2 मिनट पहले
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फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने नेस्ले इंडिया के खिलाफ बच्चों के खाने-पीने के प्रोडक्ट्स और उनके विज्ञापनों में गड़बड़ी पाए जाने पर कार्रवाई की है।
FSSAI ने इंस्टाग्राम पर नोटिस जारी कर बताया कि कंपनी के बेबी फूड्स में पोषक तत्वों (न्यूट्रिएंट्स) की कमी और भ्रामक दावों को लेकर 3 अलग-अलग केस दर्ज किए गए हैं।
इस पूरे मामले को सवाल-जवाब समझें …
सवाल 1: FSSAI ने नेस्ले इंडिया पर क्या कार्रवाई की है?
जवाब: FSSAI ने ई-कॉमर्स साइट्स पर बिकने वाले नेस्ले के बच्चों के प्रोडक्ट्स और उनके प्रचार-प्रसार के विज्ञापनों की जांच की थी। जांच में पाया गया कि कंपनी नियमों का पालन नहीं कर रही थी और विज्ञापनों में ऐसे दावे कर रही थी जो कानून के खिलाफ हैं।
सवाल 2: नेस्ले के किन प्रोडक्ट्स पर सवाल उठे हैं?
जवाब: FSSAI की जांच के दायरे में नेस्ले इंडिया के तीन मुख्य प्रोडक्ट्स हैं…
- नान एक्सीला प्रो स्टेज 1: इस पर किए गए पोषण संबंधी दावों पर आपत्ति है।
- लैक्टोजेन प्रो 1: इसके वे प्रोटीन को पचने में आसान बताने वाले दावा पर आपत्ति।
- फॉलो-अप फॉर्मुला: इसके लैब टेस्ट में आवश्यक पोषक तत्व ‘बायोटिन’ की मात्रा कम पाई गई।
सवाल 3: नान एक्सीला प्रो और लैक्टोजेन प्रो 1 पर FSSAI को क्या आपत्ति थी?
जवाब: नान एक्सीला प्रो स्टेज 1 के पैक और विज्ञापनों पर 5 HMOs और वे प्रोटीन जैसे दावे लिखे गए थे। वहीं, लेक्टोजन प्रो लैक्टोजेन प्रो 1 पर लिखा गया था कि इसमें मौजूद वे प्रोटीन ‘आसानी से पचने योग्य’ है। FSSAI के मुताबिक, इस तरह के दावे उत्पाद की बिक्री बढ़ाने के मकसद से प्रचार के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे थे।
सवाल 4: इन दावों से सुरक्षा मानकों या कानून का उल्लंघन कैसे हुआ?
जवाब: जवाब: FSSAI ने जब नेस्ले के जवाब की समीक्षा की, तो पाया कि कंपनी दो बड़े नियमों को तोड़ रही थी:
- बिक्री बढ़ाने वाले दावों पर रोक (नियमावली 2020): फूड सेफ्टी के नियम कहते हैं कि बच्चों के खाने-पीने की चीजें बेचने के लिए आप आसानी से पचता है या सुपर न्यूट्रिशन जैसे लुभावने प्रचार नहीं कर सकते। FSSAI के मुताबिक, नेस्ले यही नियम तोड़कर अपने प्रोडक्ट्स का प्रचार कर रही थी।
- विज्ञापन पर पूरी पाबंदी (IMS एक्ट, 1992): भारत में 1992 का एक सख्त कानून है, जो 2 साल तक के बच्चों के दूध या बेबी फूड के किसी भी तरह के विज्ञापन, टीवी-इंटरनेट पर प्रचार या बड़े-बड़े दावों पर पूरी तरह रोक लगाता है। इसका मकसद यह है कि लोग विज्ञापनों के झांसे में आकर मां के दूध का विकल्प न तलाशने लगें। नेस्ले के इन विज्ञापनों से इसी कानून की धारा 3 का उल्लंघन हुआ।
सवाल 5: लैब टेस्ट में प्रोडक्ट में क्या खराबी पाई गई?
जवाब: FSSAI ने जब नेस्ले के ‘फॉलो-अप फॉर्मूला’ यानी बच्चों के दूध का पाउडर के सैंपल की लैब में जांच कराई, तो उसमें बच्चों की सेहत के लिए जरूरी ‘बायोटिन’ (विटामिन B7) सरकारी मानकों से काफी कम मिला।
इस नतीजे की पक्की पुष्टि के लिए सैंपल को दोबारा एक बड़ी और स्वतंत्र लैब (रेफरल लैब) में भेजा गया। दूसरी जांच में भी यह बात साबित हो गई कि प्रोडक्ट में बायोटिन की मात्रा तय नियमों से कम थी और यह खराब क्वालिटी का था।
सवाल 6: क्या नेस्ले इंडिया पर कोई जुर्माना या पेनल्टी लगाई गई?
जवाब: नहीं, FSSAI के नोटिस के अनुसार अभी कंपनी पर कोई अंतिम जुर्माना या पेनल्टी नहीं लगाई गई है। FSSAI ने फिलहाल 3 केस दर्ज करके कानूनी प्रक्रिया शुरू की है।
अब इस मामले की अदालती कार्रवाई होगी, जिसके बाद ही तय होगा कि कंपनी पर कितना जुर्माना या क्या कार्रवाई होगी।
सवाल 7: इस कार्रवाई पर नेस्ले इंडिया का क्या पक्ष या बयान आया है?
जवाब: नेस्ले इंडिया ने इस नोटिस या दर्ज मामलों को लेकर शेयर बाजार या सार्वजनिक रूप से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।
सवाल 8: आम उपभोक्ताओं और अभिभावकों पर इस खबर का क्या असर पड़ेगा?
जवाब: शिशु आहार का मामला होने के कारण यह सीधे तौर पर छोटे बच्चों की सेहत से जुड़ा है। FSSAI का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कंपनियां माता-पिता को विज्ञापनों के जरिए गुमराह न करें और शिशु आहार में सभी जरूरी पोषक तत्व तय मात्रा के अनुसार ही उपलब्ध हों।

