधान के इस्तीफे का श्रेय लेने की कोशिश भी नहीं की।

इसके बजाय उसने इस उपलब्धि का श्रेय छात्रों को देते हुए उनकी सराहना की। ऐसा लगा कि सीजेपी का आंदोलन खत्म होने के बाद कांग्रेस ने उसकी मशाल थाम ली है। सीजेपी की ही तरह एक ‘ई-20 जनता पार्टी’ का गठन बदलते परिदृश्य का संकेत देता है।

छात्रों के खिलाफ पुलिस की बर्बरता ने सीजेपी के आंदोलन को देश के लगभग हर मध्यम-वर्गीय परिवार तक पहुंचा दिया। जबकि शहरी मध्यम-वर्ग लंबे समय से भाजपा के प्रमुख समर्थन आधार के रूप में देखा जाता रहा है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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