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Pakistan India Agra Summit Story; Pervez Musharraf LK Advani – AB Vajpayee


दैनिक भास्कर की सीरीज ‘पावर प्ले’ में इस बार पढ़ें भारत-पाकिस्तान की आगरा समिट फेल होने की कहानी…

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मई 2001 की एक दोपहर। दिल्ली की गर्मी अपने चरम पर थी। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के आवास पर कोई बड़ी बैठक नहीं थी- बस एक साधारण सा लंच, जिसमें दो मेहमान थे- गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और विदेश मंत्री जसवंत सिंह।

दरअसल, कारगिल युद्ध के करीब एक साल बाद अगस्त 2000 में वाजपेयी कश्मीर पहुंचे और घाटी की नुमाइंदगी करने वाले हर समूह से बात करने की पेशकश की। नवंबर में रमजान से ठीक पहले उन्होंने उग्रवाद के खिलाफ एकतरफा संघर्ष विराम का ऐलान कर दिया।

छह महीने पुराना वह संघर्षविराम अब खत्म होने वाला था। वाजपेयी हफ्तों से आडवाणी और जसवंत के सामने एक ही सवाल दोहरा रहे थे- ‘अब आगे क्या करना चाहिए?’ आज भी उन्होंने वही सवाल दोहराया।

आडवाणी ने चम्मच नीचे रखी और सीधे प्रस्ताव दिया- ‘अटलजी, आप जनरल मुशर्रफ को बातचीत के लिए भारत क्यों नहीं बुला लेते? लाहौर बस यात्रा की पहल भले ही नाकाम रही, पर देश-दुनिया में खूब सराही गई थी। मुशर्रफ को न्योता देना भी एक बड़े राजनेता की पहल मानी जाएगी।’

कमरे में कुछ पल खामोशी छाई। जसवंत ने सहमति में सिर हिलाया। वाजपेयी भी मान गए।

दरअसल, आडवाणी कुछ समय से एक सीनियर पाकिस्तानी डिप्लोमैट के संपर्क में थे। उन्हें पता था कि नवाज शरीफ का तख्तापलट कर सत्ता में आए मुशर्रफ, अलग-थलग पड़े पाकिस्तान को मुख्यधारा में लाना चाहते हैं, और इसके लिए भारत से बातचीत को तैयार हैं।

लालकृष्ण आडवाणी ने आत्मकथा ‘My country My life’ में अटल बिहारी के आवास पर इस लंच का जिक्र किया है।

दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास पर लंच के दौरान पीएम अटल बिहारी वाजपेयी, गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और विदेश मंत्री जसवंत सिंह। - AI जनरेटेड

दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास पर लंच के दौरान पीएम अटल बिहारी वाजपेयी, गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और विदेश मंत्री जसवंत सिंह। – AI जनरेटेड

23 मई 2001, नई दिल्ली। शाम को प्रधानमंत्री आवास पर कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक हुई। मेज पर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। उनके साथ गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश और रक्षा मंत्री जसवंत सिंह, वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा, केसी पंत, NSA ब्रजेश मिश्र और सेना प्रमुख जनरल पद्मनाभन मौजूद थे।

सोनिया गांधी और सहयोगी दलों के नेताओं चंद्रबाबू नायडू, बाल ठाकरे और जॉर्ज फर्नांडीस को पहले ही भरोसे में लिया जा चुका था।

आडवाणी जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला से भी बात कर चुके थे। यानी CCS में अब सिर्फ फैसले पर औपचारिक मुहर लगनी बाकी थी।

एजेंडा पढ़ा गया- ‘पाकिस्तान के राष्ट्रपति को भारत आने का न्योता’।

सभी ने सहमति से सिर हिला दिया।

बाहर आकर जसवंत सिंह ने कहा कि ‘कंपोजिट डायलॉग’ के लिए पाकिस्तान को जल्द औपचारिक न्योता भेजा जाएगा

उसी शाम रेडियो पाकिस्तान के हवाले से विदेश सचिव इनामुल हक ने कहा कि न्योता मिलते ही पाकिस्तान सकारात्मक जवाब देगा।

