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- Pawan K Verma Column | Indias Urban Planning Crisis & City Infrastructure
3 घंटे पहले
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पवन के. वर्मा पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक
अंतरराष्ट्रीय मानकों पर भारत अब भी मुख्यतः आंचलिक देश ही है। हमारे जो शहर हैं भी, वो अर्बन-प्लानिंग के स्तर पर धराशायी होने के कगार पर पहुंच चुके हैं। सड़कें बारिश में उखड़ जाती हैं, नालियां उफनती रहती हैं, जलभराव आम है, अनधिकृत कॉलोनियां फैल रही हैं, प्रदूषण जानलेवा बन गया है, बिजली-पानी की आपूर्ति अनिश्चित है और मेनहोल-गड्ढे समय-समय पर निर्दोष लोगों की अकाल मृत्यु का कारण बन जाते हैं। हमारे शहरों में एक आम नागरिक को रोजाना इन दु:स्वप्नों से होकर गुजरना पड़ता है।
संयुक्त राष्ट्र के शहरीकरण के अनुमानों पर आधारित विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में भारत की 35.7% आबादी शहरों में रहती थी। इसके मुकाबले चीन पहले ही 66.3% के स्तर पर पहुंच चुका था। विकसित देशों से तुलना करें तो अंतर और भी चौंकाने वाला है : अमेरिका में यह आंकड़ा 80%, कनाडा में 82%, जर्मनी में 78%, ब्रिटेन में 85% है। भारत चीन और विकसित दुनिया की तुलना में कहीं कम शहरीकृत है, लेकिन शहरीकरण के इस स्तर पर भी उसका अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर बेहद कमजोर है।
दिल्ली में हाल ही में पांच मंजिला पीजी होस्टल की इमारत का ढहना इसका एक भयावह उदाहरण है। करीब पांच दशक पुरानी इस बिल्डिंग के ढहने से सात लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हुए। शुरुआती रिपोर्टों से खस्ताहाल कंडीशन, मरम्मत के अनधिकृत काम और निगरानी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की आपराधिक मिलीभगत सामने आती है। त्रासदी यह है कि दिल्ली में ही ऐसे पीजी में लाखों छात्र रहते हैं। ये नाकामियां महानगरों तक ही सीमित नहीं हैं। हमारे दूसरे और तीसरे दर्जे के शहर भी तेजी से अर्बनाइज्ड हो रहे हैं, लेकिन बेहद अव्यवस्थित तरीके से।
नीतिगत उपेक्षा के अलावा, इस बदहाली की जड़ व्यापक और बेलगाम भ्रष्टाचार में भी है। रिश्वत की लगभग संस्थागत हो चुकी शृंखला नगर पालिका अधिकारियों, पुलिस, ठेकेदारों और राजनीतिक वर्ग तक फैल चुकी है। जिस व्यवस्था में हम जी रहे हैं, उसमें सामर्थ्यवान लोगों को शायद ही कभी असुविधा झेलनी पड़ती है; जबकि विशाल बहुसंख्य आबादी भुगतती रहती है। यानी व्यवस्था को बदलने की ताकत रखने वाले लोग उसके दुष्परिणामों से सुरक्षित हैं, लेकिन जो लोग इसकी मार झेलते हैं उनके पास इसके खिलाफ कुछ कर पाने की क्षमता बहुत कम है।
हम अकसर स्मार्ट सिटीज मिशन, डिजिटल गवर्नेंस, एआई और तकनीक-आधारित प्रशासन की बात करते हैं। लेकिन उस शहर को स्मार्ट कहना थोड़ा अजीब लगता है, जिसकी बुनियादी नागरिक व्यवस्थाएं ही काम नहीं करतीं। स्मार्ट सिटी वह नहीं होती, जिसमें सबसे ज्यादा सेंसर्स लगे हों या जहां प्रभावशाली कमांड सेंटर हों।
स्मार्ट सिटी वह है, जहां बुनियादी सेवाएं भरोसेमंद ढंग और अपेक्षित रूप से काम करती हों। जहां सड़कें सुरक्षित हों, पानी की आपूर्ति विश्वसनीय हो, सीवेज का समुचित ट्रीटमेंट किया जाता हो, कचरा नियमित उठाया जाता हो, इमारतों का निरीक्षण होता हो, यातायात सुचारु हो, जिसकी हवा में सांस ली जा सके और जहां के पब्लिक-स्पेस सभी के लिए सुलभ हों।
अगर हम अपने शहरों को रहने के लिहाज से बेहतर बनाना चाहते हैं, तो हमें बुनियादी सुधारों से शुरुआत करनी होगी। पहला सुधार वित्तीय क्षेत्र में होना चाहिए। आरबीआई नगर निगमों की वित्तीय कमजोरी का दस्तावेजीकरण कर चुका है, लेकिन इस स्थिति को सुधारने के लिए कुछ नहीं किया गया। दूसरे, जीआईएस मैपिंग, पारदर्शी मूल्यांकन और प्रभावी डिजिटल कलेक्शन के जरिए संपत्तिकर प्रणाली का भी आमूलचूल आधुनिकीकरण किया जाना जरूरी है।
तीसरे, स्पष्ट जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी और इसके लिए स्वतंत्र नगर निकाय ऑडिट होने चाहिए। हर प्रमुख नगर संपत्ति की एक डिजिटल पहचान होनी चाहिए। संबंधित एजेंसी, ठेकेदार, इंजीनियर, निर्माण की तारीख, रखरखाव का इतिहास और निरीक्षण का कार्यक्रम सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना चाहिए।
चौथे, बहुत से शहर अब भी नगर निगमों, विकास प्राधिकरणों, जल बोर्डों, परिवहन एजेंसियों, राज्य सरकार के विभागों के बीच उलझे हुए हैं। जिम्मेदारी बंटी हुई है और जवाबदेही कमजोर पड़ गई है। पांचवें, भ्रष्टाचार से सख्ती से निपटना होगा- त्वरित कार्रवाई और पारदर्शिता के जरिए।
नगर निकायों की निविदाएं, ठेके, कार्य-पूर्णता प्रमाणपत्र, निरीक्षण रिपोर्ट और रखरखाव के कार्यक्रम ऑनलाइन उपलब्ध होने चाहिए। व्यवस्था तभी बदलेगी, जब नागरिक खुद संगठित होकर जवाबदेही की मांग करेंगे और कहेंगे : अब बहुत हो चुका।
उस शहर को स्मार्ट कहना अजीब लगता है, जिसकी बुनियादी नागरिक व्यवस्थाएं ही काम नहीं करतीं। स्मार्ट सिटी वह नहीं होती, जिसमें सबसे ज्यादा सेंसर्स लगे हों या जहां प्रभावशाली कमांड सेंटर हों। स्मार्ट सिटी वह है, जहां बुनियादी सेवाएं भरोसेमंद ढंग से काम करती हों। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

