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Sharenting Vs Cyber Fraud Risk; Child Photos Videos Online Safety Advisory Tips


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11 मिनट पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल

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आजकल सोशल मीडिया पर बहुत से माता-पिता अपने बच्चों की तस्वीरें और वीडियो शेयर करते हैं। वे अक्सर स्कूल फंक्शन, वेकेशन, बर्थडे सेलिब्रेशन, अचीवमेंट्स या रोजमर्रा के खास पलों की झलकियां लोगों को दिखाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये तस्वीरें और वीडियो बच्चों की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकते हैं?

दरअसल, एक बार इंटरनेट पर फोटो-वीडियो अपलोड करने के बाद उस पर हमारा कंट्रोल नहीं रहता। कोई भी इनका गलत इस्तेमाल कर सकता है। AI और डीपफेक तकनीक के दौर में यह रिस्क और भी बढ़ गया है। कई बार फोटो में मौजूद छोटी-सी डिटेल (जैसे बच्चे या स्कूल का नाम और लोकेशन) अपराधियों के लिए बड़ा हथियार बन सकती है।

इसी खतरे को देखते हुए पिछले दिनों असम पुलिस ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर एक एडवाइजरी जारी की। ‘इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर’ (I4C) ने भी स्कूलों और माता-पिता से सोशल मीडिया पर बच्चों से जुड़ी जानकारी शेयर करते समय सावधानी बरतने की अपील की है।

इसलिए ‘साइबर लिटरेसी’ में आज बच्चों की ऑनलाइन सेफ्टी पर बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-

  • बच्चों की फोटो ऑनलाइन शेयर करने के क्या रिस्क हो सकते हैं?
  • माता-पिता बच्चों की ऑनलाइन सिक्योरिटी कैसे बढ़ा सकते हैं?

एक्सपर्ट: राहुल मिश्रा, साइबर सिक्योरिटी एडवाइजर, उत्तर प्रदेश पुलिस

सवाल- सोशल मीडिया पर बच्चों की फोटो शेयर करना कितना कॉमन है?

जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए-

  • यह बहुत कॉमन है। इस आदत को ‘शेयरेंटिंग’ (Sharenting) कहते हैं, जो दो शब्दों ‘शेयरिंग’ और ‘पेरेंटिंग’ से मिलकर बना है।
  • साल 2012 में, ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने सबसे पहले इस शब्द का इस्तेमाल किया था।
  • इसमें माता-पिता बच्चों से जुड़े खास पलों, उपलब्धियों और रोजमर्रा की झलकियों को सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं।

McAfee के 2018 के ‘द एज ऑफ कंसेंट’ सर्वे के मुताबिक, भारत में अधिकांश माता-पिता बच्चों की ऑनलाइन प्राइवेसी और संभावित खतरों के बारे में जानने के बावजूद सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें शेयर करते हैं। सर्वे के अनुसार-

  • 98% पेरेंट्स बच्चों की ऐसी तस्वीरें भी शेयर करते हैं, जो बड़े होने पर उनके लिए शर्मिंदगी का कारण बन सकती हैं।
  • 40% से ज्यादा पेरेंट्स रोजाना कम-से-कम एक बार बच्चों की फोटो/वीडियो शेयर करते हैं।
  • 79% पेरेंट्स पब्लिक अकाउंट पर फोटो शेयर करते हैं, जहां प्राइवेसी और डेटा सिक्योरिटी का रिस्क रहता है।

सवाल- क्या बच्चों की फोटो ऑनलाइन शेयर करना सुरक्षित है?

जवाब- इसे पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। फोटो के साथ बच्चे का नाम, स्कूल, लोकेशन या दूसरी डिटेल्स पब्लिक हो सकती हैं। भविष्य में इसका मिसयूज होने का रिस्क हमेशा बना रहता है।

सवाल- बच्चों की फोटो ऑनलाइन शेयर करने से क्या साइबर रिस्क हो सकते हैं?

जवाब- ठग इसके जरिए बच्चे की आइडेंटिटी, लोकेशन या अन्य पर्सनल डिटेल्स का दुरुपयोग कर सकते हैं। सभी रिस्क ग्राफिक में देखिए-

सवाल- क्या बच्चों की कोई भी फोटो कभी शेयर नहीं करनी चाहिए?

जवाब- ऐसा नहीं है, लेकिन सतर्कता बरतनी जरूरी है। फोटो हमेशा प्राइवेसी सेटिंग्स को ‘प्राइवेट’ या ‘ओनली फ्रेंड्स’ रखकर ही शेयर करें। साथ ही ऐसी तस्वीरें शेयर करने से बचें, जो बच्चे की आइडेंटिटी, लोकेशन, स्कूल, हेल्थ, पर्सनल डिटेल्स को उजागर करती हों।

सवाल- बच्चों की कौन-सी डिटेल्स नहीं शेयर करनी चाहिए?

