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त्रिशूल गदा तलवार, धीरज गुर्जर 'तैयार':डांगाजी को 'खींच' ले गए अधिकारी; राजेंद्र राठौड़ की 'टीस'




नमस्कार, गदा..त्रिशूल..तलवार..भीलवाड़ा में कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव धीरज गुर्जर ने हर हथियार आजमा कर देखा। नागौर में प्रशासन की टीम के लोग डांगा जी को ‘खींचकर’ ले गए। चूरू में अपनों के बीच राठौड़ साहब की टीस उभर आई और शाहपुरा में तिरंगे पाइप से सांप निकल आया। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. गदा..त्रिशूल..तलवार.. उनका नाम धीरज गुर्जर है। वे कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव हैं। भीलवाड़ा के जहाजपुर से विधायक रहे हैं। कांग्रेस के बाकी साथी मानें या न मानें, लेकिन धीरज गुर्जर समझ चुके हैं कि जहाजपुर में सत्ता का रास्ता सनातन से होकर ही जाता है। ऐसे में उन्होंने स्थानीय धाम पर अपने जन्मदिन को जन्मोत्सव के रूप में मनाया। भिन्न-भिन्न प्रकार के धार्मिक आयोजन किए। आयोजन में तमाम तरह के देवी-देवताओं की सजीव झांकी नजर आई। उन्होंने श्रीराम और सीता माता का आशीर्वाद लिया। हनुमानजी ने उन्हें गदा थमाई तो वे गदा घुमाने को मचल उठे। गदा जोरदार ढंग से घूमी। इस चक्कर में नेताजी एक हल्का सा प्रहार खुद पर भी कर बैठे। इसके बाद उन्हें तलवार थमाई गई। उन्होंने एक हाथ से तलवारबाजी का हुनर दिखाया। फिर संभावित डबल चुनौती के मद्देनजर दोनों हाथों में तलवारें लेकर घुमाने लगे। उन्होंने भगवान शिव का भी आशीर्वाद लिया और कुछ देर के लिए उनका त्रिशूल भी हाथ में उठाकर आशीर्वाद की तरह जनता को दिखाते हुए फिराया। वे इन दिनों एक मुहिम भी चलाए हुए हैं। गोमाता को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं। लोगों से कह रहे हैं कि मेरे लिए माला-शॉल-साफा मत लेकर आओ। कहीं गाय दिखे तो चारा डाल दो। धीरज गुर्जर आशान्वित हैं। ओबीसी का शोर है ही। हिंदू वोट बैंक साध लिया तो विजयश्री तय। लेकिन जहाजपुर विधायक गोपीचंद भी चंदन थोड़े घिस रहे हैं। तीर-कमान लेकर मुस्तैद हैं। 2. प्रशासन की टीम ‘भारी पड़ गई’ यूं तो नेतागण और प्रशासन के बीच रस्साकशी चलती ही रहती है। लेकिन नागौर में सचमुच ही ऐसा आयोजन हो गया। एक तरफ खींवसर विधायक रेवंतराम डांगा और उनकी टीम थी, तो दूसरी तरफ प्रशासन की टीम। नेताजी आत्मविश्वास से भरपूर थे। उन्होंने चौड़े होकर बांहें चढ़ाई। धोती की लांग को कसा। उधर अधिकारियों ने भी वे सभी बातें याद कीं, जब किसी न किसी नेता ने उन्हें सार्वजनिक तौर पर फटकार लगाई थी। खेल अगर पाला बदलने का होता तो फिर भी डांगा जी कुछ करतब करके दिखा सकते थे। लेकिन यहां बात पाला बचाने और प्रशासन के अधिकारियों को अपने पाले में लाने की थी। लेकिन वही हुआ जिसकी शिकायत आजकल नेतागण करते हैं। जैसे कि- अधिकारी भारी पड़ रहे हैं। रस्साकशी के खेल में भी अधिकारी भारी पड़ गए। इधर सीटी बजी और उधर अधिकारी गण ने एक राय होकर सामूहिक जोर लगाया। डांगा जी धोती समेत घिसटते हुए अधिकारियों के पाले में पहुंच गए। शोर और तालियों की गड़गड़ाहट चारों दिशाओं में फैल गई। 