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यूसीसी के विरोध में राष्ट्रपति को अभ्यावेदन:मुस्लिम समाज ने उठाए संवैधानिक अधिकारों से जुड़े सवाल




प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर सिवनी के मुस्लिम समाज, जमीयत उलेमा मध्य प्रदेश और अन्य नागरिकों ने राष्ट्रपति को एक अभ्यावेदन भेजा है। इसमें यूसीसी के मसौदे पर पुनर्विचार की मांग की गई है। यह अभ्यावेदन कलेक्टर के माध्यम से राष्ट्रपति भवन भेजा गया है। गुरुवार को समाजजनों ने नायब तहसीलदार दीक्षा पटेल को ज्ञापन सौंपा। अभ्यावेदन में कहा गया है कि यूसीसी जैसे संवेदनशील विषय पर निर्णय लेते समय संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विविधता और मौलिक अधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए। इसमें संविधान के अनुच्छेद 44 का उल्लेख किया गया है, जिसमें समान नागरिक संहिता को राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों का हिस्सा बताया गया है। साथ ही, अनुच्छेद 37 के तहत ऐसे प्रावधान न्यायालय द्वारा सीधे प्रवर्तनीय नहीं होते। इसके अलावा, अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता तथा धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों और अनुच्छेद 29 के तहत सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण का भी हवाला दिया गया है। मुस्लिम समाज का तर्क है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और वसीयत जैसे व्यक्तिगत मामलों में मुस्लिम पर्सनल लॉ की धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं। अभ्यावेदन में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 का जिक्र करते हुए बताया गया है कि इन मामलों में शरीयत को लंबे समय से कानूनी मान्यता प्राप्त है। इसलिए, प्रस्तावित कानून के ऐसे प्रावधानों पर गंभीर संवैधानिक विचार आवश्यक है, जिनसे व्यक्तिगत विधि प्रभावित हो सकती है। अभ्यावेदन में यह सवाल भी उठाया गया है कि यदि अनुसूचित जनजातियों को उनकी परंपराओं और संवैधानिक संरक्षण के आधार पर यूसीसी के दायरे से बाहर रखा जा रहा है, तो मुस्लिम समाज की धार्मिक एवं व्यक्तिगत विधियों के संबंध में भी समान दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल ने जुलाई में यूसीसी के मसौदे को मंजूरी दी थी। प्रस्तावित कानून में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन संबंधों जैसे विषयों के लिए समान नियमों का प्रावधान है। हालांकि, अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखने का प्रस्ताव है। सरकार के अनुसार, मसौदा तैयार करने से पहले व्यापक स्तर पर सुझाव लिए गए थे, जिसमें लगभग 9.58 लाख प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई थीं। मुस्लिम समाज ने अपने अभ्यावेदन में सभी समुदायों, विधि विशेषज्ञों, महिला संगठनों और नागरिक समाज के साथ व्यापक संवाद कराने की मांग की है। साथ ही, मौलिक अधिकार प्रभावित होने की स्थिति में प्रावधानों में आवश्यक संशोधन करने की अपील भी की गई है।



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