जवाब- इस दौरान ध्यान रखें कि फोटो में बच्चे की कोई भी पर्सनल डिटेल (जैसे स्कूल, घर का पता या पूरा नाम) न दिखे। साथ ही बैकग्राउंड सुरक्षित हो और फ्रेंड लिस्ट में केवल भरोसेमंद लोग ही शामिल हों। ग्राफिक में देखिए, बच्चों से जुड़ी कौन-सी डिटेल्स नहीं शेयर करनी चाहिए-

सवाल- क्या स्कूल द्वारा बच्चों की फोटो/वीडियो पोस्ट करना भी रिस्की हो सकता है?

जवाब- हां, स्कूलों के सोशल मीडिया पेज अक्सर पब्लिक होते हैं। ऐसे में ठग यहां से बच्चे की पर्सनल डिटेल, उसकी टाइमिंग और डेली रूटीन का पता लगा सकते हैं। इससे अपहरण जैसी घटनाओं का रिस्क होता है। इसलिए स्कूलों को बच्चों की प्राइवेसी और सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए।

सवाल- स्कूलों को क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

जवाब- स्कूलों को पेरेंट्स की सहमति से एक स्पष्ट सोशल मीडिया पॉलिसी बनानी चाहिए। साथ ही जिम्मेदारी से कंटेंट पोस्ट करना चाहिए। स्कूल मैनेजमेंट ग्राफिक में दी गई कुछ बातों का ध्यान रखें-

सवाल- रिपोर्ट कार्ड, एडमिट कार्ड या पहचान संबंधी दस्तावेज क्यों शेयर नहीं करने चाहिए?

जवाब- इन डॉक्यूमेंट्स में बच्चे का पूरा नाम, जन्मतिथि, माता-पिता का नाम और रोल नंबर जैसी सेंसिटिव जानकारी होती है। साइबर अपराधी इसके जरिए फ्रॉड कर सकते हैं।

सवाल- माता-पिता को बच्चों की डिजिटल प्राइवेसी के बारे में क्यों सोचना चाहिए?

जवाब- बच्चे अभी वयस्क नहीं हैं और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी माता-पिता की है। इसलिए पेरेंट्स हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि आपकी आज की एक पोस्ट भविष्य में बच्चे की प्रतिष्ठा, सुरक्षा और निजी जीवन को प्रभावित कर सकती है।

सवाल- डिजिटल फुटप्रिंट क्या होता है? क्या एक बार अपलोड की गई फोटो हमेशा इंटरनेट पर रह सकती है?

जवाब- इंटरनेट पर शेयर की गई जानकारी से बनने वाले रिकॉर्ड को ‘डिजिटल फुटप्रिंट’ कहते हैं। इंटरनेट पर अपलोड की गई फोटो को पूरी तरह मिटाना लगभग असंभव होता है। भले ही आप डिलीट कर दें, कोई उसे डाउनलोड, सेव या दोबारा शेयर कर सकता है। इसलिए ऑनलाइन पोस्ट को स्थायी मानकर ही शेयर करना चाहिए।

सवाल- जियोटैग (Geotag) क्या होता है और यह क्यों खतरनाक हो सकता है?

जवाब- जियोटैग फोटो/वीडियो के साथ जुड़ी लोकेशन की जानकारी है। इससे पता चल सकता है कि तस्वीर कहां ली गई है। अगर बच्चों की फोटो में जियोटैग मौजूद हो, तो कोई अनजान व्यक्ति बच्चे के घर, स्कूल या किसी दूसरी जगह की लोकेशन का पता लगा सकता है। इसलिए फोटो शेयर करने से पहले लोकेशन सेटिंग्स चेक करना जरूरी है।

सवाल- AI के दौर में बच्चों की फोटो शेयर करने के जोखिम क्यों बढ़ गए हैं?

जवाब- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल की मदद से अब किसी भी साधारण फोटो को डीपफेक वीडियो या आपत्तिजनक तस्वीरों (AI मॉर्फिंग) में बदला जा सकता है, जो बेहद डरावना है।

सवाल- माता-पिता कैसे पहचानें कि कोई व्यक्ति बच्चों की तस्वीरों में असामान्य रुचि ले रहा है?

