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China Nuclear Testing Vs US; Xi Jinping Secret Site – Donald Trump


जिनपिंग के स्वागत में ट्रम्प भले ही रेड कार्पेट बिछा रहे हों, लेकिन पर्दे के पीछे रस्साकशी भी जारी है। ट्रम्प प्रशासन ने पूछा है कि क्या नमक की गुफाओं में चीन परमाणु बमों की टेस्टिंग कर रहा है?

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अमेरिकी अखबार ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ के मुताबिक, अमेरिका और चीन के अधिकारी पिछले कुछ हफ्तों में 3 गोपनीय बैठकें कर चुके हैं। जिनपिंग की विजिट में भी इस मुद्दे पर बातचीत संभव है।

आखिर अमेरिका ऐसे दावे क्यों कर रहा, क्या वाकई चीन कोई अनोखी टेस्टिंग कर रहा है और ये खतरनाक कैसे है; डिकोड करेंगे आज के एक्सप्लेनर में…

सवाल-1: अमेरिका ने चीन पर क्या आरोप लगाए हैं?

जवाब: अमेरिका के आरोपों की कहानी 7 साल पहले शुरू होती है…

  • 2019 में अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने कहा था कि चीन और रूस कम ताकत वाले न्यूक्लियर टेस्ट कर रहे हैं। रिपोर्ट में दावा था कि चीन ने 2018 में शिनजियांग प्रांत के ‘लोप नूर’ नाम की जगह पर खुदाई शुरू की, जो चोरी-छिपे टेस्टिंग की तैयारी जैसी लगती हैं।
  • फिर आया 22 जून 2020 का दिन। कजाकिस्तान में मौजूद एक मॉनिटरिंग स्टेशन ने 12 सेकंड के भीतर 2.75 तीव्रता के 2 भूकंप के झटके रिकॉर्ड किए। यह स्टेशन कॉम्प्रेहेंसिव न्यूक्लियर टेस्ट बैन ऑर्गेनाइजेशन (CTBTO) का था, जिसका काम ही दुनियाभर में न्यूक्लियर टेस्ट पकड़ना है। अमेरिका ने दावा किया कि ये लोप नूर में चीन के न्यूक्लियर टेस्ट से जुड़े धमाके थे।
  • 29 अक्टूबर 2025 को जिनपिंग से मुलाकात से ठीक पहले राष्ट्रपति ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, ‘दूसरे देशों के टेस्टिंग प्रोग्राम्स की वजह से मैंने भी डिपार्टमेंट ऑफ वॉर को हमारे परमाणु हथियारों का परीक्षण फौरन शुरू करने को कहा है।’ ट्रम्प ने कहा, ‘रूस टेस्ट कर रहा है, चीन टेस्ट कर रहा है। हम अकेला ऐसा देश नहीं बनना चाहते, जो टेस्ट नहीं करता।’
  • फरवरी 2026 में जिनेवा में अमेरिकी आर्म्स कंट्रोल डिपार्टमेंट के सेक्रेट्री थॉमस डिनांनो ने कहा, ‘अमेरिकी सरकार जानती है कि चीन ने 22 जून 2020 को न्यूक्लियर टेस्ट किए हैं। सैकड़ों टन विस्फोटक वाले टेस्ट की भी तैयारी हो रही है। चीन ने ये छिपाने के लिए ‘डीकपलिंग’ टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया।’
शी जिनपिंग 11 साल बाद अमेरिका पहुंचे हैं। वाइट हाउस में ट्रम्प के साथ मुलाकात की तस्वीर।

शी जिनपिंग 11 साल बाद अमेरिका पहुंचे हैं। वाइट हाउस में ट्रम्प के साथ मुलाकात की तस्वीर।

सवाल-2: आखिर गुफाओं में परमाणु टेस्ट की डीकपलिंग टेक्नोलॉजी है क्या?

जवाब: आम तौर पर परमाणु परीक्षण जमीन के नीचे होते थे। इससे इतनी जोरदार भूकंपीय लहरें पैदा होतीं कि दुनियाभर में लगे मॉनिटरिंग स्टेशन उसे आसानी से पकड़ लेते। लेकिन ‘डीकपलिंग’ तकनीक से धमाके की असली ताकत और उससे पैदा होने वाली भूकंपीय लहरों को छिपाया जा सकता है…

  • इसमें किसी सुरंग में सीधे परमाणु विस्फोट करने के बजाय, बम को जमीन के अंदर खोदी गई एक बड़ी खाली गुफा (कैविटी) के बीचो-बीच रखा जाता है।
  • ये गुफा आमतौर पर नमक की चट्टान से बनाई जाती है। ये चट्टान ऐसी होती हैं कि वो धमाके के झटके को सोख लेती है। ठीक वैसे ही जैसे अगर कोई भारी चीज ठोस जमीन के बजाय किसी तकिए पर फेंकें, तो उससे आवाज नहीं होगी।
  • जो धमाका किसी सामान्य सुरंग में 10 गुना तेज भूकंपीय सिग्नल भेजता है, वो नमक की चट्टानों की बनी गुफा में बेहद हल्का कंपन पैदा करता है। ये किसी छोटे भूकंप या खदान में होने वाले विस्फोट जैसा लगता है।
  • चीन की लोप नूर साइट भी एक सूखी हुई नमक की झील पर बनी है। इसलिए ये ‘डीकपलिंग’ तकनीक के लिए मुफीद मानी जाती है।

1996 से पहले अमेरिका और सोवियत रूस ने भी कई बार ये तरीके आजमाए थे। मसलन, 3 दिसंबर, 1966 को अमेरिका ने मिसिसिपी के टाटम साल्ट डोम में इसी डीकपलिंग तकनीक से ‘स्टर्लिंग’ नाम का टेस्ट किया था।

