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सुखना झील के संरक्षण के सीमित योजना काफी नहीं: भूपेंद्र:बोले- कैचमेंट, जल प्रवाह, ड्रेनेज और प्रदूषण के स्रोतों को साथ लेकर हो एकीकृत प्लान




केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि चंडीगढ़ की सुखना झील समेत देश की महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए सिर्फ झील तक सीमित योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए पूरे कैचमेंट क्षेत्र, जल प्रवाह, जल निकासी और प्रदूषण के स्रोतों को ध्यान में रखते हुए एकीकृत वेटलैंड मैनेजमेंट प्लान तैयार करना होगा। चंडीगढ़ में रविवार को आयोजित 16वें नेशनल मीट ऑफ स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड्स एंड यूटी बायोडायवर्सिटी काउंसिल्स के उद्घाटन सत्र में केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सुखना जैसी आर्द्रभूमियां केवल जलाशय नहीं हैं, बल्कि आसपास के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनरेखा हैं। इसलिए इनके संरक्षण के लिए कैचमेंट क्षेत्र, जल निकासी, प्रदूषण के स्रोत और पर्यावरणीय प्रवाह को एक साथ देखना जरूरी है। सुखना के कैचमेंट पर विशेष ध्यान जरूरी भूपेंद्र यादव ने सुखना झील का उदाहरण देते हुए कहा कि वेटलैंड का संरक्षण उसके आसपास के क्षेत्र से अलग करके नहीं किया जा सकता। झील में पहुंचने वाले पानी की गुणवत्ता, कैचमेंट क्षेत्र में होने वाली गतिविधियां और प्राकृतिक जल प्रवाह सीधे झील की पारिस्थितिकी को प्रभावित करते हैं। ऐसे में संरक्षण योजनाओं में स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी सुनिश्चित करनी होगी। उन्होंने हिमाचल प्रदेश की रेणुका आर्द्रभूमि समेत देश की प्रमुख वेटलैंड के लिए भी इसी तरह की समग्र रणनीति अपनाने पर जोर दिया। जैव विविधता संरक्षण को पूरे लैंडस्केप तक ले जाने पर जोर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जैव विविधता संरक्षण को अब केवल राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों की सीमाओं तक सीमित रखने की जरूरत नहीं है। इसे पूरे लैंडस्केप और पारिस्थितिकी तंत्र के स्तर पर ले जाना होगा। इससे विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों के बीच पारिस्थितिक कनेक्टिविटी बनाए रखने में मदद मिलेगी। पर्यटन और संरक्षण के बीच संतुलन जरूरी यादव ने कहा कि चिल्का, सांभर और देश की अन्य महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों की तरह सुखना के लिए भी वैज्ञानिक और एकीकृत प्रबंधन जरूरी है। वेटलैंड संरक्षण को पर्यटन से जोड़ा जा सकता है, लेकिन पर्यटन गतिविधियां इतनी नहीं बढ़नी चाहिएं कि झील, वन्यजीव या उसकी पारिस्थितिक कनेक्टिविटी पर दबाव पड़े।



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