जवाब- अगर कोई अनजान व्यक्ति ये हरकत करे तो सतर्क हो जाएं-

  • सोशल मीडिया पर बच्चे की हर एक्टिविटी को बारीकी से ट्रैक करे।
  • बच्चे की तस्वीरों पर बार-बार कमेंट करे।
  • मैसेज करके पर्सनल डिटेल्स पूछे।
  • बार-बार बच्चे की फोटो या वीडियो मांगे।
  • बच्चे से सीधे चैट या कॉल करने की कोशिश करे।

सवाल- क्या सोशल मीडिया पर शेयर की गई तस्वीरें साइबर बुलिंग का कारण बन सकती हैं?

जवाब- हां, कोई व्यक्ति बच्चे का मजाक उड़ाने या बच्चे को ऑनलाइन परेशान करने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकता है। इससे बच्चा मानसिक तनाव का शिकार हो सकता है।

सवाल- बच्चों की प्राइवेसी का अधिकार क्या है?

जवाब- ‘डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP एक्ट), 2023’ में बच्चों की डिजिटल प्राइवेसी को विशेष सुरक्षा दी गई है। एक्ट में प्रावधान है कि-

  • बच्चों के पर्सनल डेटा को प्रोसेस करने के लिए माता-पिता या लीगल गार्जियन की सहमति जरूरी है।
  • बच्चों की ट्रैकिंग, बिहेवियरल मॉनिटरिंग और टार्गेटेड विज्ञापन पर रोक है।
  • ऐसे तरीके से बच्चे का डेटा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जिससे उसे नुकसान पहुंचे।

ध्यान रहे- DPDP एक्ट के बच्चों से जुड़े ये प्रावधान 13 मई 2027 से लागू होंगे।

सवाल- बच्चों की कौन-सी तस्वीरें कभी ऑनलाइन नहीं डालनी चाहिए?

जवाब- बच्चों की ये तस्वीरें कभी भी ऑनलाइन शेयर न करें-

  • रिपोर्ट कार्ड, एडमिट कार्ड या सर्टिफिकेट की तस्वीरें।
  • घर का पता या लोकेशन दिखाने वाली तस्वीरें।
  • मेडिकल ट्रीटमेंट की तस्वीरें।
  • बच्चे के रोने, सजा पाने या शर्मिंदा होने वाले पलों की तस्वीरें।
  • पासपोर्ट, आधार या अन्य डॉक्यूमेंट्स की तस्वीरें।
  • लाइव लोकेशन के साथ पोस्ट की गई तस्वीरें।
  • डेली रूटीन की तस्वीरें।

सवाल- बच्चों की फोटो शेयर करने से पहले कौन-से सवाल खुद से पूछने चाहिए?

जवाब- बच्चे से जुड़ी कोई भी पोस्ट शेयर करने से पहले खुद से ये पांच सवाल पूछें-

  • क्या इस फोटो से बच्चे की पहचान पता चल सकती है?
  • क्या इस फोटो में लोकेशन की जानकारी दिख रही है?
  • क्या यह फोटो बच्चे को भविष्य में असहज कर सकती है?
  • क्या मैं यह फोटो किसी अनजान व्यक्ति को दिखाने में सहज रहूंगा/रहूंगी?
  • क्या फोटो पोस्ट करने की वास्तव में जरूरत है?

सवाल- अगर फोटो का गलत इस्तेमाल हो जाए तो क्या करें?

जवाब- तुरंत उस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फोटो को ‘रिपोर्ट’ करें। सबूत के तौर पर स्क्रीनशॉट लें। स्थानीय पुलिस स्टेशन के साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराएं।

सवाल- साइबर क्राइम की शिकायत कहां करें?

जवाब- इसके लिए साइबर क्राइम टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1930 पर तुरंत कॉल करके शिकायत दर्ज करा सकते हैं। साथ ही www.cybercrime.gov.in पोर्टल पर ऑनलाइन भी शिकायत कर सकते हैं।

सवाल- माता-पिता बच्चों की ऑनलाइन सिक्योरिटी कैसे बढ़ा सकते हैं?

जवाब- बच्चों को जैसे ‘गुड टच-बैड टच’ के बारे में समझाया जाता है, वैसे ही उन्हें ‘सेफ-अनसेफ ऑनलाइन’ के बारे में भी बताना चाहिए। ग्राफिक में ऑनलाइन सेफ्टी के आसान टिप्स देखिए-

सवाल- बच्चों की डिजिटल पहचान को सुरक्षित रखने का गोल्डन रूल क्या है?

जवाब- साइबर सिक्योरिटी एडवाइजर राहुल मिश्रा बताते हैं, “कुछ भी पोस्ट करने से पहले दाे बार सोचें।” सोशल मीडिया के चंद ‘लाइक्स’ और ‘कमेंट्स’ के लिए बच्चे की सुरक्षा से खिलवाड़ न करें। बच्चों की प्राइवेसी हमेशा सर्वोपरि होनी चाहिए।

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ग्राफिक्स- महेंद्र वर्मा

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