डीकपलिंग तकनीक से किए 'स्टर्लिंग' टेस्ट के बम को जमीन में डालते अमेरिकी वैज्ञानिक और कर्मचारी।

डीकपलिंग तकनीक से किए ‘स्टर्लिंग’ टेस्ट के बम को जमीन में डालते अमेरिकी वैज्ञानिक और कर्मचारी।

सवाल-3: क्या वाकई चीन चोरी-छिपे ऐसा कोई टेस्ट कर रहा है? जवाब: अमेरिका का दावा 22 जून 2020 को कजाकिस्तान के मॉनिटरिंग स्टेशन पर मिले सिग्नल पर टिका है। ये सिग्नल प्राकृतिक भूकंप के सिग्नल जैसे नहीं थे, बल्कि किसी नियंत्रित धमाके जैसे थे।

17 फरवरी 2026 को अमेरिकी थिंकटैंक हडसन इंस्टीट्यूट के एक इवेंट में अमेरिकी असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ स्टेट क्रिस्टोफर ने बताया, ‘मैंने इसका एडिशनल डेटा भी देखा है। यह एक अकेला विस्फोट के जैसा लगता है। यह डेटा माइनिंग ब्लास्ट या भूकंप से मेल नहीं खाता।’

हालांकि CTBTO ने कहा कि रिकॉर्ड किए गए झटकों से पुख्ता तौर पर ये नहीं कहा जा सकता कि ये न्यूक्लियर टेस्ट थे।

फॉरेन पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट में न्यूक्लियर स्ट्रैटजी एक्सपर्ट जेफ्री लुइस के मुताबिक, पिछले 5 साल की सैटेलाइट तस्वीरों में लोप नूर में पहाड़ों के नीचे नई टनल, नई सड़कें और स्टोरेज फैसिलिटीज दिखती हैं। 2022 और 2023 की तस्वीरों की तुलना से पता चलता है कि टनल खोदने से निकली मिट्टी के ढेर लगातार बढ़ रहे हैं। यानी टनल बड़ी की जा रही है। इससे लग रहा है कि चीन ने न्यूक्लियर टेस्ट किए हैं।

ये लोप नूर की सैटेलाइट तस्वीर है। अमेरिकी थिंकटैंक CSIS ने इसके एनालिसिस में बताया कि यहां की 'टनल-5' में लगातार गतिविधि बढ़ी है।

ये लोप नूर की सैटेलाइट तस्वीर है। अमेरिकी थिंकटैंक CSIS ने इसके एनालिसिस में बताया कि यहां की ‘टनल-5’ में लगातार गतिविधि बढ़ी है।

लेकिन चीन अमेरिकी दावों से इनकार कर रहा है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा कि अमेरिका के आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं। ये उनका न्यूक्लियर टेस्ट्स दोबारा शुरू करने का बहाना है।

सवाल-4: कम ताकत वाले न्यूक्लियर बमों की टेस्टिंग ज्यादा खतरनाक क्यों?

जवाब: इस्तेमाल के हिसाब से मोटे तौर पर परमाणु हथियारों की 2 कैटेगरी हैं…

  1. स्ट्रैटेजिक न्यूक्लियर वेपन: ये बड़े परमाणु हथियार लंबी दूरी और बड़े हमले के लिए बनाए जाते हैं। इनसे डिटेरेंस, यानी डर बनाए रखा जाता है। साथ ही दुश्मन देश की राजधानी, बड़े मिलिट्री बेस या बड़े शहर को तबाह किया जा सकता है। जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका ने ऐसे ही बम गिराए थे।
  2. टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन: ये कम ताकत वाले हथियार कम दूरी के और छोटे हमलों के लिए बनाए जाते हैं। इनका मकसद दुश्मन का कोई पूरा शहर या इलाका बर्बाद किए बिना, जंग के मैदान में सैनिकों, बंकरों, जहाजों या मिसाइल अड्डों जैसे छोटे टारगेट तबाह करना है। अभी तक किसी जंग में ऐसे हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

अमेरिका को अंदेशा है कि चीन टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन बना रहा है। ये हिरोशिमा पर गिराए गए करीब 15 हजार टन TNT की ताकत वाले बम से कहीं छोटे बम होंगे। ताकि एक ही मिसाइल पर ज्यादा बम लगाए जा सकें।

सवाल-5: तो क्या एक बार फिर से न्यूक्लियर रेस शुरू हो जाएगी?

जवाब: दुनियाभर के परमाणु हथियारों पर निगाह रखने वाले स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा, ‘दशकों से न्यूक्लियर हथियारों को नियंत्रित करने की कोशिशें हो रही हैं। फिर भी ऐसे हथियार बढ़ रहे हैं। दुनिया में नई न्यूक्लियर आर्म्स रेस उभर रही है। जबकि देशों के बीच में तनाव और गलतफहमियां तेजी से बढ़ रही हैं।’

दुनियाभर में करीब 12,187 न्यूक्लियर हथियार हैं। इनमें से 83% हथियार रूस और अमेरिका के पास हैं। एक साल में रूस के न्यूक्लियर हथियार 4309 से बढ़कर 4400, चीन के 600 से 620, भारत के 180 से 190 और नॉर्थ कोरिया के 50 से 60 पहुंच गए।

अमेरिकी थिंकटैंक आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डैरिल किम्बल ने चेतावनी दी है कि अगर ट्रम्प के ऐलान बाद अमेरिका ने नए टेस्ट किए, तो एक चेन-रिएक्शन शुरू हो सकती है। इससे पूरी नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी टूट सकती है। यानी वो समझौता खत्म हो सकता है, जिसने परमाणु हथियारों को बढ़ने से रोका है।

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