2600 करोड़ रुपए के उज्जैन-गरोठ ग्रीनफील्ड हाईवे का निर्माण अभी पूरा भी नहीं हुआ और इसकी इंजीनियरिंग पर सवाल खड़े होने लगे हैं। हाईवे के रेलवे ओवरब्रिज (ROB) की एप्रोच रोड बार-बार धंस रही है। सात महीने पहले जिस हिस्से में सड़क ढही थी, अब उसी एप्रोच रो
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अब करीब 500 मीटर हिस्सा खोदकर नए सिरे से बनाने की तैयारी है। अनुमानित खर्च करीब 10 करोड़ रुपए बताया जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि एप्रोच रोड की रिटेनिंग वॉल करीब 17 मीटर ऊंची बना दी गई, लेकिन मिट्टी के दबाव और बारिश के पानी की निकासी के लिए पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं किए गए?
तीन साल से निर्माण एजेंसी और जिम्मेदार अधिकारी इस समस्या के साथ ही काम आगे बढ़ाते रहे। अब सुधार में कई महीने और करोड़ों रुपए खर्च होंगे, जिसका असर सिंहस्थ से पहले हाईवे चालू करने की तैयारियों पर पड़ सकता है।

उज्जैन-गरोठ ग्रीनफील्ड हाईवे पर बने रेलवे ओवरब्रिज का ये हिस्सा धंस गया है।
हाईप्रोफाइल प्रोजेक्ट में सामने आईं 4 गड़बड़ियां
1. 17 मीटर की दीवार, पानी निकालने का इंतजाम नदारद
ROB की एप्रोच रोड को ऊंचाई देने के लिए रिटेनिंग वॉल करीब 17 मीटर ऊंची है। इतनी ऊंचाई पर पीछे भरी मिट्टी का दबाव बढ़ जाता है। बारिश में मिट्टी पानी सोखती है और दीवार के पीछे पानी का दबाव भी बन सकता है। इसलिए रिटेनिंग वॉल में ड्रेनेज सिस्टम बेहद महत्वपूर्ण होता है।
मौके पर दीवार में Weep Holes यानी पानी बाहर निकालने के छेद होने चाहिए, लेकिन वे बनाए ही नहीं गए। दो बार एप्रोच रोड ढहने के पीछे बारिश के पानी से मिट्टी धंसने और रिटेनिंग वॉल के ब्लॉक उखड़ने की बात सामने आई है।
समाधान- Weep Holes के साथ फिल्टर मीडिया, ड्रेनेज लेयर और पाइप ड्रेनेज की व्यवस्था हो। यह भी जांचना होगा कि बारिश का पानी दीवार के पीछे कहां से आता है और बाहर किस रास्ते से निकलता है।

पानी निकासी की व्यवस्था नहीं होने के कारण रिटेनिंग वॉल के ब्लॉक उखड़ गए।
2. इतनी ऊंची दीवार बिना स्टेपिंग के बनाई
रिटेनिंग वॉल की ऊंचाई बढ़ने के साथ मिट्टी के दबाव, फाउंडेशन, स्लाइडिंग, ओवरटर्निंग और बेस की क्षमता का आकलन जरूरी होता है। मौके पर दीवार काफी हद तक खड़ी संरचना जैसी दिखाई देती है। सवाल है कि साइट की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर इसका डिजाइन तैयार किया गया था या नहीं?
एक्सपर्ट के मुताबिक, 17 मीटर सीधी दीवार खड़ी नहीं की जा सकती। इसके लिए स्टेपिंग मैथड अपनाना चाहिए। इसमें पहले 9 मीटर तक हाइट की जाती है, फिर पीछे से आगे की छह मीटर की रिटेनिंग वॉल बनाई जाती है।
समाधान- पूरे स्ट्रक्चर का री-डिजाइन या स्ट्रक्चरल ऑडिट कराया जाए। इसमें मिट्टी, फाउंडेशन, दीवार की स्थिरता, स्लोप और ड्रेनेज की जांच एक साथ हो।