25 मई को चिट्ठी इस्लामाबाद पहुंची…

भारत के कार्यवाहक उच्चायुक्त सुधीर व्यास ने वाजपेयी की चिट्ठी पाकिस्तान के विदेश सचिव इनामुल हक को सौंपी। चिट्ठी में वाजपेयी ने मुशर्रफ और बेगम मुशर्रफ को जल्द आने को कहा। 29 मई को पाकिस्तान के उच्चायुक्त अशरफ जहांगीर काजी ने मुशर्रफ की चिट्ठी भारत के विदेश सचिव चोकिला अय्यर को सौंपी।

न्योता स्वीकार हुआ, लेकिन लहजा अलग था। वाजपेयी की चिट्ठी में किसी विवादित मुद्दे का जिक्र नहीं था, जबकि मुशर्रफ ने कश्मीर को दोनों देशों के तनाव की जड़ बताया और बाकी मुद्दों पर भी बातचीत के लिए तैयार होने की बात कही।

करीब डेढ़ महीने बाद 14 जुलाई, 2001 को सुबह हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। आसमान में बादल आंख-मिचौली खेल रहे थे। तभी पालम हवाई अड्डे पर पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस (PIA) का विशेष बोइंग 737-300 उतरा।

कॉकपिट की खिड़कियों पर दो झंडे थे: दाईं ओर भारत का तिरंगा और बाईं तरफ पाकिस्तान का झंडा।

मुशर्रफ पत्नी सहबा के साथ बाहर निकले। उस दिन वे वर्दी में नहीं, सफेद पोशाक में थे।

हवाई अड्डे पर पाकिस्तान के उच्चायुक्त अशरफ जहांगीर काजी ने पत्रकारों से कहा कि उनका रुख सकारात्मक है।

मुशर्रफ बुलेटप्रूफ लग्जरी लिमोजीन कार में राष्ट्रपति भवन पहुंचे। वहां राष्ट्रपति केआर नारायणन ने उनका स्वागत किया और उनके ठहरने का इंतजाम भी वहीं था।

पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइन्स (पीआईए) के विमान से दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर पत्नी सहबा मुशर्रफ के साथ दिल्ली पहुंचे राष्ट्रपति मुशर्रफ।

पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइन्स (पीआईए) के विमान से दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर पत्नी सहबा मुशर्रफ के साथ दिल्ली पहुंचे राष्ट्रपति मुशर्रफ।

राष्ट्रपति भवन में सबसे पहले मुशर्रफ से मिलने गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी पहुंचे।

बातचीत की शुरुआत एक इत्तेफाक से हुई। आडवाणी और मुशर्रफ, दोनों कराची के एक ही स्कूल, सेंट पैट्रिक्स में पढ़े थे।

आडवाणी ने कहा- ‘जनरल, आप दिल्ली में जन्मे, 53 साल बाद लौटे हैं। मैं कराची में जन्मा, बंटवारे के बाद सिर्फ एक बार, वो भी बहुत कम वक्त के लिए वहां गया था।

हमारे जैसे लाखों परिवार हैं, जो हमारे जितना खुशकिस्मत नहीं। आधी सदी बाद भी हमारे बीच यह फासला क्यों?’

मुशर्रफ ने कहा- ‘बिल्कुल, हमें इसका समाधान खोजना चाहिए। आपके पास क्या सुझाव है?’

आडवाणी ने कहा- ‘भरोसा’।

‘दोनों देशों के बीच एक-दूसरे पर भरोसा पैदा होना चाहिए।’

आडवाणी ने बात मोड़ी- ‘अभी हाल ही में तुर्की से लौटा हूं, जहां एक प्रत्यर्पण संधि पर साइन करके आया हूं। मुझे पता है, मिस्टर जनरल तुर्की आपके लिए खास है।’

मुशर्रफ ने तपाक से कहा- ‘हां, बचपन वहीं बीता है, अब्बा की पोस्टिंग थी, फर्राटेदार तुर्की बोल सकता हूं।’

आडवाणी ने बात आगे बढ़ाई- ‘पर सोचिए, भारत-तुर्की के बीच प्रत्यर्पण संधि की क्या जरूरत? ऐसी संधि जरूरत तो भारत-पाकिस्तान को है।’

मुशर्रफ ने कहा- ‘हां, क्यों नहीं।’

