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Mokama MLA Anant Singh Rebel


मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह की बगावत JDU सुप्रीमो नीतीश कुमार के दरबार तक पहुंच गई है। मंत्री श्रवण कुमार ने साफ शब्दों में कहा, ‘इस मामले पर जल्द शीर्ष नेतृत्व फैसला लेगा।’ इस बयान के बाद सियासी गलियारों में अनंत सिंह पर कड़ी कार्रवाई की अटकल

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क्या बाहुबली विधायक पार्टी से निकाले जाएंगे, विधायकी जाएगी, कार्रवाई के डर से बगावत छोड़ेंगे, समझेंगे; बूझे की नाही में…।

सवाल-1ः अनंत सिंह की बगावत का पूरा मामला क्या है?

जवाबः पटना स्नातक सीट पर जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने 3 बार के विधान पार्षद नीरज कुमार को प्रत्याशी बनाया है। इस सीट के अंदर 3 जिलों पटना, नालंदा और नवादा की 26 विधानसभा सीटें आती हैं।

मोकामा विधायक अनंत सिंह ने नीरज कुमार का खुला विरोध किया है। वे लगातार जनसुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह के साथ घूम रहे हैं और उनके लिए वोट मांग रहे हैं।

28 सितंबर को अनुज सिंह के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए अनंत सिंह ने कहा, ‘हमको उससे कोई मतलब नहीं है कि कौन लड़ रहा है। हम पूरी तरह से अनुज सिंह का समर्थन करेंगे। उनके लिए वोट मांगने पूरे इलाके में जाएंगे।’

अनंत सिंह ने आगे कहा, ‘आज तक हम हारे नहीं हैं। अनुज सिंह चुनाव भी जीत जाएंगे। मेरे लिए जनता ही भगवान है। वह हमें वोट देगी।’

7 सितंबर की बैठक में नहीं बनी थी बात

अनंत सिंह ने अनुज सिंह के समर्थन का ऐलान 3 सितंबर को ही कर दिया था। इसके बाद बिहार JDU अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने अनंत सिंह और नीरज कुमार में सुलह कराने के लिए 7 सितंबर को बैठक की। लेकिन बात नहीं बनी।

सवाल-2ः क्या JDU अनंत सिंह पर कार्रवाई करेगी?

जवाबः 50-50 चॉंसेज है। चूंकि यह पूरा मामला पार्टी के अंदर से ज्यादा अनंत सिंह और नीरज कुमार की निजी लड़ाई का है।

अनंत सिंह ने साफ कहा है, ‘यह चुनाव पार्टी के सिंबल पर नहीं लड़ा जा रहा है। मैं पार्टी नहीं, नीरज के खिलाफ हूं। नीरज ने चुनाव में हमारी मदद नहीं की है तो हम भी नहीं करेंगे।’

पार्टी भी अंदरखाने मानती है कि यह पार्टी के अंदर की नहीं, दो नेताओं की आपसी लड़ाई है। तब ही अभी तक पार्टी कार्रवाई करने के मूड में नहीं दिख रही है। पार्टी के बड़े नेता बहुत संभलकर बोल रहे हैं। इसकी तस्दीक 29 सितंबर के पार्टी के बड़े नेताओं के बयान से भी हो रही है। जैसे…

  • डिप्टी CM विजय चौधरी ने कहा, ‘जिस बात की चर्चा हो रही है, वह पार्टी के संज्ञान में है। हम उम्मीद करते हैं कि समय रहते इसे सुलझा लेंगे।’
  • बिहार JDU अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने कहा, ‘कौन क्या बोल रहा है, यह सब पार्टी देख रही है। सब कुछ हमारे संज्ञान में है।’
  • मंत्री श्रवण कुमार ने कहा, ‘अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच विवाद से जुड़ी पूरी जानकारी नीतीश कुमार के संज्ञान में डाल दी गई है। यह नहीं होना चाहिए, लेकिन ऐसा हो रहा है। इस मामले में पार्टी के बड़े नेता निर्णय लेंगे। क्या निर्णय लिया जाएगा, यह बाद में पता चलेगा।’
29 सितंबर को पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बिहार JDU अध्यक्ष उमेश कुशवाहा और मंत्री श्रवण कुमार ने मुलाकात की। उसके बाद अनंत सिंह मामले पर बयान जारी किया।

29 सितंबर को पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बिहार JDU अध्यक्ष उमेश कुशवाहा और मंत्री श्रवण कुमार ने मुलाकात की। उसके बाद अनंत सिंह मामले पर बयान जारी किया।

सवाल-3: पार्टी अनंत सिंह पर ज्यादा से ज्यादा क्या कार्रवाई कर सकती है?

