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दुमका से लोकसभा चुनाव लड़ चुकी थीं रूपी सोरेन:बाबूलाल मरांडी से मिली थी हार, 1999 में झामुमो ने बनाया था उम्मीदवार, पार्टी में सक्रिय रहीं




झारखंड आंदोलन के महानायक दिशोम गुरु शिबू सोरेन की धर्मपत्नी स्व. रूपी सोरेन ने पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ राजनीतिक और सामाजिक जीवन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। झामुमो ने उन्हें 1999 के लोकसभा चुनाव में दुमका सीट से उम्मीदवार बनाया था। उस चुनाव में उनका मुकाबला भाजपा के बाबूलाल मरांडी से हुआ था। चुनाव में रूपी सोरेन को हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, चुनावी राजनीति में यह उनका प्रमुख राजनीतिक पड़ाव रहा। इसके बाद भी वे झामुमो से जुड़ी रहीं और पार्टी की केंद्रीय कमेटी की सदस्य के रूप में संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाती रहीं। उनका राजनीतिक जीवन सिर्फ चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वे पार्टी के सामाजिक और संगठनात्मक कामों में भी सक्रिय रहीं। शिबू सोरेन के लंबे राजनीतिक और आंदोलनकारी जीवन के दौरान रूपी सोरेन लगातार उनके साथ खड़ी रहीं। जेल से पति को छुड़ाने पहुंचीं हजारीबाग सीनियर जर्नलिस्ट और सूचना आयुक्त अनुज सिन्हा बताते हैं कि शादी के बाद जब शिबू सोरेन महाजनी प्रथा और शोषण के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय हुए, तब रूपी सोरेन ने परिवार की जिम्मेदारी संभाली। आंदोलन के दौरान एक मामले में शिबू सोरेन को गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल भेज दिया गया था। उस समय रूपी सोरेन ससुराल में अकेली पड़ गई थीं। वे मायके चांडिल पहुंचीं और अपने पिता से कहा कि उनका दामाद जेल में है, उन्हें छुड़वाएं। इसके बाद वे पिता और कुछ लोगों के साथ हजारीबाग पहुंचीं। वकील की व्यवस्था कर कानूनी प्रक्रिया पूरी कराई और शिबू सोरेन को जेल से बाहर लेकर आईं। उस समय गुरुजी की तबीयत काफी खराब थी। रूपी सोरेन ने उनकी सेवा की और उन्हें दोबारा स्वस्थ होने में मदद की। लठैत धमकाने पहुंचे तो हंसुआ लेकर दौड़ा दिया आंदोलन के दौरान शिबू सोरेन के भूमिगत रहने पर पुलिस उनकी तलाश करती थी। दूसरी ओर महाजनों के लठैत और उनके लोग नेमरा स्थित घर पर धमकाने पहुंचते थे। एक बार महाजन का आदमी धमकाने आया तो ग्रामीणों और रिश्तेदारों ने रूपी सोरेन को छिपने की सलाह दी। लेकिन वे डरी नहीं। उन्होंने घर से हंसुआ निकाला, गुरुजी की बहन को साथ लिया और महाजन के आदमी को दौड़ा दिया। उनका रौद्र रूप देखकर वह वहां से भाग गया। जब शिबू जंगलों में रहकर आंदोलन चला रहे थे, तब रूपी सोरेन ने नेमरा में घर और बच्चों की जिम्मेदारी संभाली। इसी मजबूती ने शिबू सोरेन को आंदोलन पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर दिया। चांडिल के दशहरा मेले में हुई थी पहली मुलाकात अनुज कुमार सिन्हा के मुताबिक, रूपी सोरेन मूल रूप से चांडिल की रहने वाली थीं। शिबू सोरेन करीब 17-18 वर्ष के थे, तब दशहरे के मेले में दोनों की पहली मुलाकात हुई थी। उस समय रूपी सोरेन की उम्र करीब 7-8 वर्ष थी। बाद में दोनों का विवाह हुआ। जीवन के अंतिम दौर में भी उन्होंने पति का साथ निभाया। 23 जून 2026 को राष्ट्रपति भवन में रूपी सोरेन ने व्हीलचेयर से पहुंचकर शिबू सोरेन को मरणोपरांत मिले पद्म भूषण सम्मान को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों ग्रहण किया था। उस समय उनकी तबीयत भी ठीक नहीं थी, लेकिन वे पति को मिले सम्मान को लेने पहुंचीं।



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