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BRICS Summit 2026 Highlights; India’s Benefits


18वां BRICS समिट रविवार को खत्म हो गया। पुतिन-जिनपिंग जैसे नेता दिल्ली से लौट चुके हैं। दो दिन, 12 देशों के शीर्ष नेता, हजारों डेलीगेट्स, दर्जनों इवेंट और सबकी सहमति से पारित हुआ एक डिक्लेरेशन।

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BRICS 2026 समिट से भारत के 5 बड़े हासिल की कहानी, आज के एक्सप्लेनर में…

2024 और 2025 में BRICS का विस्तार होने के बाद पहली बार सभी सदस्य देश पूरी मजबूती के साथ टेबल पर मौजूद थे। 2025 की ब्राजील समिट में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नहीं शामिल हुए थे और रूसी राष्ट्रपति पुतिन भी वर्चुअली जुड़े थे।

BRICS के सभी 11 सदस्य देशों ने 140 पैराग्राफ के साझा घोषणापत्र- ‘नई दिल्ली डिक्लेरेशन’ पर साइन किए। पीएम मोदी ने खुद ऐलान किया कि किसी सदस्य ने आपत्ति नहीं जताई।

ये हासिल अहम क्यों है?

  • अभी दुनिया में 4 बड़े संघर्ष चल रहे हैं- अमेरिका-ईरान, रूस-यूक्रेन, सऊदी अरब-हूती और इजराइल-लेबनान। दुनियाभर में उथल-पुथल और अनिश्चिचतता है।
  • BRICS पहले ही ट्रम्प के निशाने पर रहता है। वो इसे अमेरिका के खिलाफ बताते हैं। ट्रम्प ने धमकी दी है कि जो भी देश BRICS की एंटी-अमेरिका पॉलिसीज का साथ देंगे, उन पर एक्स्ट्रा टैरिफ लगाया जाएगा। ऐसे माहौल में BRICS समिट जैसा बड़ा इवेंट करवाना आसान नहीं था।
  • समिट का नई दिल्ली घोषणापत्र पारित होने से पहले शनिवार सुबह 4 बजे तक बैठकें चलीं। भारत ने एक-दूसरे से जंग लड़ रहे ईरान, सऊदी और UAE को भी राजी किया।
  • अमेरिकी थिंक टैंक विल्सन सेंटर के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन कहते हैं, ‘इससे पहले मई 2026 में हुई BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में ईरान और UAE के मतभेदों के चलते साझा बयान तक जारी नहीं हो पाया था। ऐसे में दुनिया भर के टॉप लीडर्स के लेवल पर सर्वसम्मति से घोषणापत्र पास करवाना भारत के लिए बड़ी उपलब्धि है।’
  • हालांकि पूर्व राजनयिक दीपक वोरा कहते हैं, ‘भारत ने ऐसे शब्द चुने, जिनसे किसी की रेड लाइन क्रॉस नहीं हुई। साझा बयान को विरोधी देशों की राजनीतिक एकजुटता नहीं मानना चाहिए, बल्कि सिर्फ एक साझा सहमति की तरह देखना चाहिए।’

पीएम मोदी ने दो दिन में 15 से ज्यादा नेताओं से द्विपक्षीय बातचीत की और कुछ विरोधी देशों को भी एकसाथ बिठा दिया…

पुतिन से मुलाकात में ट्रेड, डिफेंस और एनर्जी पर बात हुई। पुतिन ने यूक्रेन युद्ध के शांतिपूर्ण समाधान के लिए भारत और पीएम मोदी के कूटनीतिक प्रयासों की तारीफ की और आभार जताया। पजेश्कियान से बातचीत में पीएम मोदी ने नेविगेशन और व्यापार की आजादी पर जोर दिया। भारत में किसी ईरानी राष्ट्रपति की 8 साल में पहली विजिट है।

पजेश्कियान और UAE के क्राउन प्रिंस शेख बिन जायद अल नाहयान के बीच साइडलाइन्स पर मुलाकात हुई। आम बैठकों में सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल अल सऊद भी मौजूद रहे।

इसी बीच दिल्ली डिक्लेरेशन में पहलगाम हमले की भी कड़े शब्दों में निंदा की गई- ‘हम 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं, और सीमा पार से आतंकियों की घुसपैठ सहित आतंकवाद के सभी रूपों से लड़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं।’

ये हासिल अहम क्यों है?