3. राजेंद्र राठौड़ की ‘टीस’ नेता की परीक्षा चुनाव होते हैं। राजेंद्र राठौड़ ऐसे नेता रहे जिन्होंने कई बार यह परीक्षा दी और अच्छे नंबरों से पास हुए। लेकिन पिछले चुनाव में कुछ ऐसा हुआ कि पार्टी जीत गई और तारानगर सीट से राठौड़ साहब हार गए। वह हार उनके लिए टीस बन गई। यह टीस कभी-कभी उभर आती है। अब चूंकि सरकार का आधे से अधिक कार्यकाल निकल चुका है। निकाय-पंचायत चुनाव सामने खड़े हैं। देखते-देखते अगले विधानसभा चुनाव आ जाएंगे। ऐसे में राठौड़ जी ने जनता को पुराना चुनाव याद दिलाते हुए कहा- पिछला चुनाव भूल गए? मेरा क्या कसूर था? मुझे सामंतवादी कहा गया। मैं अगर जातिवादी होता तो हरलाल सहारण विधायक नहीं होते, कमला कसवां जिला प्रमुख नहीं होतीं और बलराम जी के सामने रामसिंहजी चुनाव जीत नहीं पाते। गांव के ग्वाड़ में खड़े होकर सामंत कहकर मुझे सामूहिक गाली झेलनी पड़ी। मैं गांव आया तो आप चौपाल में नहीं आए। इसके बाद राठौड़ जी ने लोगों को आगे के लिए सतर्क करते हुए कहा- न तुम एका (एकता) रखते हो और न चेता (चेतना) रखते हो। एक दूसरे की कमी निकालना छोड़ दो। भगवान के अलावा सब में कमी होती है। कोई सामूहिक रूप से ललकारे तो विरोध न सही, उनके बीच जाकर ताली तो मत पीटो। आपको जलन होनी चाहिए। ये चेहरा 4 साल पहले ऐसा ही था क्या? राजेंद्र राठौड़ का यही रूप था क्या? समझदारी से आगे बढ़ो। 4. चलते-चलते… जयपुर ग्रामीण का कस्बा शाहपुरा। यहां के हनूतपुरा गांव में आजादी का जश्न मनाया जा रहा था। सरकारी स्कूल में तिरंगा फहराया गया। सारा प्रोग्राम हो गया। दोपहर हो गई। शाम ढलने लगी। बच्चे ग्राउंड में खेल रहे थे। अचानक एक बच्चे की नजर पाइप के टॉप पर गई। वहां कुछ हिल रहा था। देखा कि पाइप से निकलकर एक सांप फन फैलाकर इधर-उधर देख रहा था। बच्चों ने बड़ों को बताया। हड़कंप मच गया। लोग भागे आए। तिरंगे को सम्मान से उतारा गया। इसके बाद रेस्क्यू टीम को बुलाकर नागदेवता को सकुशल उतार कर जंगल में छोड़ दिया गया। इस घटना को जिस चश्मे से देखेंगे यह वैसी ही नजर आएगी। राजनीतिक चश्मे से देखेंगे तो लगेगा कि देश में भी कई छुपे हुए नाग हैं। इनको भी पकड़कर सही जगह रेस्क्यू कर देना चाहिए। धार्मिक नजरिए से देखेंगे तो लगेगा कि जैसे भगवान भोलनाथ के गले में नागों के देवता वासुकी विराजमान होते हैं। ऐसे ही तिरंगे की शान बढ़ाने नाग देवता इतना ऊपर चढ़ गए। खरी बात ये कि ध्वजारोहण के वक्त नागदेवता चुपचाप पाइप में घुसे रहे। डोरी खींचने पर कूद पड़ते तो मुख्य अतिथियों की शामत आ जाती। इनपुट सहयोग- मनीष जैन (भीलवाड़ा), प्रकाश तंवर (नागौर), नरेश भाटी (चूरू), धर्म सिंह यादव (कोटपूतली)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।



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