जवाबः इस मामले में JDU के पास बहुत सीमित अधिकार है। वह मौटे तौर पर 3 बड़ी कार्रवाई कर सकती है।

  1. कारण बताओ नोटिस: सबसे पहले पार्टी अनुशासनहीनता और बगावत का आरोप लगाते हुए उनसे लिखित जवाब मांग सकती है।
  2. पार्टी से निलंबित: जवाब से संतुष्ट नहीं होने पर उनकी प्राथमिक सदस्यता निलंबित कर सकती है।
  3. पार्टी से निकाल सकती है: गंभीर बगावत साबित होने पर 6 साल या अनिश्चितकाल के लिए पार्टी से निकाल सकती है।

सवाल-4ः …तो क्या उनकी विधायकी जाएगी?

जवाबः नहीं, सिर्फ पार्टी से बगावत या निकाल देने से उनकी विधायकी नहीं जाएगी। दरअसल, संविधान में विधायकों की सदस्यता रद्द/खत्म करने का स्पष्ट प्रावधान है। मुख्य रूप से 3 तरीके से विधायकी खत्म होती है।

1. दल-बदल विरोधी कानून

संविधान की 10वीं अनुसूची कहती है कि किसी सदस्य की सदस्यता 3 स्थितियों में ही जा सकती है।

  1. जब कोई सदस्य अपनी पार्टी की सदस्यता इच्छा से छोड़ दे।
  2. जब कोई व्यक्ति पार्टी के व्हिप के खिलाफ वोट दे।
  3. चुनाव बाद निर्दलीय विधायक यदि किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाए।

धारा की व्याख्या में स्पष्ट लिखा है, ‘चुनाव में जिस राजनीतिक पार्टी ने किसी व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया था, वह उसी पार्टी का सदस्य माना जाएगा।’

सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट फैसला है…

  • सुप्रीम कोर्ट में दो अलग-अलग केसों (जी. विश्वनाथन और अमर सिंह) में स्पष्ट कहा है- ‘अगर पार्टी सांसद को निकाल भी दे तो भी वह मूल पार्टी का सदस्य माना जाता है, जब तक वह खुद दूसरी पार्टी जॉइन न कर ले। जॉइन करने पर ही डिफेक्शन लागू होता है।’
  • 2016 में अमर सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने अपना स्टैंड क्लियर करते हुए कहा था- पार्टी के निष्कासन से स्वतः अयोग्यता नहीं होती। सांसद अनअटैच्ड (स्वतंत्र/बिना किसी पार्टी के) के रूप में सदन में रहते हैं। अगर बाद में कोई नई पार्टी जॉइन या व्हिप तोड़ता है तो स्पीकर फैसला ले सकते हैं।

2. संवैधानिक रूप से अयोग्य होने पर

संविधान के ऑर्टिकल-191(1) के तहत…

  • लाभ का पद: यदि विधायक सरकार के तहत किसी ऐसे ‘लाभ के पद’ पर हो, जिसे कानूनन छूट न मिली हो।
  • मानसिक रूप से अस्वस्थ: यदि अदालत उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित कर दें।
  • दिवालियापन: यदि वह दिवालिया घोषित हो जाए।
  • नागरिकता छोड़ दे: यदि वह अपनी इच्छा से किसी दूसरे देश की नागरिकता ले लें।

3. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951

इस कानून की धारा 8 के तहत आपराधिक मामलों और चुनावी अपराधों के आधार पर सदस्यता रद्द होती है…

  • 2 साल या उससे अधिक की सजा: यदि किसी आपराधिक मामले में 2 साल या उससे अधिक की सजा हो जाए। इसके अलावा सजा पूरी होने के बाद अगले 6 साल तक वह चुनाव लड़ने के लिए भी अयोग्य रहता है।
  • चुनावी भ्रष्ट आचरण: चुनाव में भ्रष्ट आचरण (जैसे-रिश्वत देना, धर्म/जाति के नाम पर वोट मांगना, चुनाव खर्च की गलत जानकारी देना) का दोषी पाए जाने पर।
7 सितंबर को JDU ऑफिस में अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच सुलह कराने को लेकर पार्टी के सीनियर नेताओं ने दोनों के साथ बैठक की थी।

7 सितंबर को JDU ऑफिस में अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच सुलह कराने को लेकर पार्टी के सीनियर नेताओं ने दोनों के साथ बैठक की थी।

सवाल-5ः पार्टी से बगावत क्या अनंत सिंह को भारी पड़ेगा?