मुशर्रफ को अंदाजा नहीं था कि बात किधर मुड़ने वाली है।

आडवाणी बिना मौका गंवाए बोले- ‘आगरा में औपचारिक बातचीत से पहले अगर आप 1993 के बंबई बम धमाकों के आरोपी दाऊद इब्राहिम को हमें सौंप दें, तो यह शांति वार्ता के लिए बड़ा कदम होगा। दाऊद आपके कराची में रहता है।’

आडवाणी की बात सुनकर मुशर्रफ तमतमा उठे।

उन्होंने तल्खी से कहा- ‘मिस्टर आडवाणी, यह एक छोटी चाल है।’

कमरे का माहौल बदल गया। एक तरफ 5 भारतीय अधिकारी, दूसरी तरफ इतने ही पाकिस्तानी अधिकारी, सब खामोश।

आडवाणी ने फिर आपसी भरोसे की बात दोहराई।

मुशर्रफ ने सख्ती से जवाब दिया- ‘दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान में नहीं है।’

आडवाणी अपनी किताब में लिखते हैं- ‘यह वैसा ही झूठ था, जो पाकिस्तान बरसों से अमेरिकियों को ओसामा बिन लादेन के बारे में बोलता रहा था।

एक पाकिस्तानी अधिकारी, जो इस बैठक में था, कुछ सालों बाद एक मुलाकात में उसने मुझसे कहा- मुशर्रफ ने उस दिन दाऊद इब्राहिम के बारे में ‘सफेद झूठ’ बोला था।’

लालकृष्ण आडवाणी के प्रस्ताव से तमतमाए पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ।- AI जनरेटेड

लालकृष्ण आडवाणी के प्रस्ताव से तमतमाए पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ।- AI जनरेटेड

दाऊद की मांग ने मुशर्रफ का मूड बिगाड़ा…

उसी रात मुशर्रफ बातचीत के लिए आगरा निकल पड़े। दाऊद को भारत को सौंपने की मांग का असर आगरा तक बना रहा। अगले दो दिनों तक मुशर्रफ का मिजाज उखड़ा ही रहा।

आगरा के पांच सितारा होटल अमरविलास के गेट पर मुशर्रफ का काफिला रुका। एक ऐसा होटल, जिसके हर कमरे की खिड़की से ताजमहल दिखता है। मानो मोहब्बत की उस पहचान की छांव में एक नई कहानी लिखी जानी हो।

अटल और उनकी टीम कुछ किलोमीटर दूर जेपी पैलेस होटल में ठहरी थी।

15 जुलाई की सुबह। धीरे-धीरे तेज होती धूप जेपी पैलेस होटल की खिड़कियों पर पड़ रही थी। आगरा की हवा में जुलाई की उमस के साथ कुछ बड़ा तय होने की सुगबुगाहट घुली थी। अचानक होटल के गलियारों में सुरक्षा अधिकारियों के कदमों की आहट तेज होने लगी।

कुछ देर बाद बैठक शुरू हो गई। कमरे में एक तरफ अटल की टीम, दूसरी तरफ मुशर्रफ की। मेज के बीच में फूलदान और पानी के गिलास सजे थे।

होटल जेपी पैलेस- आगरा समिट 2001 में मुशर्रफ का स्वागत करते अटल बिहारी वाजपेयी और साथ में विदेश मंत्री जसवंत सिंह (बीच में) लालकृष्ण आडवाणी (सबसे दाएं) सोर्स- इंडिया टुडे।

होटल जेपी पैलेस- आगरा समिट 2001 में मुशर्रफ का स्वागत करते अटल बिहारी वाजपेयी और साथ में विदेश मंत्री जसवंत सिंह (बीच में) लालकृष्ण आडवाणी (सबसे दाएं) सोर्स- इंडिया टुडे।

अटल ने नपे-तुले अंदाज में अपनी बात रखनी शुरू की- ‘हम कश्मीर सहित हर मुद्दे पर बात करने को तैयार हैं। हम इनकार नहीं करते कि हमारे बीच इस मुद्दे पर गहरे मतभेद हैं। लेकिन इसके लिए एक अनुकूल माहौल चाहिए।

सीमा पार से भड़काई जा रही आतंकी हिंसा, वह माहौल बनने नहीं देती। कोई यह न समझे कि भारत के पास आतंकवाद और हिंसा के विरोध का संकल्प, ताकत या धैर्य नहीं है। हम पूरी मजबूती से आतंकियों को जवाब देते रहेंगे।