  • समिट से पहले भारत कूटनीतिक तौर पर दबाव में था। मई 2026 में BRICS के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान ईरान और UAE के बीच तनाव के चलते साझा बयान जारी नहीं हुआ था। इसके बाद कई रिपोर्ट्स में भारत की अध्यक्षता तक पर सवाल उठाए गए।
  • वहीं पाकिस्तान की ग्लोबल पॉलिटिक्स मजबूत स्थिति में है। पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्ते अपने सबसे बेहतर दौर में हैं। पहलगाम हमले के बदले में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान की तरफ झुकाव वाला रुख अपनाया।
  • चीन ने भी संघर्ष के दौरान पाकिस्तान को सैन्य मदद पहुंचाई। सीजफायर के बाद ट्रम्प और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के बीच सीक्रेट मीटिंग्स हुईं। वहीं भारत पर अमेरिका ने 18% टैरिफ लगाया है। ट्रेड डील पर बातचीत अटकी है। पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर में मध्यस्थता भी की है। हाल ही में पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्किये के साथ स्पेशल डिफेंस एग्रीमेंट भी किया है।
  • ऐसे में आपस में विपक्षी देशों का दिल्ली डिक्लेरेशन पर साझा बयान देना, पहलगाम हमले की सामूहिक निंदा, भारत की डिप्लोमैटिक स्थिति बेहतर होने के संकेत हैं। पीएम मोदी और जिनपिंग ने अलग से करीब 50 मिनट तक बैठक भी की। साझा बयान में कहा गया कि मतभेदों को विवाद नहीं बनने देना चाहिए और संबंध लंबे चलने चाहिए।
  • माइकल कुगेलमैन के मुताबिक, ये समिट भारत के लिए अपनी ग्लोबल लीडरशिप को मजबूत करने का मौका था। एक ठोस साझा बयान जारी कर पाना भारत की सफलता है।’
  • थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) में जियोइकॉनोमिक्स प्रोग्राम की एसोसिएट फेलो जाह्नवी त्रिपाठी कहती हैं कि भारत की सफलता का मतलब ये नहीं है कि BRICS देश हर जियोपॉलिटिकल मुद्दे पर एक सुर में बोलें, बल्कि इसे ऐसे देखना चाहिए कि आतंकवाद, व्यापारिक दिक्कतों जैसे मुद्दों पर सहमति बना पाई है या नहीं। ये भी देखना होगा कि ये सहमति असली नतीजों में बदलती है या नहीं।’

7 साल बाद जिनपिंग भारत दौरे पर आए। 12 सितंबर की शाम उन्होंने पीएम मोदी के साथ बैठक की। इसमें सीमा विवाद पर ‘निष्पक्ष, उचित और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य’ समाधान की बात दोहराई गई। पीएम मोदी ने जिनपिंग के साथ तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा, ‘हमने भारत-चीन संबंधों के सभी पहलुओं की समीक्षा की।’

शी जिनपिंग ने भारत मंडपम में पीएम मोदी से मुलाकात की।

शी जिनपिंग ने भारत मंडपम में पीएम मोदी से मुलाकात की।

ये हासिल अहम क्यों है?