जिन हिस्सों में इस तरह की स्टेपिंग की गई है, वहां रिटेनिंग वॉल मजबूती से खड़ी है।
3. 7 माह पहले भी धंसी सड़क, समाधान नहीं
यह समस्या अचानक सामने नहीं आई। करीब सात महीने पहले 6 फरवरी को भी एप्रोच रोड का हिस्सा धंस चुका था। उस समय सुधार किया गया, लेकिन अब उसी क्षेत्र में दोबारा बड़ा नुकसान सामने आया है। अगर सड़क के नीचे भराव, मिट्टी का कम्पैक्शन, पानी की निकासी या रिटेनिंग वॉल से जुड़ी मूल समस्या थी तो सिर्फ मरम्मत से इसका स्थायी समाधान नहीं हो सकता था।
समाधान- 500 मीटर हिस्से को दोबारा बनाने से पहले भराव की परतें खोली जाएं। मिट्टी और भराव की गुणवत्ता की जांच, Compaction Test, पानी के संभावित रास्तों और रिटेनिंग वॉल की संरचनात्मक जांच की जाए।
4. ठीकरा ठेकेदारों पर, अफसर जिम्मेदार नहीं
अब करीब 500 मीटर हिस्सा खोदकर नए सिरे से बनाने की तैयारी है। अनुमानित खर्च करीब 10 करोड़ रुपए है। सवाल सिर्फ खर्च का नहीं, जवाबदेही का भी है।
दो साल से एप्रोच रोड बनाने का काम चल रहा था। उस दौरान प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहे एमएल पूर्विया और राहुल जाजोरिया की जिम्मेदारी क्या तय होगी? उस दौरान खामी क्यों नहीं पकड़ी गई? गड़बड़ी को अनदेखा क्यों किया गया? एजेंसी को होने वाले अतिरिक्त खर्च और प्रोजेक्ट में देरी की जवाबदेही किसकी होगी?
समाधान– नए निर्माण से पहले थर्ड पार्टी टेक्निकल ऑडिट कराया जाए। डिजाइन, निर्माण सामग्री, कम्पैक्शन, ड्रेनेज और रिटेनिंग वॉल की जांच हो।

सही मॉनीटरिंग न होने से बार-बार ब्रिज धंसने की समस्या आ रही है।
प्रोजेक्ट में तीन एजेंसियों ने किया काम
2600 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत वाला 136 किमी लंबा उज्जैन-गरोठ फोरलेन ग्रीनफील्ड हाईवे (NH-752D) उज्जैन के चंदेसरा बायपास से शुरू होकर मंदसौर जिले के गरोठ तक जाता है, जहां यह दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे से कनेक्ट होता है। यह करीब 89 गांवों और नगरों से होकर गुजरता है। इसका काम 90 प्रतिशत से ज्यादा पूरा हो चुका है।

आरोप- दूसरी बार टूटा रोड, गड़बड़ी तो बड़ी हुई है
प्रेमनगर निवासी दारासिंह कहते हैं कि देखते-देखते दो बार सड़क धंस गई। अभी तो यह बनी भी नहीं है। जब सड़क के ये हाल हैं तो ट्रैफिक शुरू होने के बाद क्या होगा। अफसरों ने ध्यान नहीं दिया, गड़बड़ी तो यहां बड़ी हुई है।

एक्सपर्ट व्यू- बड़ी रिटेनिंग वॉल के लिए स्टेपिंग जरूरी
भास्कर ने मामले में इंडियन रोड्स कांग्रेस, दिल्ली की काउंसिल मेंबर एवं पीडब्ल्यूडी की रिटायर्ड सुप्रिटेंडिंग इंजीनियर शोभा खन्ना से बात की। उन्होंने एप्रोच रोड के टूटने के फोटो और वीडियो देखने के बाद कहा कि इतनी अधिक ऊंचाई की रिटेनिंग वॉल बिना बेंचिंग (स्टेपिंग) के नहीं बनाई जानी चाहिए।
उन्होंने बताया कि इसे IRC SP 102-Design and Construction of Reinforced Soil Walls में दिए प्रावधानों के अनुसार बनाया जाना चाहिए था। इतनी ऊंचाई की रीनफोर्स्ड अर्थ रिटेनिंग वॉल के लिए स्टेपिंग मैथड अपनाना जरूरी है। भराव यथासंभव ग्रेनुलर मटेरियल से किया जाना चाहिए और फेशिया ब्लॉक के सामने फिल्टर मीडिया लगाया जाना चाहिए।
यदि पोंड ऐश का उपयोग किया जा रहा है तो ड्रेनेज के लिए जियो-कंपोजिट्स का इस्तेमाल होना चाहिए। पोंड ऐश और फिल्टर लेयर के बीच परवियस सेपरेटर जियो-टेक्सटाइल लगाने से पानी की निकासी बेहतर होती है और हाइड्रोस्टैटिक प्रेशर बनने से रोका जा सकता है।

NHAI ने कहा- जांच के बाद सुधार करा रहे
NHAI के प्रोजेक्ट डायरेक्टर शिवम वर्मा बताते हैं कि अभी वहां ट्रैफिक अप्लाई नहीं हुआ था। कुछ समय पहले जांच कराई गई थी, जिसके बाद सुधार करा रहे हैं। 500 मीटर हिस्सा एजेंसी के माध्यम से फिर सुधार रहे हैं।
‘दो साल से काम चल रहा है, पहले गड़बड़ी क्यों नहीं पकड़ी गई’ के सवाल पर वे कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि पहले कोई गलती हुई है। अभी कुछ सुधार की जरूरत लगी तो उसे सुधार किया जा रहा है।
जीएचवी के साइट इंजीनियर अमित राय कहते हैं कि पहले निर्माण के बाद पानी निकासी की समस्या थी। जांच के बाद पूरे हिस्से को सही किया जा रहा है।
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