जम्मू-कश्मीर पर हमारे बीच मतभेदों को दूर करने में सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा शामिल होना ही चाहिए।’

अटल की आवाज और सख्त हुई- ‘हम जानते हैं, कुछ आतंकवादी, कुछ अपराधी, 1993 के मुंबई बम धमाकों के दोषी, भारतीय विमान अपहरण के गुनहगार पाकिस्तान में बैठे हैं। उन्हें गिरफ्तार कर हमें सौंपा और अदालत के कठघरे में खड़ा किया ही जाना चाहिए।’

मेज के दूसरी तरफ बैठे मुशर्रफ की आंखों में कोई हलचल नहीं थी।

मुशर्रफ ने कहा- ‘सीमा-पार आतंकवाद के लिए पाकिस्तान को सीधे तौर पर दोषी ठहराना हमारे लिए संभव नहीं। कश्मीर ही मुख्य समस्या है। हम इसे ‘dispute’ की जगह ‘issue’ कह सकते हैं, लेकिन मेरे लिए कश्मीर एक ‘dispute’ है।’

बातचीत का पहला दौर खत्म हुआ…

दोनों देशों ने आपसी सहमति से एक साझा घोषणापत्र जारी करने का फैसला किया। भारत के विदेश मंत्री जसवंत सिंह और पाकिस्तान के विदेश मंत्री अब्दुल सत्तार ने इस मसौदे को तैयार किया।

15 जुलाई की शाम प्रधानमंत्री वाजपेयी ने CCS की एक और बैठक बुलाई। मसौदे पर चर्चा हुई, लेकिन इसमें ‘सीमा-पार आतंकवाद’ का एक बार भी जिक्र नहीं था। 1972 का शिमला समझौता और 1999 का लाहौर घोषणापत्र का जिक्र भी गायब था।

आडवाणी के विरोध के बाद पाकिस्तानी पक्ष तक यह संदेश पहुंचा दिया गया कि शिमला और लाहौर समझौता, यही दो पत्थर हैं जिन पर बातचीत की पूरी इमारत खड़ी होनी है। इन्हें मसौदे से हटाया नहीं जा सकता।

अब दोनों ओर से मसौदा फिर से गढ़ने की कवायद शुरू हुई। रातभर अफसर जुटे रहे। घड़ी की सुइयां आगे बढ़ती रहीं। सुबह के साढ़े 4 बज गए।

16 जुलाई की सुबह…। मुशर्रफ को एहसास हो गया- वे खाली हाथ लौटेंगे। ‘आगरा घोषणापत्र’ जैसा कुछ भी उनके साथ पाकिस्तान जाने वाला नहीं।

अब मुशर्रफ ने दूसरा दांव खेला…

उन्होंने भारत के करीब 35 जाने-माने पत्रकारों को सुबह के नाश्ते पर होटल बुला लिया। एक घंटे बातचीत चली। दूसरी ओर, अटल की टीम यह नजारा टीवी पर देख रही थी।

मुशर्रफ ने कहा- ‘हम इस भ्रम में न रहें कि हमारी ‘मुख्य समस्या’ कश्मीर नहीं है। हम बाकी सभी मुद्दों पर तभी बात कर सकते हैं, जब पहले मुख्य कश्मीर मुद्दे को सुलझा लिया जाए। इसके बिना आर्थिक, व्यापारिक और विश्वास-बहाली के कदम आगे नहीं बढ़ सकते।

आप मेरे यहां जिसे आतंकवाद कहते हैं, हम उसे स्वतंत्रता संघर्ष कहते हैं।’

इधर, वाजपेयी के निजी सचिव अजय बिसारिया कागज के कुछ पन्ने लेकर पहुंचे। पन्नों में मुशर्रफ की मीडिया से बातचीत की ट्रांसक्रिप्ट थी।

आडवाणी अपनी किताब में लिखते हैं- मुशर्रफ की मीडिया पर बातों की बमबारी को देखते हुए मैंने खुद से कहा- ‘कोई हैरानी नहीं कि जनरल मुशर्रफ मसौदे में सीमा-पार आतंकवाद का जिक्र तक नहीं चाहते।’

उसके बाद अपने होटल से मुशर्रफ आए और जेपी पैलेस में दिनभर बातचीत चली।

लेकिन शाम होते-होते बात साफ हो गई- कोई ‘आगरा घोषणापत्र’ नहीं निकलेगा।’

