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Anil Joshi Column | Himalayan Climate Crisis Kedarnath Nepal Disaster


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3 घंटे पहले

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डॉ. अनिल जोशी पद्मभूषण से सम्मानित, पर्यावरणविद् - Dainik Bhaskar

डॉ. अनिल जोशी पद्मभूषण से सम्मानित, पर्यावरणविद्

यह तो तय है कि हम हिमालय के प्रति गंभीर नहीं हैं। और यह आज की बात नहीं है, पिछले दो दशकों से हिमालय में लगातार हो रही घटनाएं इसी ओर संकेत करती हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन घटनाओं के लिए हिमालय और यहां के लोगों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इनके लिए दोषी कोई और है, स्थानीय रहवासी तो केवल दूसरे के गुनाहों के विक्टिम हैं।

नेपाल की मर्मांतक त्रासदी के बाद पूरे हिमालय में एक बार फिर भय व्याप्त हो गया है। क्योंकि इससे पहले की घटनाएं भी कोई चेतावनी देकर नहीं आई थीं। नेपाल की भोटेकोशी से लेकर बिहार की कोशी नदी तक बाढ़ के प्रकोप के दृश्य सामने आए हैं। नेपाल की त्रासदी को भूकंप से जोड़कर भी देखा जा रहा है, पर हिमखंड भूकंप से उतने प्रभावित नहीं होते। बढ़ते तापक्रम ने ही इन्हें कमजोर किया होगा और फिर ये हादसा हुआ होगा।

हमने यह व्यवस्था तो अवश्य की है कि हिमालय या सीमाओं से सटे जितने भी क्षेत्र हैं, उनके प्रति संवेदनशीलता बरतते हुए उन्हें राज्यों तथा देशों में पुनर्गठित किया है। इसके पीछे मुख्य कारण आर्थिक और सामाजिक पहलुओं पर बल देना था, लेकिन इसके पारिस्थितिक (इकोलॉजिकल) पहलू को कभी समझा ही नहीं गया।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसकी पारिस्थितिकी को समझना केवल इसकी संवेदनशीलता तक सीमित नहीं है। दुनिया भर में हो रहे बदलावों- जैसे ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का हिमालय पर क्या प्रभाव पड़ेगा, उसको समझने में हम चूक गए हैं।

दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन के जो भी कारण हों- चाहे वे हमारी जीवनशैली की सुविधाएं हों, विलासिता हो या विकास का रोडमैप- पिछले 200 वर्षों में हुए कार्बन उत्सर्जन के कारण ग्लोबल वार्मिंग जैसी गंभीर समस्याएं खड़ी हुई हैं। इस बदलाव ने शायद उन विकसित समुदायों को उतना व्यथित नहीं किया होगा, जितना कि इसके कारण उत्पन्न विषमताओं को हिमालय ने झेला है।

सीधी-सी बात है कि हिमालय एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। इसकी अपनी पारिस्थितिकी बहुत ही नाजुक है। इसमें जरा भी छेड़छाड़ के गंभीर दुष्परिणाम सामने आते हैं, और यही समझ शायद हमारी नीतियों में नहीं झलक पाई है। नेपाल से पहले भी केदारनाथ, सिक्किम और धराली में हुई त्रासदियां इससे मिलती-जुलती थीं। नेपाल में एक हिमखंड (ग्लेशियर) के टूटने को मुख्य कारण बताया जा रहा है, जिसने पूरे क्षेत्र को हताहत कर दिया। इससे जुड़ी तमाम नदियां उफान पर आईं और उनसे जुड़े गांव-शहर तबाही की चपेट में आ गए।

ऐसी त्रासदियों में पानी के साथ भारी मलबा आता है, जो घरों को तो ध्वस्त करता ही है, साथ ही लोगों को भी बहा ले जाता है या दबा देता है। ऐसे में राहत व बचाव कार्य में लंबा समय लगता है। नेपाल में कई बांध भी चपेट में आए हैं और तबाही के रास्ते का सारा बुनियादी ढांचा नेस्तनाबूद हो गया है। क्षेत्र की सड़कें और पुल लापता हो गए हैं। इस हादसे के पूरे ब्योरे डराने वाले होंगे।

एक बात वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझ लेनी चाहिए- कार्बन उत्सर्जन को संतुलित होने में हजारों साल लगते हैं। इसका सीधा अर्थ है कि यह उत्सर्जन अब हमारे लिए एक गंभीर संकट बन चुका है। इसी कारण तापमान पूरी तरह हमारे नियंत्रण से बाहर हो रहा है और इसका सीधा प्रभाव समुद्रों पर भी पड़ रहा है।

समुद्र हमारी पृथ्वी के मौसम और पारिस्थितिकी के मुख्य नियंत्रक हैं। उनमें होने वाला कोई भी बदलाव पूरी पृथ्वी को प्रभावित करता है। इसी का परिणाम है कि हम मानसून के स्वाभाविक चक्र को खो चुके हैं। कब और कहां अचानक भारी बारिश (क्लाउड-बर्स्ट) हो जाए, इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। मौसम विभाग भी अकसर अचंभित रह जाता है, क्योंकि पूरा संतुलन बिखर चुका है।

ऐसे में इस त्रासदी को केवल कुछ हजार लोगों की क्षति के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह आने वाले समय में करोड़ों लोगों के लिए एक बड़े संकट की चेतावनी है। यह सब इसलिए हुआ है, क्योंकि दुनिया का एक बड़ा हिस्सा अपने विकास और सुविधाओं में व्यस्त है, जबकि उसका खामियाजा नाजुक पारिस्थितिक-तंत्र के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। जब तक हम इस कड़वे सच को नहीं समझेंगे, तब तक हिमालय के प्रति न्याय नहीं कर पाएंगे। नेपाल की त्रासदी और उससे पहले की घटनाएं भी हमें यही सबक देती हैं।

हिमालय अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। इसकी पारिस्थितिकी बहुत नाजुक है। इसमें जरा भी छेड़छाड़ के गंभीर दुष्परिणाम सामने आते हैं, और यही समझ हमारी नीतियों में नहीं झलक पाई है। इससे पहले भी केदारनाथ, सिक्किम और धराली में ऐसी ही त्रासदियां हुई हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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