बिहार के गंभीर लिवर मरीजों के लिए राहत की खबर है। पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में लिवर ट्रांसप्लांट सेवा दोबारा शुरू करने की तैयारियां तेज कर दी गई हैं।
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संस्थान का दावा है कि सभी जरूरी तैयारियां अंतिम चरण में हैं और जल्द ही यह सुविधा नियमित रूप से शुरू की जाएगी। अभी लिवर ट्रांसप्लांट के लिए आने वाले मरीजों की जांच और मेडिकल वर्कअप किया जा रहा है।
IGIMS में विशेषज्ञ टीम पहले से मौजूद है। लिवर ट्रांसप्लांट के लिए मरीज लगातार पहुंच रहे हैं। इन मरीजों की मेडिकल जांच और आवश्यक वर्कअप का काम तेजी से किया जा रहा है।
इस सेवा के नियमित होने से मरीजों को इलाज के लिए दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद जैसे महंगे शहरों और निजी अस्पतालों का रुख नहीं करना पड़ेगा।

पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS)।
एक ट्रांसप्लांट पर करीब 15 लाख खर्च
संस्थान में एक लिवर ट्रांसप्लांट पर करीब 15 लाख रुपए खर्च आने का अनुमान है। निजी अस्पतालों में लिवर ट्रांसप्लांट का खर्च करीब 30 से 35 लाख रुपए तक पहुंच सकता है। ऐसे में IGIMS में सरकारी सहायता या विशेष पैकेज मिलने पर मरीजों को बड़ी आर्थिक राहत मिल सकती है।
बिहार में बड़ी संख्या में मरीजों को जरूरत
वर्ष 2021 में उपलब्ध जानकारी के मताबिक, बिहार में कम से कम 200 मरीज ऐसे थे, जिन्हें तत्काल लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत थी। उस समय ट्रांसप्लांट का खर्च करीब 10 लाख रुपए माना जा रहा था। अब लागत बढ़कर करीब 15 लाख रुपए होने से आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों की परेशानी और बढ़ गई है।

लिवर ट्रांसप्लांट के लिए अलग सरकारी पैकेज की मांग
IGIMS की ओर से लिवर ट्रांसप्लांट के लिए अलग सरकारी आर्थिक सहायता की मांग की गई है। संस्थान ने संबंधित विभाग को इस संबंध में कई बार पत्र और रिमाइंडर भी भेजे हैं।
फिलहाल किडनी ट्रांसप्लांट के लिए करीब 3.5 लाख, कॉक्लियर इम्प्लांट के लिए करीब 2.80 लाख और बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए करीब 3 लाख रुपए तक सरकारी सहायता का प्रावधान बताया गया है।
लिवर ट्रांसप्लांट के लिए अलग पैकेज नहीं होने से गरीब मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। संस्थान का मानना है कि अगर लिवर ट्रांसप्लांट के लिए सरकारी पैकेज मिलता है तो ज्यादा संख्या में जरूरतमंद मरीजों का इलाज संभव होगा।
2020 में हुआ था पहला ट्रांसप्लांट, 48 घंटे बाद मरीज की मौत
IGIMS में लिवर ट्रांसप्लांट शुरू करने की कवायद करीब एक दशक पुरानी है। 2017-18 में विशेषज्ञों की मदद लेने, उपकरण जुटाने और जरूरी चिकित्सा सुविधाएं विकसित करने की प्रक्रिया शुरू हुई थी।
इसके बाद मार्च 2020 में पहला लिवर ट्रांसप्लांट किया गया। हालांकि, ऑपरेशन के करीब 48 घंटे बाद मरीज की मौत हो गई। इसके बाद ट्रांसप्लांट सेवा को आगे बढ़ाने के लिए विशेषज्ञ टीम, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और पोस्ट-ऑपरेटिव केयर को मजबूत करने की जरूरत सामने आई।

2021 में शुरू हुई थी अलग ओपीडी
2021 में लिवर ट्रांसप्लांट के लिए अलग ओपीडी शुरू की गई थी। उस समय बड़ी संख्या में मरीज ट्रांसप्लांट की उम्मीद लेकर IGIMS पहुंचे थे। शुरुआती दौर में बाहरी विशेषज्ञों की मदद से ट्रांसप्लांट कराने की योजना भी बनाई गई थी, लेकिन सेवा नियमित रूप से आगे नहीं बढ़ सकी।
डोनर की कमी, विशेषज्ञ टीम की उपलब्धता, ICU और ऑपरेशन के बाद की निगरानी, जटिल चिकित्सा व्यवस्था और इलाज की लागत जैसी चुनौतियां बनी रहीं।
अब वर्ष 2026 में संस्थान ने एक बार फिर इस सेवा को व्यवस्थित तरीके से शुरू करने की तैयारी की है।
सबसे बड़ी चुनौती उपयुक्त डोनर की उपलब्धता
विशेषज्ञों के मुताबिक, लिवर ट्रांसप्लांट सेवा शुरू करने के साथ सबसे बड़ी चुनौती उपयुक्त डोनर की उपलब्धता है। कई मरीज आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद डोनर नहीं मिलने के कारण ट्रांसप्लांट नहीं करा पाते।
सूरत से आए डोनेट हार्ट से जुड़े पद्मश्री डॉ. निलेश मंडलेवाला ने अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति के अंगदान से 6 से 8 मरीजों को नया जीवन मिल सकता है।
ब्रेन डेथ के बाद परिवार की सहमति से अंगदान संभव है, लेकिन इसके लिए समय पर ब्रेन डेथ की पहचान, परिवार की काउंसिलिंग और अंगों को सुरक्षित तरीके से जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाने की व्यवस्था जरूरी है।
युवाओं से अंगदान अभियान से जुड़ने की अपील
IGIMS के उपनिदेशक प्रो. डॉ. विभूति प्रसन्न सिन्हा ने युवाओं से अंगदान और नेत्रदान अभियान से जुड़ने की अपील की। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रांसप्लांट की सुविधा विकसित करने के साथ पर्याप्त डोनर उपलब्ध कराने के लिए समाज में अंगदान को लेकर जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है।
अब चुनौती सेवा शुरू करने से ज्यादा उसे नियमित बनाने की
IGIMS में विशेषज्ञ टीम और ट्रांसप्लांट के लिए मरीज उपलब्ध हैं। ऐसे में अब चुनौती केवल सेवा शुरू करने की नहीं, बल्कि इसे नियमित, सुरक्षित और लंबे समय तक संचालित करने की है।
इसके लिए सरकारी आर्थिक सहायता के साथ पर्याप्त डोनर नेटवर्क, ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन सिस्टम, ICU बेड, प्रशिक्षित स्टाफ, ऑपरेशन थिएटर और पोस्ट-ऑपरेटिव निगरानी की मजबूत व्यवस्था जरूरी होगी।
अगर ये व्यवस्थाएं मजबूत होती हैं और सरकार की ओर से आर्थिक सहायता मिलती है, तो बिहार में लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा का विस्तार हो सकता है। इससे मरीजों को दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद जैसे शहरों या निजी अस्पतालों में इलाज कराने के लिए होने वाले भारी खर्च और अतिरिक्त परेशानी से राहत मिलने की उम्मीद है।

फोकस अब तीन चीजों पर है—सरकारी आर्थिक सहायता, डोनर उपलब्धता और मजबूत ट्रांसप्लांट सिस्टम तैयार कर सेवा को नियमित बनाना।