और हुआ भी यही। दो दिन की बातचीत के बाद सबकुछ पहले जैसा ही था।

उधर, वाजपेयी से आखिरी मुलाकात के बाद नाराज मुशर्रफ ने अजमेर शरीफ जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया। 16 जुलाई की देर रात बिना किसी ‘आगरा घोषणापत्र’ के सीधे इस्लामाबाद लौट गए।

आगरा समिट के दौरान मुशर्रफ और अटल बिहारी वाजपेयी की आखिरी मुलाकात। सोर्स- द टेलिग्राफ।

आगरा समिट के दौरान मुशर्रफ और अटल बिहारी वाजपेयी की आखिरी मुलाकात। सोर्स- द टेलिग्राफ।

समिट के अंत में जसवंत सिंह से प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक पत्रकार ने पूछा- क्या भारत सरकार ने मुशर्रफ और उनकी पत्नी को अजमेर जाने से रोका।

जवाब बिल्कुल चुटीला था- ‘मेरी क्या औकात कि मैं उन्हें गरीब नवाज के पास जाने से रोकूं। कहते हैं, जब तक गरीब नवाज का हुक्म नहीं होता, कोई वहां नहीं जा सकता।’

बाद में राज्यसभा में मजाकिया अंदाज में अटल ने कहा- ‘अतिथि भी अपने कर्मों के हिसाब से मिलता है, हमारे कर्म ही ऐसे थे कि हमें मुशर्रफ मिले।’

उस वक्त रॉ चीफ एएस दुलत अपनी किताब ‘Kashmir The Vajpayee Years’ में इस पूरी बातचीत में पीछे से शामिल पाकिस्तानी राजनयिक अशरफ काजी के हवाले से लिखते हैं-

‘आगरा समिट की नाकामी की असली वजह आडवाणी और मुशर्रफ के बीच राष्ट्रपति भवन की वह मुलाकात थी, जिसने पूरा माहौल बिगाड़ दिया।

उस मुलाकात में आडवाणी ने दाऊद इब्राहिम को सौंपने की मांग रख दी, जिसने मुशर्रफ को झटका दिया। उसके बाद पूरे आगरा समिट पर एक साया मंडराता रहा।

बाद में जनरल मुशर्रफ के करीबी राशिद कुरैशी ने आडवाणी को ‘हिडेन हैंड’ कहते हुए, उन्हें आगरा समिट को नाकाम करने वाला बताया।

भारत यात्रा के पांच साल बाद, अगस्त 2006 में मुशर्रफ की किताब In the Line of Fire आई।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, मुशर्रफ ने लिखा- ‘वाजपेयी से आखिरी मुलाकात में मैंने कहा था कि हम दोनों से ऊपर कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसके पास हमें रोकने या हमारी बात पलटने का अधिकार है। मैंने वाजपेयी से कहा कि आज हम दोनों को अपमानित होना पड़ा है।’

किताब में उन्होंने आडवाणी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन इशारा में कहा- ‘एक हार्डलाइनर नेता आगरा समिट की नाकामी के जिम्मेदार थे।’

बाद में आडवाणी ने अपनी किताब में लिखा- ‘मुशर्रफ का इशारा मेरी ओर था।’

एएस दुलत अपनी किताब में लिखते हैं- ‘बाद में आगरा समिट की नाकामी पर अफसोस जाहिर करते हुए उस बातचीत में मौजूद अटल के प्रधान सचिव और NSA ब्रजेश मिश्रा ने मुझसे कहा था- ‘यार, होते-होते रह गया… हो गया था, वो तो।’

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रेफरेंस:

1- My Country My Life: Book by L. K. Advani

2- Kashmir: The Vajpayee Years: Book by A. S. Dulat and Aditya Sinha

3- In the Line of Fire: A Memoir Book by Pervez Musharraf

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जून 1985 का एक दिन। दिल्ली का पांच सितारा अशोका होटल।

समय- दोपहर के करीब 2 बजे। होटल की पांचवीं मंजिल पर अचानक हलचल बढ़ गई। गलियारे को एसपीजी जवानों ने घेर लिया। आने-जाने वाले हर शख्स पर नजर। सबसे ज्यादा सुरक्षा कमरा नंबर- 518 के आसपास। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें



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