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रुद्रप्रयाग- 12 दिन बाद फिर शुरू हुई मध्यमहेश्वर धाम यात्रा:पुल बहने के कारण रोकी गई थी; SDRF-DDRF की टीम 24 घंटे रहेगी तैनात




रुद्रप्रयाग के द्वितीय केदार मध्यमहेश्वर धाम की यात्रा 12 दिन बाद बुधवार, 19 अगस्त से फिर शुरू हो गई। 7 अगस्त को मोरखंडा नदी पर बना अस्थायी पुल बहने के बाद प्रशासन ने यात्रा रोक दी थी। इसके साथ ट्रॉली सेवा भी बंद कर दी गई थी। अब उपजिलाधिकारी ऊखीमठ की जांच रिपोर्ट के आधार पर जिला प्रशासन ने सुरक्षा शर्तों के साथ यात्रा दोबारा शुरू करने की अनुमति दी है। यात्रा बहाल होने के साथ प्रशासन ने ट्रॉली स्थल और पूरे यात्रा मार्ग पर सुरक्षा के इंतजाम किए हैं। एसडीएम ऊखीमठ ने बताया कि ट्रॉली स्थल पर श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने पर पर्याप्त पुलिस बल तैनात रहेगा। इसका उद्देश्य किसी भी आपात स्थिति में यात्रियों को तत्काल सहायता उपलब्ध कराना है। यात्रा मार्ग पर दुर्घटना या आपदा की स्थिति से निपटने के लिए SDRF और DDRF की टीमें भी तैनात की गई हैं। किसी भी आपात स्थिति में दोनों टीमें तत्काल राहत और बचाव कार्य शुरू करेंगी। अगस्त को क्यों रोकनी पड़ी थी यात्रा?
मोरखंडा नदी पर बना अस्थायी पुल बह जाने के बाद यात्रियों की आवाजाही प्रभावित हुई थी। लगातार बारिश के बीच नदी का बहाव बढ़ने से यह मार्ग सुरक्षा की दृष्टि से जोखिम भरा हो गया था। इसके बाद प्रशासन ने यात्रा और ट्रॉली सेवा को रोक दिया था। मध्यमहेश्वर क्यों खास है?
मध्यमहेश्वर को भगवान शिव के पंचकेदारों में द्वितीय केदार माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद पांडवों को गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान शिव ने बैल का रूप धारण किया था। भीम ने उन्हें पहचान लिया और उनकी पीठ पकड़ ली। मान्यता है कि शिव धरती में समा गए और उनके शरीर के अलग-अलग हिस्से विभिन्न स्थानों पर प्रकट हुए। शिव की नाभि मध्यमहेश्वर में प्रकट हुई, इसलिए यहां स्वयंभू नाभि लिंग की पूजा होती है। 3,497 मीटर की ऊंचाई पर मंदिर, 16-18 किमी का ट्रेक
मध्यमहेश्वर मंदिर रुद्रप्रयाग जिले के ऊखीमठ क्षेत्र में समुद्र तल से करीब 3,497 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। पत्थरों से बना यह मंदिर उत्तर भारतीय शैली का है और इसकी वास्तुकला केदारनाथ मंदिर से मिलती-जुलती है। गर्भगृह में काले पत्थर से निर्मित स्वयंभू नाभि लिंग विराजमान है। मंदिर तक पहुंचने के लिए रांसी क्षेत्र से करीब 16 से 18 किमी का ट्रेक करना पड़ता है। रास्ते में घने जंगल, झरने और हिमालयी दृश्य यात्रियों को आकर्षित करते हैं। आखिरी करीब 5 किमी की चढ़ाई अपेक्षाकृत कठिन मानी जाती है, लेकिन यहां से चौखंबा पर्वत श्रृंखला का दृश्य यात्रा को खास बनाता है। पिछले सीजन 22 हजार से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचे
मध्यमहेश्वर मंदिर के कपाट बंद होने के समय बीकेटीसी ने बताया था कि 2025 में विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद 22 हजार से अधिक श्रद्धालु बाबा के दर्शन कर चुके थे। शीतकाल में मंदिर के कपाट बंद होने के बाद भगवान मद्महेश्वर की चल विग्रह डोली ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में विराजमान होती है। ओंकारेश्वर में होती है शीतकालीन पूजा
ऊखीमठ का ओंकारेश्वर मंदिर मध्यमहेश्वर का शीतकालीन गद्दीस्थल है। यहां भगवान केदारनाथ और द्वितीय केदार मध्यमहेश्वर की शीतकालीन पूजा होती है। मान्यता के अनुसार तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पेश्वर के प्रतीकात्मक विग्रह भी यहां विराजमान रहते हैं। इसी वजह से ओंकारेश्वर में एक ही स्थान पर पंचकेदार के दर्शन की मान्यता है। यात्रा पर जाने वालों के लिए जरूरी बात
मध्यमहेश्वर का रास्ता पहाड़ी और कठिन है। बारिश के मौसम में नदी-नालों का जलस्तर और भूस्खलन जैसी स्थितियां यात्रा को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में प्रशासन की ओर से जारी सुरक्षा निर्देशों का पालन करना और मौसम व मार्ग की स्थिति की जानकारी लेकर ही यात्रा करना जरूरी है। ——————– ये खबर भी पढ़ें… नैनीताल-पति की मौत के बाद नौकरी लेने आईं दो पत्नियां:विवाद के कारण डेढ़ साल से अटकी नियुक्ति, मामला जिला न्यायालय पहुंचा रामनगर में वन निगम के कर्मचारी की मौत हुई तो उनकी जगह नौकरी के लिए उनकी दो पत्नियां आमने-सामने आ गईं। दोनों ने खुद को कर्मचारी की पत्नी बताते हुए मृतक आश्रित के तौर पर नौकरी पर अपना दावा पेश कर दिया। (पढ़ें पूरी खबर)



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