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- Kumar Rohit Column | Fighting Misinformation & Digital Literacy In India
5 घंटे पहले
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कुमार रोहित कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) में अपर केंद्रीय आयुक्त
एक बुजुर्ग को मैसेज मिला- आपकी पेंशन बंद होने वाली है, तुरंत लिंक पर केवाईसी करें। घबराहट में उन्होंने लिंक खोला और देखते ही देखते उनके बैंक खाते से 40 हजार रुपए निकल गए। उनके हाथ में मोबाइल था, सूचना थी, पर सच नहीं था। आज हर हाथ में मोबाइल है, पर सही सूचनाएं कितनी हैं? यही बड़ा सवाल है।
कभी सूचना सुविधा थी, आज जरूरत है। सांस की तरह अदृश्य, पर हर फैसले में मौजूद। मौसम का हाल हो या मंडी का भाव, बच्चे का दाखिला हो या पेंशन का नियम- हर कदम पर सूचना चाहिए। स्मार्टफोन ने सूचना जेब में ला दी, पर जेब में सूचनाओं का होना और हाथों में सही सूचनाओं का होना एक बात नहीं। हम सूचनाओं के अकाल से निकलकर उनकी बाढ़ में आ चुके हैं।
यूनेस्को के विंडहोक+30 घोषणापत्र ने सूचना को पब्लिक गुड यानी लोकहित कहा है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य 16.10.2 के तहत यूनेस्को वैश्विक निगरानी करता है। यूएन क्रॉनिकल (25 सितंबर 2025) के अनुसार आज 139 देशों में सूचना का अधिकार कानून है, जो 1990 में केवल 14 देशों में था। भारत में सूचना के अधिकार ने 2005 में नागरिकों को सवाल पूछने की ताकत दी। पर कानून होना और उसका सरल रूप में नागरिक तक पहुंचना, अलग बातें हैं।
भारत में 90 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर्स हैं। डिजिलॉकर, उमंग, जन-सूचना पोर्टलों ने फाइलों को फोन तक पहुंचाया, यह उपलब्धि है। फिर भी कई पोर्टलों पर जानकारी ऐसी कानूनी भाषा में है, जो नागरिकों को समझ नहीं आती। हर बोर्ड अलग रास्ता बताए तो मंजिल तक पहुंचना कठिन है। चुनौती विश्वसनीयता की है।
डिजिटल दुनिया में सूचना के साथ फर्जी सूचना-स्पैम का सैलाब बढ़ रहा है। ट्रूकॉलर इनसाइट्स रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत में 2025 में 4,168 करोड़ स्पैम कॉल और 12,903 करोड़ स्पैम मैसेज पहचाने गए- यानी रोज औसत करीब 47 करोड़ अवांछित कॉल-मैसेज। ऐसे में दूरसंचार विभाग के ‘संचार साथी’ जैसी विनियामक पहल और पीआईबी फैक्ट चेक जैसे तंत्र जरूरी तकनीकी कवच तो हैं, पर मैसेज फॉरवर्ड करने से पहले जांचना तो हमारा ही काम है।
हर स्क्रीन पर कुछ है, पर शोर में सच पहचानना कठिन है। पहुंच का मतलब जानकारी पहुंचना नहीं, कसौटी यह है कि नागरिक उसे समझ, परख और अपने हित में इस्तेमाल कर पा रहा है या नहीं। यह पूछने का सूचना-विवेक जरूरी है कि स्रोत क्या है, विश्वसनीयता कितनी है, संदर्भ क्या है आदि। सोशल मीडिया और एआई ने सूचनाओं की गति तेज तो की है, पर डीपफेक और एल्गोरिदम के भ्रम ने उसे धुंधलाया भी है। लोकतंत्र में डिजिटल दक्ष ही नहीं, विवेकशील नागरिक भी चाहिए।
प्रशासन और नागरिक का रिश्ता 4 बातों पर टिका है : 1. पारदर्शिता- यानी सूचना सरल भाषा में, समय पर और बिना मांगे मिले, जैसे राजस्थान का जन-सूचना पोर्टल; 2. सशक्तीकरण- यानी नागरिक लाभार्थी नहीं, भागीदार बनें, किसान अपनी भाषा में मौसम-भाव समझें; 3. भरोसेमंद शासन- यानी पहुंच के साथ निजता-सुरक्षा भी; और 4. जवाबदेही- यानी सही सूचना से सवाल और सवालों से जवाब निकलें।
हमें आज यह नहीं सीखना है कि सूचना कहां मिलेगी, बल्कि यह सीखना है कि भरोसा किस पर और क्यों करें। भविष्य के नागरिक को डिजिटल दक्षता के साथ सूचना-विवेक भी चाहिए। विकसित भारत जीडीपी, एक्सप्रेसवे या डेटा खपत से ही नहीं बनेगा, उसकी ताकत सजग नागरिक भी होंगे। हम खबरों का स्रोत जांच सकें और प्रमाण से नीतियों पर राय बना सकें, यह अब बहुत जरूरी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

