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मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले की चुरारा ग्राम पंचायत का ‘आदिवासी मझरा टोला’… करीब 250 की आबादी वाले इस टोले में घुसते ही टूटी दीवारें, छप्पर विहीन मिट्टी के घर और गरीबी साफ नजर आती है, लेकिन इस टोले का सबसे बड़ा सच भुखमरी नहीं, बल्कि वह जानलेवा नशा है, जिसने 10 साल में इस गांव को ‘विधवाओं का टोला’ बना दिया है। 7 जुलाई को जब यहां की महिलाएं कलेक्टोरेट की जनसुनवाई में पहुंचीं और डिप्टी कलेक्टर अनिल तलैया को मरने वालों की लिस्ट सौंपी तो उसे देखकर उन्होंने भी अपना सिर पकड़ लिया। महिलाओं की सिर्फ एक ही मांग है- हमारे टोले में शराब पर पूरी तरह बैन लगाया जाए। महिलाओं ने यह लिस्ट डिप्टी कलेक्टर को सौंपी, इसमें 19 लोगों के नाम 80 साल की शांति बाई बोलीं- मेरे घर से तीन अर्थियां उठीं टोले के एक चबूतरे पर बैठी 80 साल की बुजुर्ग शांति बाई कहती हैं- इस टोले में ऐसा कोई घर नहीं बचा, जहां शराब पीकर कोई मरा न हो। मेरे पति खिजूरी और दो बेटे रामनाथ व रामप्रकाश शराब की भेंट चढ़ गए। शांति बाई कहती हैं- पति को शराब की ऐसी लत थी कि भले रोटी ना मिले, लेकिन शराब जरूर मिले। जब भी घर आते, इतनी पिए रहते कि चलते भी नहीं बनता था। आते और रोटी मांगते, जब घर में कुछ बनाने के लिए होगा ही नहीं तो रोटी कैसे बनेगी? मैं कुछ नहीं कहती तो मुझे और बच्चों को मारते। जब वो ज्यादा मारपीट करने लगे तो बच्चे मेरा साथ देने लगे। शांति बाई कहती हैं- 10 साल पहले बहुत तेज जाड़ा था। पति बहुत ज्यादा शराब पीकर आए। गाली देते हुए मारपीट करने लगे। बच्चों ने उन्हें रोज की तरह घर से बाहर जाकर सोने को कहा। वे बाहर चले गए। सुबह टपरिया में मरे मिले। जैसे-तैसे बेटों की शादी की, वे भी बाप की तरह शराब पीने लगे। बहुएं मना करतीं तो उन्हें मारते। दोनों बेटों ने बहुओं का इतना पीटा कि उनके दांत तक टूट गए। हमारे आदिवासी टोला के आसपास भले ही खाने का सामान नहीं मिले, लेकिन शराब 24 घंटे आसानी से मिल जाती है। बच्चों तक को उधार में पिलाई जा रही है शराब टोले की सुखबती ने बताया कि गांव में शराब बेचने वाले इतने बेखौफ हैं कि वे छोटे-छोटे बच्चों को भी उधार में शराब दे देते हैं। सुखबती बताती हैं कि कल ही की बात है, तीन छोटे बच्चे शराब पीकर लड़खड़ाते हुए आ रहे थे और आपस में कह रहे थे- ऐ हमारी मम्मी से न कहिए, ऐ हमारे पापा से न कहिए। यहां बचपन से ही बच्चों को नशे की दलदल में धकेला जा रहा है। सुखबती कहती हैं- मेरा अच्छा-खासा परिवार था। पति नारायण के साथ अच्छे से जिंदगी गुजर रही थी। न जाने किसने उन्हें कच्ची शराब पीने की लत लगा दी। दो-तीन साल में तो उनकी हालत ऐसी हो गई कि अपने पैरों पर खड़े तक नहीं हो पाते थे। मेहनत-मजदूरी कर बहुत इलाज कराया, लेकिन उन्हें दवा नहीं, शराब चाहिए होती थी। आखिरकार दो साल पहले वो भी मर गए। पास ही खड़ी भृगु देवी ने बताया- यहां सुबह से लेकर रात तक युवा और बुजुर्ग शराब पीते रहते हैं, अगर समय रहते इसे नहीं रोका गया तो और परिवार उजड़ जाएंगे। सुबह 4 बजे उठते हैं, सीधे शराब पीने चले जाते हैं… लाड़ कुंवर बाई बताती हैं- तीन साल पहले मेरे पति की भी शराब से मौत हो गई। वे रोज शराब पीकर घर आते और झगड़ा करते। डॉक्टरों ने भी कहा था कि शराब छोड़ दो, लेकिन नहीं माना। अब मेरे 4 बच्चे हैं। मजदूरी कर जैसे-तैसे उनका पेट पाल रही हूं। गांव के आसपास 24 घंटे अवैध शराब मिलती है। लाड़ कुंवर कहती हैं- मेरी सहेली के पति की हालत देखिए। उसके चार बच्चे हैं। घर में खाने को नहीं है, लेकिन पति को शराब चाहिए। इतनी शराब पीता है कि उसके चेहरे पर सूजन आ गई है। रुंधे गले से जानकी बाई बताती हैं- घर में कुछ नहीं है, अगर वो आटा ले आए तो रोटी बन जाती है। नहीं तो बच्चों के साथ भूखे पेट सो जाती हैं। पति की नींद रोज सुबह 4 बजे खुल जाती हैं। वह सीधे शराब पीने चले जाते हैं। यहां के हाल तो ऐसे हैं कि आदमी लोग सुबह निस्तार के लिए भी जाते हैं तो नशे में लौटते हैं। डॉक्टरों ने भी समझाया, लेकिन नहीं माने ग्रामीणों के मुताबिक, जिन पुरुषों की मौत हुई, उनमें से कई को जिला अस्पताल ले जाया गया था। डॉक्टरों ने साफ चेताया था कि उनके लिवर और किडनी खराब हो चुके हैं, शराब नहीं छोड़ी तो मौत तय है। इसके बावजूद टोले के पास सड़क किनारे धड़ल्ले से बिकने वाली कच्ची शराब के कारण यह जानलेवा सिलसिला नहीं थमा। कई बार शिकायत के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। महिलाओं के गुस्से के बाद हरकत में आया प्रशासन मामला सुर्खियों में आने के बाद निवाड़ी कलेक्टर जमुना भिड़े खुद इस आदिवासी टोले में पहुंचीं। उन्होंने महिलाओं और पुरुषों से बात की और बच्चों को स्कूल भेजने की अपील की। कलेक्टर ने आबकारी विभाग और पुलिस को अवैध शराब पर तत्काल सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। गांव में जागरूकता चौपाल लगाने और पीड़ित महिलाओं को सरकारी योजनाओं से जोड़कर उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने का आश्वासन दिया गया है। सबसे बड़ा सवाल सबसे बड़ा सवाल है कि क्या केवल कार्रवाई के निर्देश इस गांव की तस्वीर बदल पाएंगे? क्या अवैध शराब पर रोक लग सकेगी? क्या उन बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो पाएगा? जिनके सिर से पिता का साया उठ चुका है और क्या वे माताएं, जिन्होंने जवान बेटे खो दिए, कभी सामान्य जीवन जी पाएंगी?
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'घर में आटा हो न हो, शराब 24 घंटे हाजिर':निवाड़ी के आदिवासी टोले में कच्ची दारू ने ली 19 पुरुषों की जान; अब सिर्फ विधवाएं बचीं
