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डांगाजी का 15 अगस्त यानी 'गणतंत्र दिवस':किरोड़ी बाबा की 'गहलोतजी' वाली टीस; जड़ से खोद कर निकाला 'आंदोलन'




नमस्कार, नेता हो तो खींवसर विधायक रेवंतराम डांगा जी जैसा, जो गणतंत्र को भी स्वतंत्र ही समझे, कोई फर्क नहीं। किरोड़ी बाबा का हाल वैसा ही है जैसा अशोक गहलोत जी का। दोनों नारेबाजी में यकीन नहीं करते और पुलिस ने छात्रनेता का आंदोलन जमीन से खोदकर निकाल लिया। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. डांगाजी बोले- 15 अगस्त जो ‘गणतंत्र दिवस’ है डांगा जी खासे चर्चा में रहते हैं। वे नागौर के खींवसर से विधायक हैं। हनुमान बेनीवाल के मुताबिक पहले वे उनके आगे-पीछे घूमते थे। फिर डांगा जी ने पार्टी बदल ली। पार्टी बदलते ही किस्मत ने भी करवट बदली और वे खींवसर से विधायक बन गए। इसके बाद उनका स्टिंग हो गया। जिससे उनकी पहचान ‘कमीशन’ से होने लगी। यह कमीशन भी साइमन कमीशन से कम नहीं। बहुत चर्चा में रहा। नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल तो अब तक पब्लिक से कहते हैं- डांगाजी की रील देखी क्या? डांगा जी रील बहुत अच्छी बनाते हैं और डांस करने में माहिर हैं। एक अच्छे नेता को नाचना और नचाना, दोनों आना चाहिए। उनकी ताजा रील नागौर में तिरंगा रैली की है। वे हाथ में तिरंगा उठाए लंबे-लंबे डग भरते हुए शासन-प्रशासन के अधिकारियों, नेताओं, पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और आमजन के साथ रैली निकाल रहे हैं। रील के बैकग्राउंड में गाना है- सौगंध मुझे इस मिट्‌टी की। मैं देश नहीं मिटने दूंगा। ये देश नहीं झुकने दूंगा। रैली के बीच ही एक पत्रकार ने डांगा जी को पकड़ लिया। कहा- तिरंगा रैली को लेकर कुछ कहिए। डांगा जी ने निबंध जैसा सुनाया। बोले- ‘तिरंगा हमारी पहचान है। हमारा पर्व है। हमें खुशी है। ये खुशी राजस्थान नहीं, पूरे हिंदुस्तान में है। क्योंकि हमारा गणतंत्र दिवस है। जो 15 अगस्त है।’ वैसे बड़े नेता की निशानी यह है कि वे भेदभाव नहीं करते। डांगा जी बड़े नेता हैं, वे तो गणतंत्र और स्वतंत्र तक में भेदभाव नहीं करते। 2. किरोड़ी बाबा की ‘टीस’ किरोड़ी बाबा काफी दिनों से आदिवासी दिवस की तैयारियां कर रहे थे। बड़े-बड़े कलाकारों को फोन लगाकर इन्वाइट किया था। हालांकि बड़े सिंगर समय नहीं निकाल सके, लेकिन जो आए उन्होंने भी जबरदस्त परफॉर्मेंस दी। आदिवासी दिवस पर किरोड़ी बाबा ट्रक पर सवार होकर हजारों की भीड़ के बीच हाथ हिलाते हुए मीणा हाईकोर्ट की तरफ बढ़े। किसी ने फूलों की बरसात की। कोई माला पहनाना चाहता है। कोई झलक देखना चाहता है। युवाओं में उन्माद। इसी जोश में युवाओं ने नारा लगा दिया- ‘हमारा सीएम कैसा हो?’ यह ऐसा नारा है जो कुछ दिन पहले पूर्व मुखिया जी के लिए भी लगाया गया था। पूर्व मुखिया जी ने जिस प्रकार समर्थकों को रोका था, उसी भांति किरोड़ी बाबा ने भी समर्थकों को रोका। ‘हमारा सीएम कैसा हो?’ अगर इस नारे को डिकोड करें तो यह ऐसा नारा है जो बड़े नेता चाहते हैं कि लगे। लेकिन समर्थकों से यह कहना उनकी मजबूरी है कि इस तरह के नारे मत लगाओ। मना करने में भी उदारता झलकती है। वे चाहते हैं कि आलाकमान यह देखे कि जनता क्या चाहती है। जनता के चाहने के बावजूद हमारा नेता कितना महान है कि जनता को रोक रहा है। किरोड़ी बाबा का अंदाज ऐसा कि जूता मारकर पुचकार लेते हैं। बोले- लोग कहते हैं कि बाबा तू तो ठीक है, लेकिन तेरी पार्टी गड़बड़ है। फिर उदारता दिखाते हुए बोले- पार्टी ही सब कुछ है। पार्टी ने विचारधारा दी है। मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री बनना तो किस्मत की बात है। फिर उन्होंने वैसी ही बात कह दी जो सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज से कही थी। बोले- तुम मुझे पसीना दोगे तो मैं तुम्हें खून दूंगा। आखिर में बाबा ने ‘हमारा सीएम कैसा हो’ नारे पर ‘समर्थकों के प्यार’ की मोहर लगाकर मार्केट में उतार दिया। 3. चलते-चलते… कॉकरोचों की सफलता के बाद ‘प्रदर्शन’ फैशन बन गया है। अलग-अलग राज्यों में छात्र शक्ति प्रदर्शन कर रही है। राजधानी में एक छात्रनेता दो सप्ताह तक अनशन पर रहा। राजस्थान यूनिवर्सिटी में मराठी पढ़ाई जाए या न पढ़ाई जाए। राजस्थानी भाषा का अलग डिपार्टमेंट खुले या न खुले। छात्रसंघ चुनाव हों या न हों। छात्रनेता ने प्रदर्शन करके बहुत कुछ कमा लिया। छात्रनेता अगर लक्ष्मण होता है तो प्रदर्शन उसकी संजीवनी होती है। संजीवनी के लिए तपना पड़ता है। युवा तपने को तैयार हैं। कॉकरोचों का जिक्र इसलिए क्योंकि महीने भर से ज्यादा दिन तक आंदोलन करके उन्होंने अपनी सफलता का ऐलान 1992 में आई फिल्म अधर्म के गीत की पंक्तियों से किया था- आसमां को धरती पे लाने वाला चाहिए। झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए। तुन्ना तुन्ना। तुन्ना-तुन्ना का झुनझुना पकड़कर सरकारी स्कूल के छात्र, ग्रेड थर्ड टीचर, नर्स, सफाईकर्मी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, छात्रनेता और न जाने कौन-कौन प्रदर्शन की राह पर चलने लगे। जयपुर में कुछ छात्रनेता टंकी पर चढ़ गए थे। उन्हें लगा कि सारी लाइमलाइट अनशन वाला छात्रनेता ले गया, कुछ हम पर भी गिरे। इसी तरह एक छात्रनेता ने यूनिवर्सिटी के लॉन में जमीन समाधि ले ली। वह उन साथियों के झांसे में आ गया जो कह रहे थे- फलाने तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। साथियों के आश्वासन में नियम और शर्तें बारीक अक्षरों में लिखी थी। साथियों ने समाधि ले चुके छात्र नेता को यह नहीं बताया कि पुलिस आने के बाद हमारी कोई गारंटी नहीं है। जैसा कि उम्मीद थी, पुलिस आई और लाठी फटकारी। मात्र 6 सेकेंड में आंदोलन तितर-बितर हो गया। छात्र नेता जमीन में गड़ा रह गया, साथी भाग निकले। पुलिस ने आंदोलन के पौधे को जड़ समेत उखाड़ा और घसीटकर ले गई। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।



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