  • जून 2020 में गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच खूनी झड़प हुई। भारत के कैप्टन संतोष बाबू समेत 20 जवान शहीद हुए। हालात इतने बिगड़े कि दोनों ओर से फॉरवर्ड पोस्ट पर जवानों और हथियारों की भारी तैनाती की गई।
  • गलवान के बाद जिनपिंग का ये पहला भारत दौरा है। नई दिल्ली की इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज स्टडीज की डायरेक्टर प्रो. अलका आचार्य कहती हैं कि भारत आकर राष्ट्रपति जिनपिंग का पीएम मोदी से द्विपक्षीय बैठक करना पॉजिटिव मैसेज है। ये समिट ऐसा पॉलिटिकल फ्रेम सेट करती है, जो पूरे सिस्टम में फैल जाता है।
  • हालांकि, दोनों देशों की अपनी-अपनी प्राथमिकताएं हैं। चीन अपना कारोबार और वैश्विक दबदबा बढ़ाना चाहता है। भारत आपसी मुद्दों को सुलझाना चाहता है। दोस्त बनने के लिए अभी दोनों को लंबा रास्ता तय करना होगा।
  • ऑप्टिक्स के लिहाज से अमेरिका समेत तमाम पश्चिमी देशों को बड़ा मैसेज गया है कि भारत, चीन और रूस जैसी 3 बड़ी गैर-पश्चिमी ताकतें बार-बार मंच साझा कर रही हैं। भारत सिर्फ अमेरिका और यूरोप पर निर्भर नहीं है, बल्कि उसके पास और भी विकल्प हैं।
12 सितंबर को BRICS समिट के क्लोज डोर मीटिंग के बाद हाथ मिलाते राष्ट्रपति पुतिन, पीएम मोदी और और राष्ट्रपति जिनपिंग।

12 सितंबर को BRICS समिट के क्लोज डोर मीटिंग के बाद हाथ मिलाते राष्ट्रपति पुतिन, पीएम मोदी और और राष्ट्रपति जिनपिंग।

डिक्लेरेशन में नाम लिए बिना ट्रम्प की टैरिफ पॉलिसी के विरोध में कहा गया है- ‘हम एकतरफा टैरिफ पर गंभीर चिंता जताते हैं। ये WTO के नियमों के खिलाफ हैं। मनमाने टैरिफ ग्लोबल ट्रेड को प्रभावित करते हैं। सप्लाई चेन खराब होती है।’

अमेरिका रूस से तेल और हथियार खरीदने वाले देशों पर जो बैन लगाता है। डिक्लेरेशन में कहा गया है, ‘हम अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ लगाए गए एकतरफा दबाव वाले उपायों की निंदा करते हैं।’

वहीं पुतिन ने भाषण में कहा, ‘अब पुराने इकॉनोमिक सेंटर्स और पुराने नेताओं की जगह नए देश और नए नेता ले रहे हैं। पश्चिम कमजोर हो रहा है। दुनिया बदल रही है। BRICS ग्लोबल ग्रोथ का प्लेटफॉर्म बन रहा है।’

पीएम मोदी ने भी अपनी क्लोजिंग स्पीच में बयान दिया, ‘बदलती दुनिया का मैनेजमेंट पुरानी संस्थाओं से नहीं चल सकता। भविष्य के नियम बनाने में ग्लोबल साउथ की भी भागीदारी होनी चाहिए।’

BRICS समिट के आखिरी दिन 13 सितंबर को पीएम मोदी ने क्लोजिंग स्पीच दी

BRICS समिट के आखिरी दिन 13 सितंबर को पीएम मोदी ने क्लोजिंग स्पीच दी

ये हासिल अहम क्यों है?