जवाबः राजनीतिक रूप से अनंत सिंह को कोई नुकसान होता नहीं दिख रहा है। क्योंकि वह खुद अगला चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। ऐसे में वह पार्टी में रहे या ना रहे, ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। हालांकि, उन्हें 2 तरह से दिक्कतें हो सकती है।

1. बढ़ सकता है कानूनी पचड़ा

चुनावी हलफनामे के मुताबिक, 65 वर्षीय अनंत सिंह पर 28 क्रिमिनल केस पेंडिंग हैं। पॉलिटिकल एनालिस्ट प्रियदर्शी रंजन कहते हैं, ‘सरकार के खिलाफ जाने का असर अनंत सिंह के कानूनी मामलों पर पड़ सकता है। ऐसा 2019 में हो चुका है।’

प्रियदर्शी रंजन कहते हैं, ‘2019 लोकसभा चुनाव में अनंत सिंह ने अपनी पत्नी नीलम देवी को मुंगेर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़वाया था। तब पार्टी के खिलाफ जाना उन्हें भारी पड़ा था। ऐसा इस बार नहीं होगा, कहना अभी मुश्किल है।’

हालांकि, अबकी बार 2 कारणों से पहले से अलग परिस्थितियां हैं…

  1. बिहार में नीतीश नहीं, BJP की सरकार है। मोकामा एरिया में अनंत सिंह का आधार भूमिहार समाज में ज्यादा है। यह समाज भाजपा का कोर वोटर है।
  2. केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह इस पूरे मामले पर अब तक चुप्प हैं। वह ना नीरज के साथ दिख रहे हैं और ना ही अनंत सिंह की बगावत को समर्थन दे रहे हैं। बताया जा रहा है कि वह इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

2. बेटे का फंस सकता है पॉलिटिकल करियर

नीरज कुमार भी नीतीश कुमार के करीबी नेताओं में से एक हैं। अगर उन्हें अनंत सिंह ने मदद नहीं की तो पार्टी में उनकी स्थिति कमजोर हो सकती है। वैसे अनंत सिंह ने अगला चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान किया है। वह अपने बेटे को चुनाव लड़वाएंगे। इसकी तैयारी भी कर रहे हैं।

ऐसे में अनंत सिंह की बगावत उनके बेटे के राजनीतिक करियर को फंसा सकता है। हालांकि, मोकामा में अनंत सिंह निर्दलीय भी चुनाव जीत चुके हैं। लेकिन ऐसा उनके बेटे के साथ होगा, पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता।

पॉलिटिकल एनालिस्ट प्रियदर्शी रंजन कहते हैं, ‘विधानसभा चुनाव में अभी कम से कम 4 साल का वक्त है। तब तक राजनीति में बहुत कुछ आगे हो चुका होगा। अनंत सिंह अपने बेटे के लिए कोई ना कोई रास्त जरूर निकाल लेंगे।’

बाहुबली विधायक अनंत सिंह अपने बेटे को राजनीति में लाने का ऐलान कर चुके हैं। उनके 3 बेटे हैं।

बाहुबली विधायक अनंत सिंह अपने बेटे को राजनीति में लाने का ऐलान कर चुके हैं। उनके 3 बेटे हैं।

सवाल-6ः क्या कार्रवाई के डर से अनंत सिंह बगावत का रास्ता छोड़ेंगे?

जवाबः इसकी संभावना बेहद कम है। अनंत सिंह की राजनीति को देखें तो साफ है कि वह बिना लाग लपेट वाले नेता हैं। उन्होंने एक बार मन बना लिया तो वह अपने निर्णय से पीछे नहीं हटते हैं, चाहे रिजल्ट कुछ भी हो।

पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह कहते हैं, ‘उन्होंने अपनी छवि एक ‘बाहुबली’ और ‘स्वतंत्र जनाधार’ वाले नेता के रूप में बनाई है। मोकामा क्षेत्र में वे पार्टी के सिंबल से ज्यादा अपने व्यक्तिगत प्रभाव के बल पर चुनाव जीतते आए हैं।

वे 2015 विधानसभा चुनाव में निर्दलीय और 2020 में RJD के टिकट जीत दर्ज कर चुके हैं। इसलिए कम संभावना है कि वह अब अपना फैसला बदलेंगे।’



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