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दुखी किसान ने देवी से क्यों नहीं मांगा धन:प्रेरक कथा- हर एक इच्छा पूरी करने के लिए बेचैन रहना सही नहीं है; मन में संतोष होगा, तो सुख-शांति बनी रहेगी




जो लोग हमेशा असंतुष्ट रहते हैं, उनका मन कभी भी शांत नहीं हो पाता। सुख-शांति केवल धन-संपत्ति से नहीं, बल्कि मन की संतुष्टि से मिलती है। यह बात एक लोक कथा से समझ सकते हैं- पुराने समय में एक किसान गरीबी के कारण बहुत परेशान था। एक दिन उसके गांव में एक संत आए। किसान उनके पास पहुंचा और अपनी परेशानियां बताईं। संत ने उसे एक मंत्र बताया और जप करने की विधि समझाई। किसान पूरी श्रद्धा से मंत्र का जप करने लगा। कुछ दिनों बाद उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर एक देवी उसके सामने प्रकट हुईं। देवी ने कहा, “मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं। तुम जो चाहो, मुझसे वरदान मांग सकते हो।” किसान सोच में पड़ गया। उसने कहा, “देवी, मैं अभी तय नहीं कर पा रहा हूं। क्या मैं कल आपसे वरदान मांग सकता हूं?” देवी ने सहमति दी और अंतर्ध्यान हो गईं। देवी के जाने के बाद किसान के मन में विचारों का सिलसिला शुरू हो गया। उसने सोचा, “मेरे पास अच्छा घर नहीं है, मुझे घर मांगना चाहिए।” फिर विचार आया, “जमींदार के पास बहुत शक्ति होती है, मुझे जमींदार बनने का वरदान मांगना चाहिए।” अगले ही पल उसने सोचा, “राजा तो जमींदार से भी अधिक शक्तिशाली होता है, मुझे राजा बनने का वरदान मांगना चाहिए।” इन विचारों में पूरा दिन निकल गया। रात को भी किसान सो नहीं पाया। सुबह देवी फिर प्रकट हुईं और वरदान मांगने को कहा। इस बार किसान ने कहा, “देवी, मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मेरा मन हमेशा भगवान की भक्ति में लगा रहे और मैं हर परिस्थिति में संतुष्ट रहूं।” देवी ने प्रसन्न होकर कहा, “तथास्तु।” देवी ने पूछा, “तुमने धन-दौलत या राज-पाट क्यों नहीं मांगा?” किसान ने उत्तर दिया, “देवी, मेरे पास धन नहीं था, फिर भी धन मिलने की कल्पना ने ही मेरा मन अशांत कर दिया। मैं दिनभर तनाव में रहा और रात को सो नहीं सका। इसलिए मुझे ऐसा धन नहीं चाहिए, जो मेरे जीवन की सुख-शांति छीन ले।” कथा का संदेश है- जरूरतें पूरी करें, लेकिन हर इच्छा पूरी करने के लिए बेचैन रहना सही नहीं है। सच्ची समृद्धि वह है, जिसमें उपलब्ध चीजों के प्रति कृतज्ञता का भाव और मन में संतोष हो। प्रसंग की सीख



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