  • अगस्त 2025 में ट्रम्प ने रूस से तेल खरीदने के चलते भारत पर 25% एक्स्ट्रा टैरिफ लगा दिया था, जिससे कुल टैरिफ 50% तक पहुंच गया था। फरवरी 2026 में अमेरिका ने यह टैरिफ घटाकर 18% कर दिया है, शर्त है कि भारत रूसी तेल की खरीद कम रखे। अमेरिका से ट्रेड डील को लेकर बातचीत भी अटकी हुई है।
  • भारत के पूर्व राजनयिक श्रीकुमार मेनन के मुताबिक, ‘ट्रम्प के टैरिफ के खतरों के चलते भारत ने समिट में सावधानी वाली भाषा इस्तेमाल की। अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता खत्म करने, यानी डी-डॉलराइजेशन के लिए BRICS की अपनी करेंसी लाने के प्रस्ताव से दूरी बनाए रखी। हालांकि इससे भारत के मूल एजेंडे में कोई बदलाव नहीं आया।’
  • दरअसल, भारत ने BRICS देशों से लोकल करेंसी में ट्रेड बढ़ाने की अपील की है। दिल्ली डिक्लेरेशन में अमेरिका के टैरिफ के अलावा रूस, ईरान जैसे देशों पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों पर भी विरोध जताया गया है।
  • माइकल कुगेलमैन कहते हैं, ‘चीन, रूस भारत से अमेरिका के खिलाफ ज्यादा सख्त भाषा की उम्मीद करते हैं, लेकिन भारत ने BRICS देशों की आवाज बुलंद करने के साथ-साथ अमेरिका से सीधा टकराव मोल लेने से भी परहेज किया, ताकि ट्रेड डील की बातचीत पटरी से न उतरे।’
जुलाई 2025 में BRICS ब्राजील समिट में जब ट्रम्प के टैरिफ का विरोध हुआ, तो ट्रम्प ने धमकी दी थी- जो भी देश BRICS की एंटी-अमेरिकन’ पॉलिसीज का साथ देंगे, उन पर 10% एक्स्ट्रा टैरिफ लगाया जाएगा।

जुलाई 2025 में BRICS ब्राजील समिट में जब ट्रम्प के टैरिफ का विरोध हुआ, तो ट्रम्प ने धमकी दी थी- जो भी देश BRICS की एंटी-अमेरिकन’ पॉलिसीज का साथ देंगे, उन पर 10% एक्स्ट्रा टैरिफ लगाया जाएगा।

BRICS देश डॉलर पर निर्भरता कम करना चाहते हैं। चर्चा होती रही है कि इसके लिए एक BRICS करेंसी लाई जा सकती है। समिट में सीधे तौर पर डी-डॉलराइजेशन या नई करेंसी का जिक्र नहीं किया गया, लेकिन डिक्लेरेशन में BRICS देशों के बीच लोकल करेंसी में पेमेंट और आपसी ट्रेड बढ़ाने की बात कही गई है, ताकि ट्रांजैक्शन कॉस्ट कम लगे। इसके लिए BRICS पेमेंट टास्क फोर्स, BPTF और Brics Pay पोर्टल के जरिए क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट को और आसान बनाया जाएगा। BRICS देशों की बैंक- न्यू डेवलपमेंट बैंक में लोकल करेंसी में फाइनेंस बढ़ाया जाएगा।

ये हासिल अहम क्यों है?

  • फिलहाल दुनिया का करीब 80% व्यापार और 58% पेमेंट डॉलर में होता है। दुनिया का 64% लोन , 57% फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व डॉलर में है।
  • डॉलर पर निर्भरता के चलते अमेरिका ग्लोबल मार्केट में कई तरह की मनमानी करता है। अमेरिका ने रूस के रिजर्व डॉलर जब्त कर लिए हैं। ईरान किसी देश को डॉलर में तेल नहीं बेच पा रहा।
  • डॉलर महंगा होने के चलते अमेरिका को विदेशों से आने वाला सस्ता सामान मिलता है। इसीलिए अमेरिका को कंज्यूमर या इम्पोर्ट बेस्ड इकॉनमी कहा जाता है।
  • यूक्रेन जंग शुरू होने के बाद अमेरिका ने कई रूसी बैंकों को डॉलर बेस्ड SWIFT पेमेंट सिस्टम से बाहर कर किया है। रूस और ईरान पर कई तरह के आर्थिक बैन लगाए गए हैं। ऐसे में रूस आने डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश की है।
  • अभी रूस-चीन करीब 90% व्यापार रूबल-युआन में कर रहे हैं। 80% ईरान-रूस ट्रेड भी लोकल करेंसी में होता है। भारत भी BRICS देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

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