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44 साल बाद गोल्ड विजेता हॉकी टीम स्ट्राइकर का इंटरव्यू,:ईशिका ने दूसरों को देख 8 साल पहले थामी हॉकी, इंजरी से उभरी, ओलिंपिक मेडल लक्ष्य




44 साल बाद एशियन गेम्स में गोल्ड जीतने वाली हॉकी टीम की खिलाड़ी (स्ट्राइकर) भिवानी की बेटी ईशिका सम्भरवाल मेडल जीतने के बाद भिवानी पहुंची। इस दौरान ईशिका सम्भरवाल ने दैनिक भास्कर से बातचीत की और अपने हॉकी खेलने, एशियन गेम्स के अनुभव व आगे के लक्ष्यों को लेकर विचार सांझा किए। ईशिका सम्भरवाल ने कहा कि 44 साल के बाद यह हमारा गोल्ड मेडल आया है, इसके लिए बहुत खुशी है। यह मेरा पहला एशियन गेम्स था। मेरे लिए गौरव का पहल है कि मुझे मेरे पहले एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल मिला है। 44 साल बाद गोल्ड जीतने के बाद ओलिंपिक में भी क्वालीफाई कर लिया है। उन्होंने कहा कि उसके पिता विरेंद्र कोच रहे हैं। शुरूआत में जब छोटी थी तो उनके साथ जाती थी। तब बड़े प्लेयर को देखकर खेलने का मन बनाया और उसी समय हॉकी शुरू की। उन्होंने करीब 8 साल पहले हॉकी खेलना शुरू किया था। स्ट्राइकर के रूप में खेलकर जड़े गोल
ईशिका सम्भरवाल ने कहा कि किसी भी गेम में आगे बढ़ने के लिए नियमितता बहुत जरूरी होती है। नियमितता रखी जाएगी तो जीत जरूर मिलेगी। उन्होंने कहा कि अब वे बैंगलुरू में तैयारी कर रहे हैं और आगे भी ओलिंपिक की वहां तैयारी करेंगे। उन्होंने बताया कि वे टीम के लिए स्ट्राइकर खेलती हैं। इस टूर्नामेंट में 6-7 गोल किए। प्रयास यही रहता है कि जितना अच्छा टीम के लिए प्रदर्शन कर सकूं व करूं। उन्होंने कहा कि एशियन गेम्स के दौरान सेमीफाइनल मुकाबला सबसे अच्छा व रोचक रहा। जिसमें भारत की कोरिया के साथ भिड़ंत थी। सेमीफाइनल प्रेसर का मैच होता है औश्र वह जीतना भी जरूरी होता है। उसमें पीसी में पहला गोल स्कोर किया था, वह गौरवशाली पल था। ओलिंपिक को लेकर वे अपनी टीम को बेहतर बनाने पर फोकस रहेगा। पिता ने ट्रेनिंग तो मां ने खाने-पीने का ध्यान रखा
ईशिका सम्भरवाल ने कहा कि परिवार का पूरा सहयोग रहा है, बिना परिवार के सहयोग के यहां तक नहीं पहुंचा जा सकता। पिता खुद कोच रहे हैं, वहीं मां ने घर पर रहकर उसे खेलने के लिए हर सुविधाएं दी और हर चीज का ध्यान रखा। शुरूआत में सुबह जल्दी उठाना मुश्किल होता है, वह सब मां ने संभाला और सुबह जल्दी उठाया। खाने-पीने का ध्यान मां ने ही विशेष रूप से रखा। उन्होंने कहा कि खेल के साथ पढ़ाई भी की। जिसके कारण शेड्यूल काफी व्यस्त रहती थी। दिन में पढ़ाई व सुबह-शाम प्रैक्टिस करती थी। इसके लिए मां का काफी सहयोग रहा। उन्होंने कहा कि उनका सबसे अच्छा दौर वह था जब उनका सीनियर में चयन हुआ था। सबसे बुरा समय वह था जब सीनियर नेशनल के बाद उनको फ्रेक्चर हुआ था। जब वे जूनियर नेशनल की प्लेयर थी। जिसके कारण दो-तीन टूर्नामेंट मिस हो गए थे। आगे प्रयास रहेगा कि वे खेल के साथ-साथ पढ़ाई को लेकर भी चलें। उन्होंने बताया कि जब वे पिता के साथ जाती थी तो हॉकी खेलते हुए खिलाड़ियों को देखर उनमें स्पार्क आया और उन्होंने हॉकी थाम ली। गोल्ड मेडल जीतने पर उसके पिता व अन्य लोग सभी खुश हैं।



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