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मानसा के गांव फत्ता मालोका के रोइंग खिलाड़ी सतनाम सिंह ने एशियन गेम्स में भारत के लिए कांस्य पदक जीता है। सतनाम सिंह और सलमान खान की भारतीय जोड़ी ने जापान के आइची-नागोया स्थित नागारागावा इंटरनेशनल रेगाटा कोर्स में मेंस डबल स्कल्स के फाइनल में 6 मिनट 13.25 सेकंड का समय निकालकर तीसरा स्थान हासिल किया। भारतीय जोड़ी रेस के शुरुआती चरण में पदक की मजबूत दावेदार बनी रही। सतनाम और सलमान 500, 1000 और 1500 मीटर तक दूसरे स्थान पर थे। अंतिम 500 मीटर में उज्बेकिस्तान की जोड़ी ने रफ्तार बढ़ाकर भारत को पीछे छोड़ दिया। चीन की जोड़ी ने स्वर्ण, उज्बेकिस्तान ने रजत और भारत ने कांस्य पदक हासिल किया। पिता अमरीक सिंह के अनुसार पदक जीतने की खबर मिलने के बाद परिवार में खुशी का माहौल है। उन्होंने कहा कि बेटे की मेहनत रंग लगाई है। डबल स्कल्स में भारत का पहला एशियन गेम्स पदक
सतनाम-सलमान की यह जीत भारतीय रोइंग के लिए रिकॉर्ड है। मेंस डबल स्कल्स में यह एशियन गेम्स के इतिहास में भारत का पहला पदक है। सतनाम के लिए यह लगातार दूसरा एशियन गेम्स पदक है। हांगझोउ एशियन गेम्स में सतनाम भारतीय टीम के साथ मेंस क्वाड्रपल स्कल्स में कांस्य पदक जीत चुके हैं। हांगझोउ एशियन गेम्स का आयोजन 2022 के नाम से हुआ था, लेकिन कोविड के कारण प्रतियोगिता 2023 में आयोजित की गई थी। सलमान खान के लिए यह एशियन गेम्स का पहला पदक है। वहीं, सतनाम ने अपने एशियन गेम्स पदकों की संख्या दो कर ली है। छठी कक्षा से रोइंग, 2017 में स्वर्ण सिंह विरक ने दिखाई नई राह
सतनाम ने छठी कक्षा में रोइंग शुरू की थी। इससे पहले वह हैंडबॉल से जुड़े थे। परिवार के अनुसार, वर्ष 2017 में एशियन गेम्स पदक विजेता स्वर्ण सिंह विरक फत्ता मालोका पहुंचे थे। सतनाम की लंबी कद-काठी और खेल क्षमता को देखते हुए उन्होंने उन्हें रोइंग अपनाने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद सतनाम ने रोपड़ की रोइंग अकादमी में प्रशिक्षण लिया। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 2018 यूथ ओलिंपिक में भी वह भारतीय टीम का हिस्सा रहे। सीनियर स्तर पर उन्होंने हांगझोउ एशियन गेम्स में क्वाड्रपल स्कल्स में कांस्य जीता और अब आइची-नागोया में डबल स्कल्स में पदक हासिल किया। मां ने सिलाई कर संभाला घर, पिता बोले- बेटे की मेहनत रंग लाई
सतनाम के परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य नहीं थी। मां हरजीत कौर घर में सिलाई का काम करती थीं। परिवार किसान है। सीमित संसाधनों के बावजूद परिवार ने सतनाम की पढ़ाई और खेल जारी रखा। पिता अमरीक सिंह के अनुसार पदक जीतने की खबर मिलने के बाद परिवार में खुशी का माहौल है। उन्होंने कहा कि बेटे की वर्षों की मेहनत का परिणाम एशियन गेम्स के पदक के रूप में सामने आया है। परिवार के अनुसार सतनाम बाद में नौसेना में भी भर्ती हुए। बड़े भाई से प्रेरित होकर उन्होंने देशसेवा का रास्ता चुना और इसके साथ रोइंग में अपना सफर जारी रखा। सतनाम की उपलब्धि मानसा की रोइंग परंपरा को भी आगे बढ़ाती है। जिले के अलग-अलग गांवों से निकले खिलाड़ियों ने एशियन गेम्स में भारत के लिए पदक जीते हैं। पदक आया, अब सुविधाओं की उम्मीद
सतनाम के परिवार का कहना है कि मानसा जिले में रोइंग खिलाड़ियों के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण सुविधाएं नहीं हैं। परिवार चाहता है कि जिले में आधुनिक प्रशिक्षण केंद्र, बेहतर कोचिंग और खिलाड़ियों को जरूरी संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। सतनाम की कहानी इसी कमी के बीच निकली उस कामयाबी की कहानी है, जिसमें घर में मां की सिलाई मशीन चलती रही और पानी में बेटे की पतवार। आखिरकार उसी पतवार ने फत्ता मालोका से जापान के एशियन गेम्स पोडियम तक का सफर तय कर लिया।
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मानसा के सतनाम ने एशियन गेम्स में जीता ब्रॉन्ज:रोइंग में दिलाया मेडल, पिता बोले- बेटे की मेहनत रंग लाई
